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C101- Fundamental of Naturopathy and Yoga

 

प्राकृतिक चिकित्सा  

हमारे पूर्वज एवं ऋषि-मुनियों के द्वारा आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व वर्तमान में उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों से परिचित हो गये थे। इसी कारण उन्होंने विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की खोज की थी जिससे शरीर में रोग के लक्षण न उत्पन्न हो, और यदि किसी भूल के कारण रोग हो जाए तो प्राकृतिक तत्वों द्वारा जैसे- धूप, मिट्टी, जल, हवा, जड़ी बूटियों आदि द्वारा तुरन्त उन पर नियन्त्रण प्राप्त कर लिया जाय। इसी पद्धति को प्राकृतिक चिकित्सा के नाम से जाना गया है।


प्राकृतिक चिकित्सा में उपचार की तुलना में स्वास्थ्यवर्धन पर अधिक महत्व दिया जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा स्वस्थ जीवन जीने की एक कला विज्ञान है। मनुष्य प्रकृति का एक हिस्सा है और उसका शरीर इन्ही पंचतत्वों से बना है पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। प्राकृतिक चिकित्सा का यह अटल सिद्धांत है कि मानव शरीर में स्थित एक ही विजातीय द्रव्य अनेकों रोगों के रूप में तथा विभिन्न नामों से प्रकट होता है। शरीर में रोग केवल एक है जो हमारे शरीर में मल के रूप में जमा है और वही मूलत: रोग की जड़ है, इसकी उपज हमारे अप्राकृतिक जीवन यापन से होती है। अव्यवस्थित जीवन शैली से शरीर में दूषित मल विजातीय द्रव्य एकत्र होने लगते हैं और परिस्थिति वायु प्रकृति (जीवनी शक्ति आदि) के अनुसार अलग-अलग लोगों में इन विजातीय द्रव्यों का बहिष्करण भिन्न भिन्न तरीकों से होता है अर्थात् अलग अलग रोग परिलक्षित होते हैं जैसे बुखार जुकाम आदि। इन सबकी एक ही चिकित्सा है विजातीय द्रव्यों का निष्कासन। वास्तव में आहार विहार एवं रहन-सहन की अनियमितता तथा असंयम के कारण ही रोगों का प्रादुर्भाव होता है। संयमित और नियमित जीवन से मनुष्य रोग मुक्त हो जाता है। वास्तव में प्राकृतिक चिकित्सा एक चिकित्सा पद्धति नहीं अपितु जीवन जीने की कला है जो हमें आहार, निद्रा, सूर्य का प्रकाश, पेयजल, विशुद्ध हवा, सकारामकता एवं योग विज्ञान का समुचित ज्ञान कराती है। प्राकृतिक चिकित्सा से रोग ठीक किये जाते हैं पर यदि प्रकृति के अनुसार जीवन जिया जाय तो रोग होंगे ही नहीं। प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा जीवन निरोगी बनाया जा सकता है। प्राकृतिक चिकित्सा उतनी ही पुरानी है जितनी कि प्रकृति। इसके पॉंच आधार हैं। प्राकृतिक चिकित्सा वास्तव में जीवन यापन की सही पद्धति को कहते हैं। यह ठोस सिद्धांतों पर आधारित एक औषधि रहित रोग निवारक पद्धति है। ‘‘प्राकृतिक चिकित्सा व्यक्ति को उसके शारीरिक, मानसिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक तलों पर प्रकृति के रचनात्मक सिद्धांतों के अनुकूल निर्मित करने की एक पद्धति है। इसमें स्वास्थ्य संवर्धन रोगों से बचाव व रोगों को ठीक करने के साथ ही आरोग्य प्रदान करने की अपूर्व क्षमता है।’’

प्राकृतिक चिकित्सा की परिभाषा

प्राकृतिक चिकित्सा सभी चिकित्सा प्रणालियों में सर्वाधिक पुरानी चिकित्सा पद्धति है। प्राचीन काल से पंचमहाभूतों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश तत्व की महत्ता की है। प्राकृतिक चिकित्सा न केवल उपचार की पद्धति है अपितु यह एक जीवन पद्धति है इसे बहुधा औषधि विहीन उपचार पद्धति कहा जाता है। यह पूर्णरूप से प्रकृति के सामान्य नियमों के पालन पर आधारित है।प्राकृतिक चिकित्सा सम्बन्धी विभिन्न विद्वानों का मत-

  1. कुने लुईस 1967- ‘‘प्राकृतिक प्रणाली जिसका कि चिकित्सा के रूप में उपयोग करते हैं तथा जो दूसरी पद्धतियों से गुण में बहुत अच्छी है, बिना औषधि या आपरेशन के उपचार की आधार की शिक्षा है।’’
  2. जुस्सावाला जे0एम0 (1966)-’’प्राकृतिक चिकित्सा एक विस्तृत शब्द है जो रोगोपचार के सभी प्रणालियों के लिये उपयोग किया जाता है जिसका उद्देश्य प्राकृतिक शक्ति एवं शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता के साथ सहयोग करना है। यह व्याधि से मुक्त कराने का एक भिन्न तरीका है जिसका जीवन स्वास्थ्य एवं रोग के संबन्ध में अपना स्वयं का एक दर्शन है।
  3. बेनजामिन हेरी- ‘‘प्राकृतिक चिकित्सा व्याधि से मुक्त करने तथा रोग का दर्शन है।’’ प्राकृतिक चिकित्सा शरीर की स्वयं की आंतरिक सफाई एवं शुद्धिकरण की स्वीकृति देती है। इस प्रकार यह अशुद्धता एवं अनुपयोगी पदार्थ जो कि अधिक वर्षों के कारण एकत्र हो गया तथा जो सामान्य कार्य में बाधा उत्पन्न करता था उसें निकाल फेंकता है।
  4. महात्मा गांधी-’’प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति से रोग मिट जाने के साथ ही रोगी के लिये ऐसी जीवन पद्धति का आरम्भ होता है जिसमें पुन: रोग के लिये कोई गुंजाइश ही नहीं रहती।’’
  5. पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य-‘‘प्राकृतिक चिकित्सा का अर्थ है प्राकृतिक पदार्थों विशेषत: प्रकृति के पांच मूल तत्वों द्वारा स्वास्थ्य रक्षा और रोग निवारक उपाय करना।’’
  6. विलियम ओसलर-प्रकृति जिसे आरोग्य नही कर सकती उसे कोई भी आरोग्य नहीं कर सकता है।
  7. महात्मा गाँधी- ‘‘जिसे हवा, पानी और अन्न का परिणाम समझ में आ गया वह अपने शरीर को स्वस्थ रख सकता है उतना डाक्टर कभी भी नहीं रख सकता।’’
  8. प्रो0 जीसेफ स्मिथ एम.डी.-दवाओं से रोग अच्छा नहीं होता बल्कि केवल दबाता है। रोग हमेशा प्रकृति अच्छा करती हैं।
  9. हिपोक्रेटस-‘‘प्रकृति रोग मिटाती है, डाक्टर नहीं।

अत: कहा जा सकता है कि प्राकृतिक चिकित्सा रोगों को दबाती नहीं वरन् उसकी जड़ को खत्म करने में सक्षम है। 

भारत में प्राकृतिक चिकित्सा का इतिहास

प्राकृतिक चिकित्सा उतनी ही पुरानी है जितनी की प्रकृति स्वयं है और उनके आधार भूत तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश। प्रकृति के तत्व जिनसें जीवन की उत्पित्त होती है सदैव वही तत्व रोगों को दूर करने में सहायक रहे। प्राचीन काल से ही तीर्थ स्नान पर घूमना, उपवास रखना, सादा भोजन करना, आश्रमों में रहना, पेड़ पौधों की पूजा करना, सूर्य, अग्नि, तथा जल की पूजा करना आदि कर्म के अंग माने जाते रहे है यदि किसी प्राकृतिक नियमों को तोड़ने में कोई कभी अस्वस्थ हो जाता था तो उपवास, जड़ी-बूटियों तथा अन्य प्राकृतिक साधनों का प्रयोग करके स्वस्थ हो जाता हैै। वेदकाल के वेद तथा अन्य प्राचीन ग्रन्थों में इसके सन्दर्भ मिलते है।

वायु तत्व- ‘‘पद दौ वात ते ग्रेहअमृतस्य निधिर्हित तहोनो देहि जीवसे’’

अर्थात्! हे वायु तेरे घर जो है वे अपूर्व अमृत का खजाना है उसमें से हमारे दीर्घ जीवन के लिए थोड़ा सा भाग प्रदान करे।

सूर्य तत्व-‘‘सवितानु: सवितु सर्वातीत सवितोनाराजतां दीर्घमायु’’

अर्थात्! वह श्रेष्ठ प्रकाश जो विश्व को प्रकाशित कर रहा है हमें सद्बुद्धि और दीघायु प्रादन करे।सूर्य आत्मा जगतस्वस्थश्च। अर्थात् सूर्य संसार के समस्त पदार्थों की आत्मा है।

जल तत्व-‘‘सन्नो देवीर भस्तमायोशवन्तुपीतयेशं शयोरीशभवन्तु’’।(ऋग्वेद 10/4/4)

अर्थात्! हे ईश्वर दिव्य गुण वाला जल हमारे लिए सुखकारी हो जो हमें अभीष्ट पदार्थ प्राप्त कराये। हमारे पीने के लिए ये सम्पूर्ण रोगों का नाश करे तथा रोग से पैदा होने वाले भय को न पैदा होने दे, हमारे सामने बहे।

पृथ्वी तत्व-‘‘अधतेडीप च भूतनित्यन्नत्व मुच्यतेतैित्त्ारीयक वेदान्ते तस्य भावोऽनुचिन्तयताम्अध्यते विधिवद् मुक्तमति भोकतरमन्यथा’’।(तैतरीय उपनिशद)

अर्थात् भोजन जो खाया जाता है और भोजन खाने वाला जो भी खाता है भोजन का यह महत्व विचारणीय है विचित्र रीति से किया गया भोजन खाने वाले द्वारा खाया जाता हैै परन्तु जो गलत विधि से खाया जाता है ऐसा भोजन खाने वाले को खा जाता है पहले प्रकार का भोजन मनुष्य को आयुश एवं स्वास्थ्य प्रदान करता है जबकि दूसरे प्रकार के भोजन का विपरीत प्रभाव पड़ता है। वैदिक सभ्यता के बाद पुराण काल में प्राकृतिक चिकित्सा प्रचलित थी राजा दिलीप ने दुग्ध कल्प, फल जल सेवन (रहना) लाभ प्राप्त किया।

आयुर्वेद के अनुसार-

वायु तत्व- दध्यान्ते ध्यायमाननां धातू नाहि यथा मला:।तर्थोन्द्रयाणि दध्यन्ते दोशा: प्राणस्य निग्रहत।।(ऋग्वेद-10/86/3)

अर्थात्! धातुओं को आग में डालने से जैसे उनके मल नष्ट हो जाते है वैसे ही प्राणायाम से मनुष्य के समस्त रोग दूर हो जाते है। वायु हमारे हृदयों में शक्ति पैदा करे। वह सुख देने वाला होकर हमारे पास बहती रहे जब हमारी आयु को दीर्घ करें।

सूर्य तत्व-‘‘कफीयतोदभवा रोगान वात, रोगास्तथैव च।तत्सवनान्न रोजित्वा जीवेच्च शरदाशतम्।।’’

अर्थात् सूर्य रश्मियों के दैनिक प्रयोग से मनुष्य कफ पित्त व वायु दोश से उत्पन्न सभी रोगों से मुक्त होकर सौ वर्ष तक जीवित रह सकता है। ‘‘ददुविस्फोट कुश्टहन कामला शोध नाशक:।ज्वादि सार शूलना हारको नात्रसंशय:।।’’ 

अर्थात् सूर्य रश्मियाँ दाद, कुश्टपूर्ण दाने, कोढ़, जलशोथ, अति उदरशूल जैसे रोगों को नष्ट कर देती है इसमें सन्देह नहीं।

जल तत्व- दीपनं वृश्य दृश्टातायुश्यं स्नानमोजो बल।प्रदम् कडमलश्रम स्वेदन्द्रोतऽदाह पायुत।रक्त प्रसादन चापि सवेन्द्रिय विशोधनम्।।

अर्थात् स्नान, ओज, आयु, जीवनी शक्ति को बढ़ाता है। थकावट, पसीना, चर्म रोग, मल और उसकी दुर्गन्ध आलस्य, प्यास, जलन तथा पाप का नाश करता है साथ रक्त को शुद्ध करता है एवं सम्पूर्ण इन्द्रियों को स्वच्छ व निर्मल कर देता है।


पृथ्वी तत्व- पृथ्वी न चाहारसमं किंचिद् भैशज्य मुकलभ्यते।शक्यतेऽयन्नं मात्रेण नर: कुर्त निरामय:।।भेशजो नोपन्नोऽसि निराहारो न शक्यते।तस्याद् भिशग्भिराहारो महा भैशन्यमुच्यते।।

अर्थात्! भोजन से बढ़कर दूसरी दवा नहीं है केवल भोजन सुधार से मनुष्य के सारे रोग दूर हो जाते है दवा कितनी दी जाए पर यदि रोगी के भोजन में उचित सुधार न किया जायेगा तो कुछ लाभ नहीं होगा मनुष्य जो खाता है वह भैशज्य नही महा भैशज्य है। पद्यपथ्यं किमौशधया, यदि पथ्यं किमौशधै:। अर्थात् यदि रोगी का पथ्य ठीक नहीे है तो औशधीय दिये जाने का कोई अर्थ नहीं और यदि ठीक है तब भी औषधि निरर्थक है। भोजन सुधार से मनुष्य के सारे रोग दूर हो जाते है, दवा कितनी ही दी जाए पर रोगी के भोजन में उचित सुधार नहीं किया जायेगा तो कुछ लाभ नहीं होगा। मनुष्य जो खाता है भोजन नहीं महाभैशज है। सदा पथ्यं किमौशधया यदिपथ्यं किमौशधै:। अर्थात् यदि रोगी का पथ्य ठीक नहीं है तो औषधि लिए जाने का कोई अर्थ नहीं और यदि पथ्य ठीक है तो भी औषधि निरर्थक है।

पुराण काल-वेदकाल के बाद पुराण काल में प्राकृतिक चिकित्सा का उपयोग रोगों को दूर करने तथा स्वास्थ्य वर्धन के लिये किया जाता था। प्रारम्भ में कोई औषधि चिकित्सा नहीं थी लोग लंघन (उपवास) को ही अचूक औषधि मानते थे। इस सम्बन्ध प्रसंग आता है कि राजा दिलीप दुग्धकल्प एवं फल सेवन तथा राजा दशरथ की रानियों ने फल द्वारा संतान लाभ प्राप्त किया। उपवास सभी रोगों से मुक्त होने का सहज उपचार माना जाता है।

त्रेतायुग में रावण के समय जड़ी-बूटी का औषधि के रूप में प्रयोग होने लगे क्योंकि भोग-विलासी होने के कारण रावण को प्राकृतिक चिकित्सा में कष्ट होता था उसने वैधों का लघंन (उपवास) के बिना चिकित्सा की विधि खोजने का आदेश दिया तभी से औषधि चिकित्सा का आरम्भ हो गया।

महाबग्ग बौद्ध ग्रन्थ-इस ग्रन्थ में वर्णन किया गया है कि एक बार भगवान बुद्ध श्रावस्ती नगर से राजगृह जाते हुए कलंद निवास नामक संघ मे रूके थे। वहाँ एक बौद्ध भुक्षु को सांप ने काट लिया उसकी सूचना भगवान बुद्ध को मिली उन्होंने सलाह दी कि विष नाश करने के लिए चिकनी मिट्टी, गोबर, गौमूत्र और राख का उपयोग किया जाए इस प्रकार किया जाय इस प्रकार के प्रसंग से ज्ञात होता है कि भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों को प्राकृतिक चिकित्सा से सही करते, करवाते थे।
सिन्धुघाटी की सभ्यता- इस काल में भी प्राकुतिक चिकित्सा का उपयोग होता था। मोहन जोदड़ो में पाये गये पुराने स्नानगार जिस में गरम, ठण्डा दोनों ही प्रकार के स्नान का प्रबन्ध था। इससे यह स्पष्ट होता है कि 350 ई0 पूर्व जल चिकित्सा महत्वपूर्ण स्थान रखती थी।
मिस्र यूनानी व यहूदी जातियाँ- जल से चिकित्सा होती थी। 2000 वर्ष यूनान एक व्यक्ति बुकरात ने जल और सूर्य चिकित्सा द्वारा लोगों का ज्वर, रक्तविकार, चर्मरोग आदि को ठीक करने के लिए प्रसिद्ध थे।रोम में 800 वर्ष पूर्व सूर्य चिकित्सा होती थी ।

आधुनिक प्राकृतिक चिकित्सा का जन्म एवं विकास

ईसा के जन्म के 400 वर्ष पूर्व ग्रीस के हिप्पोक्रेटीज प्राकृतिक चिकित्सा के जनक कहे जाते है। उनके समय तक दौ सौ पैसठ औषधियों का अविष्कार हो चुका था ये उनकी लिखी पुस्तकों से ज्ञान होता है लेकिन ये औषधियाँ मुख्यत: कुछ नये रोगों में ही प्रयोग की जाती थी। यदपि हिप्पोक्रेटीज इन औषधियों में विश्वास रखता था , उनकी धारणा थी कि प्रकृति में रोग निवारण शक्ति है। तथा नये-नये रोग स्वयं ही शरीर में एक प्रकृति तरीके से उभार लाकर शरीर के भागों में से एक अधिक के द्वारा विकारों के बाहर कर देते है। उनका कहना था कि चिकित्सक का कर्त्तव्य है कि वह रोगी में आये बदलाव का अनुमान पहले से कर ले जिससे वह उन प्राकृतिक तरीको को सहज सफल होने में सहायता दे तथा रोगी चिकित्सक की मदद से रोग निवारण कर सके।

 

हिप्पोक्रेटीज को जल चिकित्सा का पूरा-पूरा ज्ञान था उन्होंने शीतल तथा उष्ण दोनों प्रकार के जल का उपयोग अल्सर, ज्वर और अन्य रोगों में किया। उन्होंने कहा कि शीतल जल का स्नान लघु कालीन होना चाहिए उसके तुरन्त बाद या घर्षण स्नान करना चाहिए। लघुकालीन शीतल स्नान से शरीर गरम रहता है इसके विपरीत उष्ण जल से स्नान से इसके विपरीत प्रभाव पड़ता है। यूनान के स्पार्टन नामक जाति में शीतल जल से स्नान करने का कानून बना था वहाँ बड़े-बड़े स्नानगार में शीतल और उष्ण वायु स्नान की व्यवस्था की। फादर नीप ने प्राकृतिक चिकित्सा का उपयोग बड़े उत्साह से किया और जड़ी बूटी व जल के प्रयोग सम्बन्धी बहुमूल्य अविष्कार किये। मध्यकाल में अरा के चिकित्सकों ने जल चिकित्सा को महत्व दिया।
रेजेज ने ज्वर के ताप को कम करने के लिए बरफीला जल थोड़ा पानी की सलाह दी।
एवी सेना कब्ज निवारण हेतु शीलत जल का स्नान तथा मिट्टी को लाभकारी बताया।


कुलेन चिकित्सक के रूप में जल के सन्दर्भ में कुछ व्यवस्थिति अवलोकन प्रस्तुत किये। उन्होंने ज्वर के उपचार के लिए जल के सम्बन्ध में कहा कि जब प्रतिक्रिया की दिशा को कम करने के लिए जल का उपयोग किया जाता है तो उसका प्रभाव शान्तिदायक होता है लेकिन जब हृदय और धमनियों के कार्यों को बढ़ाने के लिए तथा सबल देने के लिए जल का उपयोंग किया जाता है तो वह टॉनिक का कार्य करता है। जल रोग निवारण और स्वास्थ्य संवर्धन के लिए उपयुक्त माना जाता है।

प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति भारत की प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति है किन्तु बीच में इस चिकित्सा प्रणाली के संसार से लोप हो जाने के बाद उसके पुर्नरूथान का श्रेय पाश्चात्य देशों को दी है इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता। प्राकृतिक चिकित्सा के पुनरूथान में मदद देने वाले अनेक प्राकृतिक चिकित्सक थे और ये लोग वह थे जो औषधियों द्वारा रोगों का उपचार करते-करते अपनी आयु के एक बड़े भाग को समाप्त कर देने पर भी शान्ति नहीं पा सके। उनके स्वयं के प्राण प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा बचे थे। इस सम्बन्ध में निम्नवत जानकारी है।

 

पाश्चात्य देशों में प्राकृतिक चिकित्सा का इतिहास

डाक्टर फ्लायर इग्लैण्ड के लिचफील्ड निवासी थे। लिचफील्ड के एक स्त्रोत के पानी में कुछ किसानों को नहाते देखकर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त देखा और इस सम्बन्ध में उन्होंने खोज की और जल चिकित्सा आरम्भ की।
सन् 1667 में सर जान फ्लोयर ‘‘हिस्ट्री आफ कोल्ड बायिंग’’ नामक पुस्तक लिखी जिसमें इन्होंने शीतल जल के महत्व स्नान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहाँ कि शीतल जल के स्नान देने से पहले रोगी को पसीना अवश्य आना चाहिए। इसके लिए रोगी को एक गीला चादर लपेट कर कम्बल से ढक देना चाहिए। इसके बाद पसीना आ जायेगा, तब स्नान कराना चाहिए। उन्होंने इग्लैण्ड के लिचफील्ड में वाटर क्योर केन्द्र बनाया इसमें दो कमरे हुआ करते थे। एक कमरे में रोगी को उष्ण स्नान तथा शुष्क लपेट पसीना लाने के लिए दी जाती थी। दूसरे कमरे में शीतल जल की स्नान करवाया जाता था। दोनों कमरे एक दूसरे से बिल्कुल आस-पास थे।


आधुनिक प्राकृतिक चिकित्सा के प्रणेता विनसेन्ज प्रेविनज माने जाते है। जो कि फादर ऑफ वाटर थरैपी माने जाते है। इनका जन्म जर्मनी के सिलेसियन पहाड़ की तलहटी मे एक गाँव में 1752 में एक गरीब परिवार में हुआ था। बड़े होने पर चरवाहे का काम करते हुए एक लगड़ी हिरनी को बुरी तरह घायल देखा वह हिरनी झरने के नीचे आधे घण्टे पानी में खड़े होने के बाद पानी से निकलकर जिधर से आयी थी उधर ही चली गयी। दूसरे दिन भी वह हिरनी करीब उसी समय आयी और इस बार आधे घण्टे से अधिक समय तक पानी में रहने के पश्चात पुन: चली गयी। प्रिस्निज ने देखा कि तीन सप्ताह तक हिरनी इसी प्रकार आती रही। उन्होंने लगड़ी हिरनी झरने में नहाने से उसकी चोट को ठीक होता हुआ देखकर आश्चर्य चकित हुए।

प्रिस्निज जी सोलह वर्ष के थे जब एक दिन जंगल से लकड़ी काटकर लौटते समय बर्फ गिरने लगी। वह आधी तूफान में फसकर चार पसलियां टूट गयी। उन्होंने अपनी चिकित्सा हिरनी की तरह जल से की। इन्होंने गीली पट्टी बाधकर ठीक किया। सूती कपड़े की गद्दी पानी में भिगोकर अपने अंग पर रखने लगे और गद्दी सूख जाती तो फिर से उसे पानी में भिगोकर रख लेते। इस तरह कुछ समय के पश्चात वह बिल्कुल स्वस्थ हो गये।

इनका जल चिकित्सा पर गहन विश्वास हो गया। इन्होंने 1829 में जल चिकित्सा प्रणाली की स्थापना की। जिससे इनके पास दूर-दूर से रोगी आने लगे। प्रिस्निज की चिकित्सा में विशेष जल के व्यवहार और सादा भोजन था। इनका आधारभूत सिद्धान्त पसीना निकाल कर ठण्डे जल का प्रयोग था। इसके बाद रोगी की प्रतिरोधक क्षमता शक्ति को भी बढ़ाने में सहायता करने लगा। प्रिस्निज के बाद जोहान्स स्क्राथ ने शोध से कार्य को आगे बढ़ाया।


जोहान्स स्क्राथ- प्रिस्निज के काल है इन्होंने एक साधु के उत्साहित करने पर अपनी चोट को जल चिकित्सा से सही किया था बाद में जानवरों पर सिद्धस्य हो जाने पर मनुष्यों पर जल चिकित्सा का प्रयोग किया। इनकी ख्याति बढ़ने पर ऎलोपैथिक चिकित्सा में विश्वास रखने वाले लोगों ने शडयंत्र करके इन्हें जेल भिजवा दिया। जेल से बाहर आकर 1849 में जब एक घायल सिपाही को कुछ ही दिनों में ठीक कर दिया तो इनका यश बढ़ने लगा। इनकी चिकित्सा प्रणाली को ‘‘स्क्राथ चिकित्सा’’ कहते है। इमेन्युल स्क्राथ यह जोहान्स के पुत्र थे इन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा अनेक रोगियों का उपचार किया।


फादर सेबस्टिन नीप जो देवरिया के रहने वाले थे इन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा का बहुत प्रचार किया तथा जल का सफल प्रयोग किया। इन्होंने एक स्वास्थ्य ग्रह 45 वर्ष तक चलाया अनेकों संस्थायें जर्मनी में इस चिकित्सा प्रणाली से चल रही है। जल चिकित्सा पर पुस्तक भी लिखी है।


अर्नाल्ड रिचली एक व्यापारी थे। इन्होंने जब प्राकृतिक चिकित्सा के गुणों को देखा और सुना तो उससे प्रभावित होकर इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया और वायु चिकित्सा, जल चिकित्सा पर कार्य किया।
क्राफोर्ड ने भी 1781 में शीतल जल के शरीर पर प्रभाव का अध्ययन किया तथा उपचार हेतु उपयोग भी किया।

डॉ0 हैलरी बेन्जामिल प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योग दिया। उनके द्वारा रचित पुस्तक इवरी बडी गाइड टू नेचर क्योर एक प्रसिद्ध पुस्तक है।

डॉ0 मेकफेडन ने प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने ‘‘फास्टिंग फार हेल्थ’’ तथा ‘‘मेकफेडन इन्साइक्लोपीडिया फार फिजिकल क्योर’’ जैसी अनेकों पुस्तक लिखी। डॉ0 लाकेट ने अपने अनुभव पर भाप स्नान द्वारा पसीना निकालने की नयी विधि अपनायी गयी। एडोल्फ जूस्ट इन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा की सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘‘रीटर्न टू नेचर’’ लिखी। इन्होंने बताया कि मिट्टी के प्रयोग द्वारा समस्त रोगों को दूर किया जा सकता है। इन्होंने अपने आप मालिश करने की क्रिया को भी जन्म दिया।

रावर्ड हावर्ड यह प्राकृतिक आहार के अच्छे ज्ञाता माने जाते है।

सेलमन आपके प्राकृतिक चिकित्सा के प्रचार में महत्वपूर्ण योगदान दिया इनकी लिखी पुस्तक स्वास्थ्य और दीर्घायु आज भी लोकप्रिय है।

डॉ0 केलाग ने रेशनल हाइड्रोथेरेपी पुस्तक लिखी और प्राकृतिक चिकित्सा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। डॉ0 केलाग ने मालिश, धूप चिकित्सा, आहार चिकित्सा आदि अनेक विषयों पर अनेकानेक पुस्तक लिखी। सभी चिकित्सा प्रणालियाँ जैसे आहार चिकित्सा, जल चिकित्सा, शल्य चिकित्सा, विघुत चिकित्सा, द्वारा रोगों का उपचार होता है वहाँ यह भी बताया जाता है कि उत्त्ाम स्वास्थ्य तथा लम्बी आयु कैसे प्राप्त करें।आज अमेरिका में प्राकृतिक चिकित्सा एक चिकित्सा विज्ञान के रूप में कई विश्वविद्यालय में पढ़ाई जा रही है तथा उनके चिकित्सीय महत्पपूर्ण योगदान दे रहे है। डॉ0 जानबेल द्वारा रचित पुस्तक ‘‘बाथ’’ एक प्रसिद्ध कृति है।
स्टैनली लीफ का सन् 1892 ई0 में रूस के एक गाँव में जन्म हुआ। और इनका जीवन दक्षिण अफ्रीका में बीता और जब बड़े हुए तब अमेरिका जाकर मैकफेडन के प्राकृतिक शिक्षालय में भर्ती होकर प्राकृतिक चिकित्सा की शिक्षा प्राप्त की। इग्लैण्ड से निकलने वाली मासिक पत्र ‘‘हेल्थ फार आल’’ के सम्पादक तथा दो प्रसिद्ध पुस्तक भी लिखी। वेनेडिक्ट लुस्ट अमेरिका के एक जाने माने प्राकृतिक चिकित्सक रहे है उन्होंने ‘‘नीप वाटर क्योर’’ नामक एक मासिक पत्रिका निकाली तथा न्यूयार्क में नैच्यूरोपेथी स्कूल आफ कैरोप्रेिक्ट्स की भी स्थापना की।


आस्ट्रिया के फ्रंन प्रान्त के अन्र्तगत टेल्डास- नामक स्थान पर सन् 1848 ई0 में धूप और वायु का जो संसार में सर्वप्रथम अपने ढंग का प्राकृतिक चिकित्सा भवन या बाद में लगभग सभी प्राकृतिक चिकित्सकों ने इसी आधार पर चिकित्सा ग्रहों का निर्माण कराया। अपने 67 वर्ष की लम्बी आयु का उपयोग किया और मरने के समय तक स्वस्थ और स्फूर्तिवान बने रहे। लुई कुने-प्राकृतिक चिकित्सा को विकास एवं उन्नति के शिखर पर पहुँचाने का श्रेय प्रिस्निज, नीप एवं कूने तीनों को है। परन्तु कुने के विशेष योगदान की वजह से आज प्राकृतिक चिकित्सा को कुने चिकित्सा प्रणाली के नाम से भी जाना जाता है।

लूई कूने का जन्म जर्मनी के लिपजिंग नगर में एक जुलाहे के घर हुआ था। इनके माता पिता की मृत्यु एलोपैथ चिकित्सकों के उपचार के मध्य हुई 20 वर्ष की अल्पायु में ही इन्हे भी मस्तिष्क एवं फुस्फुस के भयंकर रोग के साथ-साथ आमाशय का फोड़ा हो गया जो कि किसी भी डाक्टर से ढीक नहीं हुआ जीवन से ऊबकर अंत में सन् 1864 में इन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा की शरण ली और बहुत जल्दी स्वास्थ्य प्राप्त किया।परिणामत: ये प्राकृतिक चिकित्सा के भक्त बने और निरन्तर अध्ययन मनन के बाद 10 अक्टूबर 1883 ई0 में लिपजिंग स्थित प्लास प्लेट्ज स्थान पर एक निज का स्वास्थ्य ग्रह खोल दिया। कुने की जर्मन भाषा में लिखी अनेक पुस्तकों में the science of facial expression और  New science of healing जिनका हिन्दी रूपान्तर सस्ता साहित्य मंडल दिल्ली एवं आरोग्य मंदिर गोरखपुर ने क्रमश: आकृति से रोगी की पहचान एवं रोगों की नई चिकित्सा नाम से किया है ये पुस्तकें विश्व प्रसिद्ध है। फ्रेच, ग्रीक, इंग्लिश आदि कई भाषा में इन पुस्तकों के अनुवाद हो चुके है तथा अन्य भाषाओं में हो रहे है।कुने प्राकृतिक चिकित्सा सिद्धान्तों में रोगों का कारण एक ही है, शरीर में विजातीय द्रव्य का इक्कठा होना मुख्य कारण है इनके उपचार के तरीकों में सूर्य चिकित्सा, भाप स्नान, कटिस्नान प्रमुख है।


Schweninger ऐलोपैथिक डाक्टर ने बाद में प्राकृतिक चिकित्सा बने। इन्होंने The Doctor नामक एक सुप्रसिद्ध पुस्तक लिखकर वर्तमान में प्रचलित जहरीली तथा प्राण घातक औषधियों द्वारा चिकित्सा विधि की बड़ी कटु आलोचना की।

प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धान्त 

मनुष्य प्रकृति का एक हिस्सा है। उसका शरीर इन्हीं प्रकृति तत्व से बना है। प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धान्त नितान्त मौलिक है इनके अनुसार प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करने से रोग पैदा होते है तथा प्राकृतिक नियमों का पालन करते हुए पुन: निरोग हो सकते है। मनुष्य शरीर में स्वाभाविक रूप एक ऐसी प्रकृति प्रदत्त्ा पायी जाती है जो सदैव भीतरी और बाहरी हानिकारक प्रभावों से मानव की रक्षा करती है जिसको नियमियता कहा जाता है और साधारण लोग जिसे जीवनी शक्ति के नाम से पुकारते है वही शक्ति सब प्रकार के रोगों के कारणों को स्वयंमेव दूर करती है। वह निरन्तर शरीर का पुननिर्माण करती रहती है और जो टूट फूट हो जाती है। उसकी मरमत का भी ध्यान रखती है साथ ही शरीर भीतर से अस्वाभाविक तत्व पैदा हो जाते है या बाहर से पहुँच जाते है उन्हें निकालने का भी प्रयत्न करती रहती है। रोग मनुष्य के लिए अस्वाभाविक अवस्था है जब वह प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन या विरूद्ध मार्ग पर चलने लगता है तो उसके शरीर मे विजातीय द्रव्य की मात्रा बढ़ने लगती है जिसके परिणाम स्वरूप शरीर में तरह-तरह के विष उत्पन्न होने लगते है और वातावरण मे पाए जाने वाले हानिकारक कीटाणुओं का भी उस पर आक्रामण होने लगता है इससे शरीर का पोषण और सफाई करने वाले यन्त्र निर्बल पड़ने लगते है। उनके कायोर्ं में त्रुटि होने लगती है और मनुष्य रोगी हो जाता है। शरीर के भीतर रोग निरोधक शक्ति भरी पड़ी है जिसके द्वारा शरीर मे उत्पन्न हुए अथवा बाहर से प्रवेश पाकर पहुँचे हुए रोग कीटाणुओं का विनाश निरन्तर होता है। उदाहरण-यदि आँख में कोई विष कीटाणु जा पहुँचे तो निरन्तर आँसू निकलता है। इन आँसुओं में लाइसोजीम नामक पदार्थ रहता है जिसकी निरोध शक्ति अद्भूत है।

प्राकृतिक चिकित्सा की मान्यता है कि रोग एक है और उसका इलाज भी एक है अत: कोई भी आसाह्य से असाह्य रोग हो इस चिकित्सा से उसका उचित समय से निराकरण किया जा सकता है। रोगी के ठीक हो जाने पर पुन: उसके रोगी होने की सम्भावना क्षीण हो जाती है। प्राकृतिक चिकित्सा से रोग जड़ से दूर होते है। स्वास्थ्य के सम्बन्धित नियमों का पालन तथा किसी भी काम में अति न करना प्राकृतिक चिकित्सा का मुख्य सिद्धान्त है। प्रकृति के नियमों को तोड़ने से बीमारियाँ पैदा होती है। जबकि प्रकृति के नियमों का पालन करने से हमारे स्वास्थ्य की रक्षा होती है। प्रकृति के नियमों के पालन के लिए आवश्यक होता है कि हमें प्राकृतिक चिकित्सा के महत्वपूर्ण सिद्धान्तो के बारे में जानकारी हो जो  है- प्राकृतिक चिकित्सा के मूलभूत सिद्धान्त है जीवनशैली मनुष्य रोगी न बने इसके लिए प्राकृतिक चिकित्सा के दस आधार भूत सिद्धान्त  है-

सभी रोग एक हैं, और उनका कारण भी एक ही है, और उनका उपचार भी एक ही है-

सभी रोग, उनके कारण उनकी चिकित्सा भी एक है चोट और वातावरणजन्य परिस्थितियों को छोड़कर सभी रोगों का मूल कारण एक ही है और उसका उपचार भी एक है शरीर में विजातीय पदार्थों की संग्रह हो ताना जिससे रोग उत्पन्न होते है। उनका निष्कासन ही चिकित्सा है। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति का मौलिक सिद्धान्त वह है। प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार सभी रोग एक ही है। रोग को अलग-अलग नामों से जाना जाता है जिस प्रकार चांदी से बने आभूशणों के अलग अलग नाम हैं जैसे- कंगन, पायल, अॅंगूठी आदि उसी प्रकार एक ही विजातीय द्रव्य के अलग अलग स्थान पर एकत्र होने के कारण रोग के अनेकों नाम हैं। रोग का एक मात्र कारण विजातीय द्रव्य है। जिसे टॉक्सिक मैटर कहते हैं, शरीर एक मशीन के समान कार्य करता है जिसके कारण हमारे शरीर में विजातीय द्रव्य एकत्र होते रहते हैं और उत्सर्जन तंत्र के माध्यम से बाहर निकाला जाता है। जैसे पसीने के रूप में, मल मूत्र के रूप में और जब यही मल जब शरीर से सुचारू रूप से नहीं निकलता तो शरीर के विभिन्न स्थानों पर जमा होने लगता है, और वही सड़ने लगता है जिसके कारण रोग होते हैं। जैसे आंतों की सफाई न होने पर कब्ज होती है जिसके कारण बवासीर और फिसर जैसे रोग होते हैं अंन्त में इनका व्यापक रूप हमारा रक्त भी दूषित कर देता है जिससे चर्मरोग होता है। हृदय पर ज्यादा दबाव पड़ने से हृदय रोग भी हो जाता है। श्वसन का कार्य बढ़ जाने से श्वांस संबन्धी रोग उत्पन्न होते हैं। इन सबकी जड़ केवल विजातीय द्रव्य ही होते हैं। इसीलिये जब सारे रोग एक है और उनका कारण भी एक हैं तो उसका उपचार भी एक ही होगा और वह है शरीर से विजातीय द्रव्यों का निष्कासन जिससे शरीर शुद्ध हो और रोग समाप्त हो सकें। विजातीय द्रव्य के समाप्त होने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिवान हो जाता है। इसीलिये प्राकृतिक चिकित्सा में शरीर की शुद्धि को महत्वपूर्ण स्थान दिया है और विभिन्न माध्यमों से शरीर से विजातीय द्रव्यों को बाहर निकाल कर इसका उपचार किया जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि सभी रोग एक हैं। क्योंकि वे एक ही प्रकार के कारण से उत्पन्न होते होते हे इसलिये उनका उपचार भी एक मात्र है शरीर से विजातीय द्रव्यों को बाहर निकालना।

 

तीव्र रोग शत्रु नहीं मित्र होते हैं-

तीव्र रोग चकि शरीर के एक उपचारात्मक प्रयास है अत: हमारे शत्रु नहीं है। जीर्ण रोग तीव्र रोगों को दबाने से और गलत उपचार से पैदा होते है। प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार रोगों को दो श्रेणी में बांटा गया है। 1. तीव्र रोग, 2. जीर्ण रोग। जीर्ण रोग वह होते हैं जो शरीर में दबे रहते हैं और लंबे समय के बाद प्रकट होते हैं जिनके शरीर में रहते हुये हमारा शरीर काम तो करता है लेकिन अंदर से क्षतिग्रस्त होता रहता है और लंबे समय तक शरीर में बने रहते हैं क्योंकि इनकी जड़ें शरीर में जम चुकी होती हैं इसके विपरीत तीव्र रोग वह होते हैं जिनकी अवस्था में शरीर कार्य करने में सक्षम नहीं हो पाता है और यह शरीर में तीव्र गति से आते है और वैसे ही तीव्र गति से चले भी जाते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा में तीव्र रोगों को मित्र कहा गया है जिस प्रकार सामने से वार करने वाले से खतरनाक छिपकर वार करने वाला होता है। उसी प्रकार तीव्र रोग सामने से वार करता है इससे व्यक्ति को संभलने का अवसर मिल जाता है।

 

रोग का कारण कीटाणु नहीं-

रोग का मुख्य कारण कीटाणु नहीं है। जीवाणु शरीर में जीवनी शक्ति के हास होने के कारण एवं विजातीय पदार्थों के संग्रह के पश्चात् तब आक्रमण कर पाते है जब शरीर में उनके रहने और पनपने लायक अनुकूल वातावरण तैयार हो जाता है अत: मूलकारण विजातीय पदार्थ है जीवाणु नहीं है जीवाणु तो दूसरा कारण है। उपर्युक्त सिद्धांत से स्पष्ट हो जाता है कि रोग का एक मात्र कारण विजातीय द्रव्य हैं तो कीटाणु रोग का कारण कैसे हो सकते हैं। स्वस्थ शरीर में कीटाणुओं का अस्तित्व नहीं रहता लेकिन इसके विपरीत रोगियों में विभिन्न प्रकार के कीटाणु प्रवेश करते रहते हैं और रोगी को जर्जर करते रहते हैं। ऐसा क्यों होता है, यह एक प्राकृतिक नियम है कि सृष्टि में जितने पदार्थ हैं इनके सूक्ष्म परमाणु अनवरत रूप से गतिशील रहते हैं। जिन वस्तुओं के परमाणु एक सी गति रखते हैं उनमें परस्पर आकर्षण होता है। और विरूद्ध गति के परमाणु एक दूसरे से भागते हैं। अत: इस सिद्धांत के अनुसार कीटाणुओं का अस्तित्व उन्ही शरीरों में होता है जिनमें पहले से ही विजातीय द्रव्य विद्यमान हो अथवा जो रोग ग्रस्त है या जीवनी शक्ति कमजोर हो क्योंकि विजातीय द्रव्य के कारण जीवनी शक्ति का ह्रास होता है उस अवस्था में कीटाणुओं का प्रवेश शरीर में होता है।


जिस प्रकार गुड़ के पास ही मक्खियां आती है। ठीक उसी प्रकार गंदगी में ही मच्छर आते हैं क्योंकि कीटाणुओं भी जीवित रहने के लिये उनका आहर चाहिये जो कि स्वस्थ व्यक्ति में उन्हें नहीं मिलता और वे जीवित नहीं रह पाते। इसके विपरीत रोगी के शरीर में उनका चौगुना विकास होता है। यही कारण है कि किसी भी प्रकार के कीटाणुओं के संक्रमण में 100 प्रतिशत लोग प्रभावित नही होते वही उसकी चपेट में आ जाते हैं। जिनका रहन सहन सही नहीं है जीवनी शक्ति प्रबल होती है उनमें कीटाणु जीवित नहीं रह पाते इसीलिये वह स्वस्थ रहते हैं। इससे स्पष्ट है कि रोग के प्रभाव का प्रथम कारण एक मात्र विजातीय द्रव्य ही होते हैं कीटाणु नहीं।

 

प्रकृति स्वयं चिकित्सक है-

प्रकृति स्वयं सबसे बड़ी चिकित्सा है शरीर में स्वयं रोगों से बचने व अस्वस्थ्य हो जाने पर पुन: स्वस्थ प्राप्त करने की क्षमता विद्यमान है। प्रकृति जीव का संचालन करती है जो प्रत्येक जीवन के पाश्र्व में रहकर उसके जन्म, मरण, स्वास्थ्य एवं रोग आदि का ध्यान रखती है, उस महान शक्ति को जीवनी शक्ति, प्राण आदि कहते हैं। शरीर की समस्त क्रियायें इसी के माध्यम से संपन्न होती हैं। हमारा खाना पीना, बोलना चालना, उठना बैठना सब इसी पर निर्भर है। मां अपने बच्चे के लिये इन सब बातों का जैसे ध्यान रखती है वैसे ही प्रकृति भी हमारा ख्याल रखती है, और जब तक बच्चा मां के पास रहता है वह अपने आप को सुरक्षित महसूस करता है। जिस प्रकार खाना खिलाते समय यदि खाना अटक जाये तो मां बच्चे को पीठ पर जोर से मारती है पानी पिलाती है। ठीक इसी प्रकार से प्रकृति भी हर तरह से ध्यान रखती है। जब खाना गलती से श्वांस नली में चला जाता है तो प्रकृति के समान ही तुरंत खांसी उत्पन्न कर उसे बाहर निकाल देती है।


इसी प्रकार जब कोई भी जहरीली चीज मुंह में चली जाती है तो तुरंत उल्टी होने लगती है और जहर बाहर निकल जाता है। घाव हो जाने पर उसे कौन भरता है, हड्डी टूट जाने पर उसे कौन जोड़ता है। चिकित्सक केवल सहारा देता है, लेकिन हड्डी को जोड़ नहीं सकता। यह कार्य केवल और केवल प्रकृति रूप में मां ही कर सकती है। संसार में प्रकृति से बड़ा चिकित्सक कोई नहीं है, प्रकृति ही सभी साध्य व असाध्य रोगों का उपचार करती है। प्राकृतिक चिकित्सा तो प्रकृति के कार्य में सहायक के रूप में कार्यकरता है।

 

चिकित्सा रोग की नहीं संपूर्ण शरीर की होती है- 

प्राकृतिक चिकित्सा में चिकित्सा रोग की नहीं बल्कि रोगी की होती है। अन्य चिकित्सा पद्धतियों में केवल रोग निवारण पर बल दिया जाता है परन्तु प्राकृतिक चिकित्सा केवल रोग का ही नहीं अपितु संपूर्ण शरीर की चिकित्सा करती है जिससे रोग स्वत: मिट जाता है क्योंकि रोग का मूल कारण तो शरीर में एकत्र विष है। जैसे सिरदर्द होने पर अधिकांश लोग दवाओं का प्रयोग करते हैं जिससे कुछ समय के लिये दर्द समाप्त हो जाता है लेकिन बार बार होता रहता है क्योंकि उसकी जड़ तो कहीं और ही होती है। प्राकृतिक चिकित्सा में पेट तथा आंतों को साफ करके सिरदर्द को पूर्ण रूप से समाप्त किया जाता है।

इसके साथ ही शरीर के शुद्धि करण से सिरदर्द और अन्यरोग स्वत: ही समाप्त हो जाते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा में किसी अंग विशेष को रोगी नहीं माना जाता है बल्कि किसी भी रोग में संपूर्ण शरीर ही रोगी हो जाता है जैसे एक साधारण लगने वाली कब्ज के कारण व्यक्ति का संपूर्ण शरीर ही रोगी हो जाता है। कब्ज के कारण अपच अजीर्ण गैस, ऐसीडिटी, बवासीर, फिसर, त्वचा रोग, अस्थमा, हृदय रोग आदि होते है। सभी रोग का कारण आंतों में रूका हुआ मल है जो विष का रूप धारण कर संपूर्ण शरीर में फैल जाता है। सिर की ओर जाने पर सिर दर्द, बेचैनी, घबराहट आदि होती है इसलिये केवल पेट की चिकित्सा और शरीर की सफाई से ये सारे रोग एक के बाद एक करके समाप्त हो जाते हैं इसलिये केवल चिकित्सा न करके संपूर्ण शरीर की चिकित्सा की जाती है।

प्राकृतिक चिकित्सा में निदान की विशेष आवश्यकता नहीं-

प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांत के अनुसार सभी रोग एक है और उनके कारण भी एक ही हैं ऐसी अवस्था में रोग निदान की विशेष आवश्यकता नही रह जाती है। वर्तमान समय में रोग के निदान के लिये बड़ी बड़ी मशीने व उपकरण प्रयोग में लाये जाते हैं जिनके माध्यम से शरीर में रोग का पता लगाया जाता है जिनके विपरीत प्रभाव रोगी पर देखने को मिलता है। एक्सरे मशीन से ऑंखों की रोशनी प्रभावित होती है। गर्भाशय शिशु पर विपरीत प्रभाव पड़ता है यहॉं तक की बच्चा अपंग पैदा हो सकता है। इस प्रकार की मशीनों के अत्यधिक प्रयोग से रोग निवारण नहीं रोग को बढ़ाया जा रहा है बल्कि शरीर और दूषित होता है इसके अतिरिक्त रोगी पर अत्यधिक आर्थिक दबाव पड़ती है जिससे मानसिक रूप से क्षुब्ध हो जाता है लेकिन प्राकृतिक चिकित्सा में किसी भी उपकरण की सहायता के बिना आकृति निदान की व्यवस्था है रोगी की आकृति को देखकर सिर्फ यह पता लगाना है कि शरीर के किस भाग पर विजातीय द्रव्य की अधिकता है। चहेरे को देखकर, गर्दन को देखकर और पेट को देखकर ही रोगों का निदान किया जाता है जो एक बहुत ही सरल और सहज प्रकिय्रा है। रोगी को किसी प्रकार की परेशानी नही होती और आर्थिक दबाव बिल्कुल नहीं होता है।

 

जीर्ण रोगी के आरोग्य में समय लग सकता है-

जीर्ण रोगी का अर्थ है जिसमें रोग लंबे समय से बैठा है। उसे समाप्त करने में समय लगता है। जीर्ण रोग न तो बहुत जल्दी आते है और न ही पलक झपकते ठीक हो सकते हैं। जीर्ण रोग उस पेड़ के समान होते हैं जो कई वर्षो से अपनी जड़े जमाये हुये हैं इसलिये उसकी जड़े जमीन में बहुत अंदर तक चली जाती है। पेड़ को तने से बहुत जल्दी काटा जा सकता है। इसी प्रकार जीर्ण रोग भी शरीर में बहुत जड़ें बना लेते हैं और उन्हें जड़ से मिटाने में थोड़ा समय लगता है।वर्तमान समय की चिकित्सा पद्धतियां रोग के लक्षणों को मिटाती है जो कुछ समय के लिये होता है और बार बार उभर कर सामने आती रहती है। क्योंकि जल्दी आराम पाने के चक्कर में वे औषधियों के माध्यम से रोग रूपी पेड़ के तने को काटते हैं जिसके कुछ समय बाद फिर अंकुर आकर वही पेड़ बन जाता है लेकिन प्राकृितेक चिकित्सा रोग को जड़ से मिटाने का प्रयास करती है और साथ ही जीवनी शक्ति का विकास करती है जो कि औषधियों के सेवन से नष्ट होती है।यह मनुष्य का दुर्भाग्य ही है कि वह प्रकृति से दूर होता जा रहा है और कृत्रिम दुनियां में जी रहा है। आज की औषधियां इसी का उदाहरण है जिन्हें खा कर मनुष्य सोचता है कि वह स्वास्थ्य को प्राप्त कर रहा है। परन्तु सत्य यह है कि वह खुशी से जहर खा रहा है जो धीरे धीरे उसे अंदर से खाये जा रहा है जिसका पता उसे कुछ समय बीत जाने के बाद लगता है। जब वह एक रोग को दूर करने के लिये ली गई औषधियों के कारण दूसरे रोग को आमंत्रित कर देता है। प्राकृतिक चिकित्सा में जीर्ण रोगी के स्वास्थ्य लाभ में समय लगने का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि व्यक्ति हर जगह से थक हार कर इसकी ओर मुड़ता है और फिर अपने साथ जगह जगह से एकत्र किया हुआ औशधीय विष लेकर आता है जो प्राकृतिक चिकित्सक के कार्य को और भी बढ़ा देता है। जिससे रोगी के आरोग्य लाभ में समय लग सकता है। इस लिये रोगी को धैर्यपूर्वक प्राकृतिक चिकित्सा करवानी चाहिये जिससे पूर्ण लाभ मिल सके।

 

प्राकृतिक चिकित्सा में दबे रोग उभरते हैं-

प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा रोग भी उभर कर ढीक हो जाते है। वर्तमान औशधीय चिकित्सा में जहॉं उभरे रोग दब जाते हैं, उसके विपरीत प्राकृतिक चिकित्सा में दबे रोग उभरते हैं जिसके कारण कई रोगी अविश्वास करने लगते है कि उनकी बीमारियां बढ़ गई हैं। जबकि बीमारियां बढ़ती नहीं हैं बल्कि अप्रत्यक्ष से प्रत्यक्ष में आ जाती हैं जिससे उनका उपचार किया जा सकता है। प्राकृतिक चिकित्सा में संपूर्ण शरीर का उपचार किया जाता है जिससे संपूर्ण शरीर के विजातीय द्रव्य बाहर निकलते हैं जिससे शरीर में दबे अन्य रोग भी बाहर निकलते हैं जो उचित उपचार से जल्दी ही चले जाते हैं। उभार को चिकित्सकीय भाषा में रोग का तीव्र रोग की अपकर्शावस्था पुराने रोग का प्रत्यावर्तन रोग उपशन, संकट आदि कई नामों से पुकारते हैं इसका सामान्य अर्थ है कि एक रोग का तीव्र अवस्था में अलग-अलग स्थानों में विष का बाहर निकलना जो उपद्रव कहलाते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा में इसे सकारात्मक रूप में लिया जाता है, क्योंकि इसका अर्थ है हमारी जीवनी शक्ति अपना कार्य रही है। जिस प्रकार एक सामान्य ज्वर की चिकित्सा के समय तीव्र सिरदर्द व पेट दर्द एवं दस्त भी हो सकते हैं। क्योंकि सिरदर्द होने पर हम दवा से दबा देते हैं। इसी प्रकार पेटदर्द होने पर भी हम इसे दवा से दबा देते हैं, और दस्त को रोक देते हैं जिससे मल शरीर में ही अलग-अलग स्थानों पर जमा हो जाता है और प्राकृतिक उपचार के समय यह बाहर निकलने का प्रयास करता है जिससे सभी रोग उभर आते हैं।

एक प्राकृतिक चिकित्सक का कर्तव्य है कि इन उभारों की अनदेखी न करें और तत्काल उनकी चिकित्सा करें। जिससे रोगी की जीवनी शक्ति का अधिक क्षय न हो। रोगी को इससे घबराने की आवश्यकता नही है। रोगी को यह सोचना चाहिये कि उनका रोग जड़ से ही समाप्त हो रहा है जिससे उसके दुबारा हाने की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है।

प्राकृतिक चिकित्सा में मन, शरीर तथा आत्मा तीनों की चिकित्सा की जाती है-

प्राकृतिक चिकित्सा में शारीरिक मानसिक, आध्यात्मिक तीनों पक्षों की चिकित्सा एक साथ की जाती है। शरीर, मन और आत्मा तीनों के सामंजस्य का नाम ही पूर्ण स्वास्थ्य है क्योंकि शरीर के साथ मन जब तक स्वस्थ नहीं है तब तक व्यक्ति को पूर्ण स्वस्थ नही कहा जा सकता है। और शरीर, मन तभी स्वस्थ रह सकते हैं जब आत्मा स्वस्थ हो, केवल शरीर को ही स्वस्थ रखना मनुष्य का कर्तव्य नहीं है क्योंकि मन और आत्मा शरीर के अभिन्न अंग है। बिना मन के खुश हुये हमारी इंन्द्रियां कैसे खुश रह सकती है। यदि मन स्वस्थ नहीं हैं तो विषाल काय शरीर भी कुछ समय में समाप्त हो जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में इन तीनों की स्वास्थ्योन्नति पर बराबर ध्यान रखा जाता है।



यह प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता है कि प्राकृतिक चिकित्सक मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य को उससे शारीरिक स्वास्थ्य से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं और आत्मिक स्वास्थ्य या बल को सर्वोपरि मानते हैं, क्योंकि शरीर तभी स्वस्थ होगा जब आत्मा और मन स्वस्थ होता है।


भारतीय दर्शन के अनुसार आध्यात्मिक रूप से मनुष्य ही पूर्ण रूप से स्वस्थ होता है वही, जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। क्योंकि आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति ही एक स्वस्थ समाज की स्थापना कर सकता है। जहॉं हिंसा, द्वेष, का्रेध, घृणा आदि विकृत मानसिकता न पनप सके। प्राकृतिक चिकित्सा शारीरिक स्वास्थ्य के साथ ही महत्-तत्व चिकित्सा, राम नाम चिकितसा पर भी बल देती है जिससे मनुष्य आत्म संयम सीख सके और अपनी जीवन शैली को बदलकर संपूर्ण जीवन को उचित दिशा दे सके।

 

प्राकृतिक चिकित्सा में उत्तेजक औषधियों के सेवन का प्रश्न ही नहीं-

प्राकृतिक चिकित्सा में औषधियों का प्रयोग नहीं होता है। प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार आधार ही औषधि है। औषधि उपचार का सिद्धांत है कि रोग बाहरी चीज है जिसका शरीर पर आक्रमण होता है। अत: इसे औषधियों के माध्यम से दूर करना चाहिये। बाहर से आये कीटाणुओं को औषधियों से समाप्त करना चाहिये। जबकि संपूर्ण प्रकार की औषधियां एक प्रकार का विष हैं जिनसे व्यक्ति ठीक कैसे हो सकता है। एक निर्धारित मात्रा से अधिक लेने पर व्यक्ति की मौत हो सकती है लेकिन विष तो विष है आज नही तो कल अपना प्रभाव दिखायेगा ही। क्योंकि एक ही बार में ली गयी नींद की गोलियां व्यक्ति को तुरंत समाप्त कर देती हैं। लेकिन धीरे धीरे ली गयी गोलियां व्यक्ति को पंगु बनाती हैं शरीर को धीरे धीरे खाती हैं आज मिलने वाली दवा पर कुछ समय बाद प्रतिबंध लग जाता है। सभी दवाओं पर सावधानी के निर्देश दिये रहते हैं। प्रो0 ए0 क्लार्क के अनुसार ‘‘हमारी सभी आरोग्यकारी औषधियां विष हैं और इसके फलस्वरूप औषधि की हर एक मात्रा रोगी की जीवनी शक्ति का ह्रास करती है।’’

फिर भी मनुष्य उनका उपयोग करता रहता है लेकिन प्राकृतिक चिकित्सा में किसी प्रकार की औषधियों का प्रयोग नहीं किया जाता है। औषधियों को अत्यधिक हानिकारक माना जाता है जिससे रोग कम होने के बजाय बढ़ता जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा मानती है कि शरीर औषधि से नही बल्कि प्रकृति से निर्मित हुआ है इसलिये पंचतत्वीय शरीर की चिकित्सा के लिये पंच तत्वों का ही प्रयोग किया जाता है क्योंकि प्रकृति से बड़ा चिकित्सक और कोई नहीं है। प्रकृति के सभी सप्राण खाद्य पदार्थ ही औषधि है। शुद्ध वायु, धूप, जल आदि ही औषधि हैं जो रोग को दूर करने की क्षमता रखते हैं। अमेरिका के लियेण्डर के अनुसार -’’औषधि विज्ञान को जितनी कीटाणुनाशक दवायें मालूम हैं उनसे कही अधिक सूर्य स्नान कीटाणुनाशक शक्ति को बढ़ाता है।’’ प्राकृतिक चिकित्सा में कृत्रिम औषधियों का प्रयोग वर्जित माना जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में विषैली औषधियों को शरीर के लिये अनावश्यक ही नहीं घातक भी समझा जाता है। प्रकृति चिकित्सक है दवा नहीं। औषधि का काम रोग छुड़ाना नहीं है बल्कि यह वह सामग्री है जो प्रकृति के द्वारा मरम्त के काम में लगाई जाती है। इस लिये प्राकृतिक चिकित्सा में सभी सप्राण खाद्य सामग्री ही औषधि हैं।

 

प्राकृतिक चिकित्सा

प्राकृतिक चिकित्सा (नेचुरोपैथी / naturopathy) एक चिकित्सा-दर्शन है।

इसके अन्तर्गत रोगों का उपचार व स्वास्थ्य-लाभ का आधार है - 'रोगाणुओं से लड़ने की शरीर की स्वाभाविक शक्ति'। प्राकृतिक चिकित्सा के अन्तर्गत अनेक पद्धतियां हैं जैसे - जल चिकित्साहोमियोपैथीसूर्य चिकित्साएक्यूपंक्चरएक्यूप्रेशरमृदा चिकित्सा आदि। प्राकृतिक चिकित्सा के प्रचलन में विश्व की कई चिकित्सा पद्धतियों का योगदान है; जैसे भारत का आयुर्वेद तथा यूरोप का 'नेचर क्योर'।

प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली चिकित्सा की एक रचनात्मक विधि है, जिसका लक्ष्य प्रकृति में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध तत्त्वों के उचित इस्तेमाल द्वारा रोग का मूल कारण समाप्त करना है। यह न केवल एक चिकित्सा पद्धति है बल्कि मानव शरीर में उपस्थित आंतरिक महत्त्वपूर्ण शक्तियों या प्राकृतिक तत्त्वों के अनुरूप एक जीवन-शैली है। यह जीवन कला तथा विज्ञान में एक संपूर्ण क्रांति है।

इस प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में प्राकृतिक भोजन, विशेषकर ताजे फल तथा कच्ची व हलकी पकी सब्जियाँ विभिन्न बीमारियों के इलाज में निर्णायक भूमिका निभाती हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा निर्धन व्यक्तियों एवं गरीब देशों के लिये विशेष रूप से वरदान है।

 

प्राकृतिक चिकित्सा के मूलभूत सिद्धान्त

प्राकृतिक चिकित्सक निम्नलिखित छः मूलभूत सिद्धान्तों का अनुसरण करते हैं-

  • (१) कोई हानि नहीं करना
  • (२) रोग के कारण का इलाज करना (न किलक्षण का)
  • (३) स्वस्थ जीवन जीने तथा रोग से बचने की शिक्षा देना (रोगी-शिक्षा का महत्व)
  • (४) व्यक्तिगत इलाज के द्वारा सम्पूर्ण शरीर को रोगमुक्त करना (हर व्यक्ति अलग है)
  • (५) चिकित्सा के बजाय रोग कीरोकथाम करने पर विशेष बल देना
  • (६) शरीर की जीवनी शक्ति (रोगों से लड़ने की क्षमता) को मजबूत बनाना (शरीर ही रोगों को दूर करता है, दवा नहीं)

 

व्यवहार में प्राकृतिक चिकित्सा

प्राकृतिक चिकित्सा न केवल उपचार की पद्धति है, अपितु यह एक जीवन पद्धति है। इसे बहुधा 'औषधिविहीन उपचार पद्धति' कहा जाता है। यह मुख्य रूप से प्रकृति के सामान्य नियमों के पालन पर आधारित है। जहाँ तक मौलिक सिद्धांतो का प्रश्‍न है, इस पद्धति का आयुर्वेद से निकटतम सम्बन्ध है।

प्राकृतिक चिकित्सा के समर्थक खान-पान एवं रहन-सहन की आदतों, शुद्धि कर्म, जल चिकित्सा, ठण्डी पट्टी, मिटटी की पट्टी, विविध प्रकार के स्नान, मालिश्‍ा तथा अनेक नई प्रकार की चिकित्सा विधाओं पर विश्‍ोष बल देते है। प्राकृतिक चिकित्सक पोषण चिकित्साभौतिक चिकित्सावानस्पतिक चिकित्साआयुर्वेद आदि पौर्वात्य चिकित्सा, होमियोपैथी, छोटी-मोटी शल्यक्रिया, मनोचिकित्सा आदि को प्राथमिकता देते हैं।

 

प्राकृतिक चिकित्सा के व्यवहार में आने वाले कुछ कर्म नीचे वर्णित हैं-

मिट्टी चिकित्सा

मिट्टी जिसमें पृथ्वी तत्व की प्रधानता है जो कि शरीर के विकारों विजातीय पदार्थो को निकाल बाहर करती है। यह कीटाणु नाश्‍ाक है जिसे हम एक महानतम औषधि कह सकते है।

मिट्टी की पट्टी का प्रयोग

उदर विकार, विबंध, मधुमेह, सिर दर्द, उच्च रक्त चाप ज्वर, चर्मविकार आदि रोगों में किया जाता है। पीड़ित अंगों के अनुसार अलग अलग मिट्टी की पट्टी बनायी जाती है।

वस्ति (एनिमा)

वस्ति के लिये एक पिचकारी का उपयोग किया जाता है।

वस्ति (enima) वह क्रिया है, जिसमें गुदामार्ग, मूत्रमार्ग, अपत्यमार्ग, व्रण मुख आदि से औषधि युक्त विभिन्न द्रव पदार्थों को शरीर में प्रवेश कराया जाता है। उपचार के पूर्व इसका प्रयोग किया जाता जिससे कोष्ट शुद्धि हो। रोगानुसार शुद्ध जल, नीबू जल, तक्त, निम्ब क्वाथ का प्रयोग किया जाता है।

जल चिकित्सा

जल चिकित्सा

इसके अन्तर्गत उष्ण टावल से स्वेदन, कटि स्नान, टब स्नान, फुट बाथ, परिषेक, वाष्प स्नान, कुन्जल, नेति आदि का प्रयोग वात जन्य रोग पक्षाद्घात राधृसी, शोध, उदर रोग, प्रतिश्‍याय, अम्लपित आदि रोगो में किया जाता है।

सूर्य रश्मि चिकित्सा

सूर्य चिकित्सा

सूर्य के प्रकाश के सात रंगो के द्वारा चिकित्सा की जाती है। यह चिकित्‍सा शरीर में उष्‍णता बढ़ाता है। स्‍नायुओं को उत्‍तेजित करना वात रोग, कफ, ज्‍वर, श्‍वास, कास, आमवात पक्षाघात, ह्रदयरोग, उदरमूल, मेढोरोग, वात जन्‍यरोग, शोध चर्मविकार, पित्‍तजन्‍य रोगों में प्रभावी हैं।

उपवास

उपवास

सभी पेट के रोग, श्वास, आमवातसन्धिवात, त्वक विकार, मेदो वृद्धि आदि में विश्‍ोष उपयोग होता है।

 

 

 

 

 

प्राकृतिक चिकित्सा का इतिहास

 

प्राकृतिक चिकित्सा का इतिहास उतना ही पुराना है जितना स्वयं प्रकृति। यह चिकित्सा विज्ञान आज की सभी चिकित्सा प्राणालियों से पुराना है। अथवा यह भी कहा जा सकता है कि यह दूसरी चिकित्सा पद्धतियों कि जननी है। इसका वर्णन पौराणिक ग्रन्थों एवं वेदों में मिलता है, अर्थात वैदिक काल के बाद पौराणिक काल में भी यह पद्धति प्रचलित थी।

आधुनिक युग में डॉ॰ ईसाक जेनिग्स (Dr. Isaac Jennings) ने अमेरिका में 1788 में प्राकृतिक चिकित्सा का उपयोग आरम्भ कर दिया था।1 जोहन बेस्पले ने भी ठण्डे पानी के स्नान एवं पानी पीने की विधियों से उपचार देना प्रारम्भ किया था।

महाबग्ग नामक बोध ग्रन्थ में वर्णन आता है कि एक दिन भगवान बुद्ध के एक शिष्य को सांप ने काट लिया तो उस समय विष के नाश के लिए भगवान बुद्ध ने चिकनी मिट्टी, गोबर, मूत्र आदि को प्रयोग करवाया था और दूसरे भिक्षु के बीमार पड़ने पर भाप स्नान व उष्ण गर्म व ठण्डे जल के स्नान द्वारा निरोग किये जाने का वर्णन 2500 वर्ष पुरानी उपरोक्त घटना से सिद्ध होता है।

प्राकृतिक चिकित्सा के साथ-2 योग एवं आसानों का प्रयोग शारीरिक एवं आध्यात्मिक सुधारों के लिये 5000 हजारों वर्षों से प्रचलन में आया है। पतंजलि का योगसूत्र इसका एक प्रामाणिक ग्रन्थ है इसका प्रचलन केवल भारत में ही नहीं अपितु विदेशों में भी है।

प्राकृतिक चिकित्सा का विकास (अपने पुराने इतिहास के साथ) प्रायः लुप्त जैसा हो गया था। आधुनिक चिकित्सा प्राणालियों के आगमन के फलस्वरूप इस प्रणाली को भूलना स्वाभाविक भी था। इस प्राकृतिक चिकित्सा को दोबारा प्रतिष्ठित करने की मांग उठाने वाले मुख्य चिकित्सकों में बड़े नाम पाश्चातय देशों के एलोपैथिक चिकित्सकों का है। ये वो प्रभावशाली व्यक्ति थे जो औषधि विज्ञान का प्रयोग करते-2 थक चुके थे और स्वयं रोगी होने के बाद निरोग होने में असहाय होते जा रहे थे। उन्होने स्वयं पर प्राकृतिक चिकित्सा के प्रयोग करते हुए स्वयं को स्वस्थ किया और अपने शेष जीवन में इसी चिकित्सा पद्धति द्वारा अनेकों असाध्य रोगियों को उपचार करते हुए इस चिकित्सा पद्धति को दुबारा स्थापित करने की शुरूआत की। इन्होने जीवन यापन तथा रोग उपचार को अधिक तर्कसंगत विधियों द्वारा किये जाने का शुभारम्भ किया। प्राकृतिक चिकित्सा संसार मे प्रचलित सभी चिकित्सा प्रणाली से पुरानी है आदिकाल के ग्रंथों मे जल चिकित्सा व उपवास चिकित्सा का उल्लेख मिलता है पुराण काल मे (उपवास)को लोग अचूक चिकित्सा माना करते थे

 

 

प्राकृतिक चिकित्सा का विदेशों मे विकास 

भारत में प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति का जन्म हुआ। तथा इसकी उपयोगिता की महत्ता भी भारत में अति प्राचीन समय से चली आ रही है। जिन-2 स्वास्थ्य सम्बन्धी प्राकृतिक क्रियाओं का हम प्रयोग कर रहे हैं वे सभी उपचार की पद्धतियां पूर्वावस्था में प्राचीन भारत में विद्यमान थी। भारत में ही रोग निवारण के लिए इस पद्धति का प्रयोग नहीं किया वरन् अन्य कई देशों में भी इस पद्धति का प्रयोग आज किया जा रहा है। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति भारत की ही देन है परन्तु कुछ कारणों तथा अन्य विकासों के प्रभावानुसार यह पद्धति भारत में लुप्त हो गई। इसके बाद इसके पुनः निर्माण का श्रेय विदेशों (पाश्चातय देशों) को ही है।

ईसा से कई सौ वर्ष पूर्व ही हिपोक्रेटीज ने प्राकृतिक चिकित्सा का पुनः पुनरूथान किया। इसी कारण इन्हें 'चिकित्सा का जनक' कहते है। 18वीं शताब्दी के मध्य से कुछ लोगों के प्रयास के फलस्वरूप प्राकृतिक चिकित्सा का प्रारम्भ तथा विकास फिर शुरू होने लगा तथा हम इस चिकित्सा को पुनः जानने लगे। इस पद्धति के पुनरूथान में जिन महान और प्रभावशाली व्यक्तियों का योगदान है वह पहले से ही रोगों को ही उपचार के लिए औषधियों का प्रयोग करते थे परन्तु औषधियों के प्रयोग के बाद भी रोगों पर सफलता न पा सकने तथा उसके प्रतिकूल प्रभावों को जानने के बाद और स्वयं पर भी औषधि चिकित्सा की प्रणाली के कटुफल चखने के बाद प्राकृतिक चिकित्सा की शरण ग्रहण कर स्वस्थ जीवन जीने लगे। इन्होने इस पद्धति के चमत्कारों से प्रभावित होने के कारण इस पद्धति के प्रचार-प्रसार और विकास में लग कर प्राकृतिक चिकित्सा को नया जन्म दिया।

जेम्स क्यूरी और सर जॉन फ्लायर

डॉ॰ फ्लायर (Sir John Floyer) इंग्लैड के लिचफील्ड नगर के निवासी थे। लिचफील्ड के एक सोते के पानी में कुछ किसानों को नहाकर स्वास्थ्य लाभ करते देख उन्हे जल के स्वास्थ्यवर्द्धक प्रभाव के सम्बन्ध में अधिकाधिक जांच पड़ताल करने की प्रबल इच्छा हुई। इसके कारण उनका रूझान इस पद्धति की ओर हुआ।

डॉ॰ जेम्स क्यूरी (James Currie) लिवरपुल के रहने वाले थे सन् 1717 ई. को लगभग इन्होने एक जल चिकित्सा सम्बन्धित पुस्तक लिखकर उसका प्रकाश कराया।

लुई कूने

डॉ॰ लूई कूने (Louis Kuhne) एक प्रसिद्ध चिकित्सक के रूप में जाने जाते है। इनका जन्म 1844 में जर्मनी में हुआ। इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली को विषेशकर जल चिकित्सा को उन्नति के शिखर तक पहुंचाने के लिए जीवन का अधिकांश समय दिया। इसके साथ ही उन्होने दो महत्वपूर्ण पुस्तकें "The new science of Healing" तथा "The science of facial Expression" लिखी।

इन्होने रोग के कारण और उपचार पर जोर देते हुए चिकित्सा प्रारम्भ की और अन्ततः लिपजिंग (Leipzig) नगर में अपना एक चिकित्सालय भी स्थापित किया। जल चिकित्सा में प्रयोग होने वाले उपकरणों की डिजाइनिंग करके हिप बाथ आदि की शुरूआत में महत्वपूर्ण योगदान दिया जो आज भी प्राकृतिक चिकित्सा में उनके नाम से प्रसिद्ध है (जैसे मेहन स्नान को लूई कूने नाम से ही जाना जाता है।) उन्होने विजातीय द्रव्य के पनपते की और उसके विभिन्न स्थानों पर जमा होने पर विस्तृत रूपरेखा तैयार की।

आपका जन्म एक जुलाहे परिवार में हुआ था। लेकिन इन्हे कई दर्दनाक परिस्थितियों का सामना करना पडा। माता-पिता के आकास्मक निधन व अपने शरीर के असाध्य फोडों के कारण औषधिविज्ञान के चिकित्सकों के द्वारा हतोत्साहित होना पडा। इसी कारण उन्हे अपने लिए किसी सुदृढ चिकित्सा प्रणाली की आवश्यकता हुई और प्राकृतिक चिकित्सा की शरण ले स्वास्थ्य को प्राप्त करने में सफल भी हो गए।

विन्सेंज प्रिस्निज

विन्सेंज प्रिस्निज (Vincenz Priessnitz) जन्म सन् 1799 में आस्ट्रेलिया में हुआ। इनको जल चिकित्सा का जनक कहा जाता है। इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा में आने से पूर्व एक घायल देखा जो बार-2 अपने उस घाव को लेकर पानी के तलाब में लेंटता था। ऐसा कुछ दिनों करने पर उसका घाव पूरी तरह ठीक हो गया था इसे देखकर उन्होने कई प्रयोग करे परन्तु इन प्रयोगों के करने के कारण उनको न्यायालय में भी उपस्थित होना पड़ा परन्तु अन्ततः न्यायालय द्वारा इस पद्धति को हितकारी मानते हुए न्यायालय द्वारा उनके हित में ही फैसला सुनाया गया। इसके पश्चात उन्होने प्राकृतिक चिकित्सा का खुलकर उपचार अपने घर पर ही देना शुरू किया। प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में उनका विरोध होने पर भी बिना डरे उन्होने अपने पूरे विश्वास और लगन से इसके अनेकों चमत्कार किए तथा पूरी दुनिया द्वारा भी माने गए।

डॉ॰ इसाक जेनिंग

औषधि विज्ञान के डॉक्टर के रूप में पहुचाने जाने वाले डॉ॰ जेनिंग (Dr. Isaac Jenning) अमेरिका में 1788 में पैदा हुए और उन्होने प्रकृति एवं सफाई को अधिक महत्व देते हुए एक बुखार के रोगी को उपवास, विश्राम और अत्यधिक पानी के सेवन के साथ शान्त वातावरण में रहने की सलाह दी इस प्रकार वह अन्य दुसरे रोगों में एक टाइफाइड के रोगी को जिस पर दवाओं का कोई असर नहीं हो रहा था का प्राकृतिक उपचार किया। जिससे रोगी की स्थिति में सुधार होने लगा। सन् 1822 में उन्होने पूरी तरह से दवाओं का प्रयोग बन्द कर दिया और प्राकृतिक चिकित्सा करने लगे। इसका प्रयोग करने से रोगियों की मृत्युदर में गिरावट आने पर चमत्कारी प्रभाव सामने आने लगे। तथा स्वस्थ होने में भी परिणाम शीघ्र प्राप्त होने लगे। इससे उन्होने निष्कर्ष निकाला की रोग बाहरी वातावरण की नहीं वरन जीवनी शक्ति के ह्रास की देन है। उनकी उपचार पद्धति को आर्थोपैथीके नाम से जाना जाता है। इन्होने तीन किताबें लिखी "The medicial reform", "Philosophy of human life" तथा "The tree of human life as human degeneracy" हैं।

सेबस्टियन नीप

फादर नीप (Sebastian Kneipp) ने जल चिकित्सा पर अनेकों प्रयोग व आविष्कार किये। इन्होने जल चिकित्सा का प्रयोग कर बड़ी सफलता प्राप्त की। इन्होने एक स्वास्थ्य गृह का संचालन 45 वर्षों तक कुशलता पूर्वक किया तथा उसके द्वारा अनेकों लोगों को प्रशिक्षित किया। इनके नाम से जर्मनी में एक नील स्टोर्स है जहां जड़ी-बूटियों, तेल, साबुन तथा स्नान सम्बन्धी आवश्यक वस्तुएं तथा स्वास्थ्यप्रद प्राकृतिक भोजनों का प्रदर्शन किया जाता है। इन्होने सन् 1857 ई. में जल चिकित्सा पर "My Water Cure" नामक पुस्तक लिखी जिसका हिन्दी रूपान्तरण 'जल चिकित्सा' के नाम से आरोग्य मंदिर, गोरखपुर से प्रकाशित हुआ है।

आर्नल्ड रिक्ली

अर्नाल्द रिक्ली (Arnold Rickli) एक व्यापारी होते हुए भी प्राकृतिक चिकित्सा से प्रभावित होकर व्यापार छोड़कर इस चिकित्सा क्षेत्र में आ गए। इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा में एक अध्ययन वायु चिकित्सा एवं धूप चिकित्सा को जोड दिया। बाद में इन्होने सन् 1848 ई. में आस्ट्रिया में धूप और वायु का एक सेनेटोरियम स्थापित किया जो संसार का प्रथम प्राकृतिक चिकित्सा भवन बना।

एडोल्फ जुस्ट

एडोल्फ जुस्ट (Adolf Just) जर्मनी के रहने वाले थे। इनके द्वारा मिट्टी चिकित्सा का विकास तथा प्रयोग करने के बाद इसकी उपयोगिता और महत्ता को माना जाने लगा। इन्होने मिट्टी के अनेकों प्रयोग कर रोगों की चिकित्सा की। इनके द्वारा ही मालिश की क्रिया का जन्म भी हुआ। इन्होने महत्वपूर्ण पुस्तक "Return to nature" भी लिखी जो आज संसार भर में सुप्रसिद्धि प्राप्त कर रही है।

आर्नल्ड एहरेट

डॉ॰ आर्नल्ड (Arnold Ehret) भी प्रसिद्ध चिकित्सकों में से हैं। ये जर्मनी के रहने वाले थे परन्तु इनका कार्यक्षेत्र अमेरिका था। इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा की फलाहारऔर उपवास की पद्धति पर अधिक जोर दिया तथा बड़े बड़े रोगों को केवल आहार तथा उपवास द्वारा ही मार भगाया। इन्होने कई पुस्तकें लिखी जिनमें से दो पुस्तके अधिक प्रसिद्ध है- "Rational fasting" और "Mucusless Diet healing system"।

हेनरी लिण्डल्हार

हेनरी लिण्डल्हार (Henry Lindlahr) का जन्म 1 मार्च 1953 को हुआ। इन्होने अपना सम्पूर्ण जीवन प्राकृतिक चिकित्सा के प्रचार प्रसार में लगा दिया। इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा से होने वाले लाभों तथा प्रभावों को वैज्ञानिक आधार द्वारा प्रस्तुत किया। इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धान्त तीव्ररोग अपने चिकित्सक स्वयं होते हैं का समर्थन दिया जबकि प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धान्तों के विरूद्ध जाकर रोगों उपचार में दूसरी पद्धतियों की औषधियों के सेवन पर जोर दिया। सन् 1904 में 51 वर्ष की अवस्था में एम.डी. की उपाधि प्राप्त की। इन्होने कई पुस्तकें लिखी जिनमें मौलिक पुस्तकें, 'फिलोसफी ऑफ नेचर केयर', 'प्रैक्टिस ऑफ केयर कुक बुक इनके अपने निजी अनुभवों द्वारा सम्पादित की हुई है।

बेनिडिक्ट लुस्ट

बेनिडिकट लुस्ट (Benedict Lus), फादर नीप के प्रिय शिष्यों में से एक थे। इनका जन्म 3 फरवरी 1872 ई. को हुआ था। इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा का प्रचार प्रसार अमेरिका में जाकर किया। अमेरिका में ही इन्होने नीप-वाटर क्योर नामक एक मासिक पत्र निकाला तथा बाद में एक पत्र नेचर्स-पाथ भी स्थापित किया इनके द्वारा न्यूयार्क में एक स्कूल तथा कालेज की स्थापना की। जो अब सुप्रसिद्ध यंग बार्न्स अस्पताल में परिणत हो गया है। यही नहीं इसके अतिरिक्त भी इन्होने कई अन्य अस्पतालों स्कूलों तथा संस्थाओं की भी स्थापना की। इनका देहान्त 1950 ई. अपने द्वारा स्थापित अस्पताल में ही हुआ।

जे. एच. टिल्डेन

जेम्स हेनरी टिल्डेन (John Henry Tilden) जन्म अमेरिका में हुआ। इन्होने उपचार में कारणों को दूर करने पर जोर दिया जिनके द्वारा रोग उत्पन्न होते है। तथा रोगी को प्राकृतिक जीवन जीने की शिक्षा पर भी इन्होने बल दिया इन्होने प्रसिद्ध पुस्तक "Impaired health" भी लिखी।

हेनरिच लेमैन

हेनरिच लेमैन (Johann Heinrich Lahmann) जर्मनी में रहने वाले तथा एलोपैथी को मानने वाले थे। परन्तु बाद में इन्होने ड्रेसडेन में एक स्वास्थ्य-गृह भी बनाया जिसके द्वारा इन्होने मानव स्वास्थ के लिए पोषक तत्वों की आवश्यकता पर अनुसंधान किए तथा यह सिद्ध किया कि स्वस्थ रहने के लिए आहार ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

बरनर मैकफेडन

बरनर मैकफेडन (Bernarr Macfadden) बहुत ही प्रसिद्ध चिकित्सक थे। इन्होने पूरा जीवन प्राकृतिक जीवन व व्यायाम पद्धतियों का अनुभव कर उसे प्रयोग करके रोगों को दूर करने पर जोर दिया। व्यायाम पद्धतियों का स्वयं अनुभव करके "फादर ऑफ फिजिकल कलचर" की उपाधि को प्राप्त किया। इन्होने "Book of health", "Fasting for health" तथा "Macfaddens eneyolopedia for physical culture" आदि दर्जनो पुस्तकों भी लिखी। उपवास पर इन्होने अपनी पकड़ बनाई तथा उपचार में इसका प्रयोग किया।

सर विलियम अर्बुथनाट लेन

सर विलियम अर्बुथनाट लेन (Sir William Arbuthnot Lane) एक एलोपैथी के चिकित्स थे फिर भी इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा के प्रभावों से खूब प्रभावित हुए तथा इस पर विश्वास करके इन्होने इसका खूब प्रचार प्रसार किया। इन्होने एक सुप्रसिद्ध पुस्तक "Good Health" भी लिखी।

जे. एच. केलाग

जॉन हार्वे केलॉग (John Harvey Kellogg) को पूरा संसार प्राकृतिक चिकित्सक के नाम से जानता है। इनका जन्म 2 6 फ़रवरी सन् 1852 ई. को अमेरिका में हुआ। इन्होने एक विषष प्रकार का बैटिल क्रीक सेनीटोरियम बनाया जिसमें सभी चिकित्सा प्रणालियों जैसे जल चिकित्सा, आहार चिकित्सा, शल्य चिकित्सा, स्वीडिश मूवमेन्ट तथा विद्युत-चिकित्सा आदि द्वारा उपचार होता है। इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में कई प्रकार के आविष्कार भी किए जिनमें विद्युत ज्योतिस्नान (Electric lights bath) महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त इन्होने “दि न्यु डायटेरिक्स”, “रैशनल हाइड्रोथिरैपी” तथा “होम हैंड बुक ऑफ हाइजीन एण्ड मेडिसिन” आदि पुस्तकें भी लिखी।

सर विलियम

यह भी हेनरिच लेमैन तथा सर विलियम की तरह ही एक प्रसिद्ध ऐलोपैथी के चिकित्सक होते हुए भी प्राकृतिक चिकित्सा में अगाध विश्वास रखते थे। इन्होने "The principles practice of medicine" नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी।

ब्ले सेलमन एम. डी., विन्टर निट्रल, आटो कार्क, एडगर, जे. सैकसन शेल्टन, इलियर, पंज, ओसवाल्ड, हरबर्ट स्पेन्सर, टर्न वेटर जान, बोन पीजली, हैन्स माल्टेन, एडविन बैबिट एन. डी., मिल्टन पावल आदि अनेकों ही और भी चिकित्सक हैं जिन्होने अपना जीवन प्राकृतिक चिकित्सा को समर्पित किया तथा इसके द्वारा रोगों का उपचार करके अनेकों रोगों पर विजय प्राप्त की।

भारतीय प्राकृतिक चिकित्सक

भारत में आधुनिक युग में डी. वेंकट चेलापति शर्मा द्वारा वर्ष 1894 में डॉ॰ लूई कूने के प्रसिद्ध पुस्तक 'द न्यू साइंस ऑफ हीलिंग' (The new science of healing) का तेलुगु भाषा में अनुवाद करने के साथ प्राकृतिक चिकित्सा का प्रादुर्भाव हुआ। इसके पश्चात 1904 में बिजनौर निवासी श्री कृष्ण स्वरूप ने इसका अनुवाद हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं में किया। पुस्तकों के आगमन के साथ-2 लोगों की रूचि और उसके अध्ययन में भी वृद्धि होनी प्रारम्भ हुई और शीघ्र ही यह चिकित्सा पद्धति लोगों में प्रचलित होनी प्रारम्भ हुई। महात्मा गांधी जी एडोल्फ जूस्ट की पुस्तक 'रिटर्न टू नेचर' (Return to nature) पढकर बहुत प्रभावित हुए। उनके जीवन में यह पद्धति गहराई तक चली गई और उन्होने तुरन्त प्रभाव से अपने स्वयं के शरीर तथा परिवार के लोगों और आश्रम में रहने वाले लोगों पर उपचार प्रयोग प्रारम्भ किए। अन्ततः भारत जैसे गरीब देशों में स्वास्थ्य के लिए यह पद्धति सर्वोत्तम पद्धति है। इसका प्रचार उन्होने गांव-2 में करने के साथ ही पूना के पास उरलिकांचन में एक प्राकृतिक चिकित्सालय की स्थापना की और इस चिकित्सालय के चिकित्सक भी बने। उरलिकांचन में पहला प्राकृतिक चिकित्सालय स्थापित होने के कारण ही दक्षिण भारत में प्राकृतिक चिकित्सा का प्रादुर्भाव सबसे पहले हुआ है।

डॉ॰ कृष्णम राजू ने विजयवाडा से थोड़ी दूरी पर ही एक विशाल चिकित्सालय की स्थापना की। इसके साथ साथ देश में डॉ॰ जानकीशरण वर्मा, डॉ॰ शरण प्रसाद, डॉ॰ महावीर प्रसाद पोद्दार, डॉ॰ गंगा प्रसाद गौड, डॉ॰ विट्ठल दास मोदी, डॉ॰ हीरालाल, महात्मा जगदीशवरानन्द, डॉ॰ कुलरन्जन मुखर्जी, डॉ॰ वी. वेंकट राव, डॉ॰ एस. जे. सिंह, इत्यादि के प्रयासों से कई सरकारी संस्थाएं तथा दिल्ली में केन्द्रिय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा अनुसंधान परिशद इत्यादि की स्थापना हेतु मुख्य योगदान दिया जिसके फलस्वरूप आज मान्यता प्राप्त चिकित्सालय पद्धति के रूप में स्वीकार की गई।2 इनमे से कुछ का जीवन परिचय इस प्रकार है:

डॉ॰ कुलरंजन मुखर्जी

प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में डॉ॰ कुलरंजन मुखर्जी का बहुत बड़ा योग दान रहा। बचपन से ही इन्हें प्रकृति एवं प्राकृतिक चिकित्सा से विशेष प्रेम था। तथा किशोरावस्था में इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा का प्रयोग रोग उपचार के लिए शुरू किया। सन् 1930 में डॉ॰ कुलरंजन ने हाजरा रोड, कोलकाता में नेचर केयर अस्पताल में कार्य किया। इससे भी पूर्व उन्होनें मदारीपुर (अब बांग्लादेश के ढाका में) में नेचर केयर अस्पताल के कार्य किया तथा सफल परीक्षण प्राप्त किए। अपने जीवनकाल में उन्होने हजारों असाध्य रोगियों के रोगों ठीक किया। इसी कारण उनकी तुलना ऐलोपैथी के सीनियर डॉ॰ विधान चन्द्र के साथ की जाती थी। गांधी जी को भी इनके द्वारा दी गई उपचार पद्धति पर विश्वास था तथा वह भी इनके पास रोगियों को भेजा करते थे। इन्होने एक पुस्तक भी लिखी - 'प्रोटेक्टिव फुड्स इन हेल्थ एण्ड डिसीज'। इसके अतिरिक्त इन्होने अंग्रेजी और हिन्दी भाषा में कई महत्वपूर्ण पुस्तकें भी लिखी ये पुस्तकें आज भी सराहनीय एवं सहायक है। डॉ॰ मुखर्जी ने केवल रोगियों की चिकित्सा करते थे अपितु वह अपनी आय का 50 प्रतिशत भाग प्राकृतिक चिकित्सा में लगते थे। यह बहुत ही इमानदार तथा सरल व्यक्तित्व के व्यक्ति थे।

सन् 1946 में डॉ॰ मुखर्जी ने अखिल भारतीय प्राकृतिक चिकित्सा परिषद की स्थापना की इस प्रकार इनके द्वारा प्राकृतिक चिकित्सा में अद्भुत चमत्कार किए।

डॉ॰ विट्ठलदास मोदी

इनका जन्म 25 अप्रैल सन् 1912 ई. में जनपद गोरखपुर में हुआ था। इन्होने मैट्रिक तक की शिक्षा गोरखपुर से लेकर आगे की शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से की। वह अध्यापक बनना चाहते थे। एक बार यह भंयकर रूप से बीमार पड गए तथा सभी तरह की दवा लम्बे समय तक लेने पर आराम नहीं हुआ तो इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा श्री बालेश्वर प्रसाद सिंह के मार्गदर्शन में न केवल रोगमुक्त हुए बल्कि उनका स्वास्थ्य पहले से भी उत्तम हो गया। इसी से ही उनकी आस्था और निष्ठा प्राकृतिक चिकित्सा में लग गई।

आगे चलकर सन् 1940 ई. में इन्होने गोरखपुर में आरोग्य मंदिर प्राकृतिक चिकित्सालय की स्थापना की। इन्होने एडोल्फ जस्ट द्वारा लिखी पुस्तक 'रिटर्न टू नेचर' (Returne to nature) का हिन्दी अनुवाद करके भारतीय प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में एक बड़ा कार्य किया। इन्होने गांधी जी की रचनात्मक प्रवृतियों पर केन्द्रित पत्रिका 'जीवन-साहित्य' का संपादन भी किया।

इन्होने भारत में प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में ज्ञान व अनुभव का प्रयोग कर खूब सम्मान तथा प्रतिष्ठा हासिल की। विदेशों में भी इस पद्धति के अध्ययन के लिए उन्होने अनेकों देशों की यात्रा की। वह अमेरिका भी गए तथा वहां के प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र देखकर तथा अनुभव प्राप्त कर उन्होने 'यूरोप-यात्रा' नामक एक पुस्तक लिखी।

प्राकृतिक चिकित्सा की शिक्षा के लिए एक शिक्षा केन्द्र की स्थापना 1962 में गोरखपुर में 'स्कूल ऑफ नेचूरल थेराप्यूटिक्स' नाम से की। इसके द्वारा उन्होने हजारों बालक-बालिकाओं को प्राकृतिक चिकित्सा की शिक्षा दी तथा आज वे शिष्य देश के विभिन्न भागों में प्राकृतिक चिकित्सा के काम में लगे हैं। इन्होने शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए 'रोगों की सरल चिकित्सा', 'स्वास्थ्य के लिए फल तरकारियाँ', 'बच्चों का स्वास्थ्य एवं उनके रोग', 'दुग्ध-कल्प', 'उपवास से लाभ', 'उपवास चिकित्सा' आदि अनेकों पुस्तकों को अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं अनुवाद भी किया। मोदी जी ने प्राकृतिक चिकित्सा में मानस के निर्मलीकरण के लिए भगवान बुद्ध द्वारा प्रवर्तित विपश्यना ध्यान-साधना का समावेश किया। इस प्रकार अपने जीवन के 60 वर्षों प्राकृतिक चिकित्सा को समर्पित किए।3

डॉ॰ जानकीशरण वर्मा

ये एक सफल चिकित्सक थे। इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन्होने हिन्दी भाषा में बहुत सारी पुस्तकें लिखी। इन्होने 'अचूक चिकित्सा के प्रयोग' नाम्क एक श्रेष्ठ पुस्तक की रचना की। इनकी पुस्तक पढकर ही प्राकृतिक चिकित्सा प्रेमी मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं। अपनी इन पुस्तकों के कारण ही उनका नाम प्राकृतिक चिकित्सा के इतिहास में सदा अमर रहेगा।

डॉ॰ के लक्ष्मण शर्मा

इनका जन्म तमिलनाडु में हुआ था। इन्होने उच्च शिक्षा प्राप्त करके सारा जीवन प्राकृतिक चिकित्सा के लिए समर्पित कर दिया। इन्होने अति प्रसिद्ध पुस्तक 'प्रेक्टिकल नेचर केयर' की रचना की। इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में खूब प्रगति की।

डॉ॰ बालेश्वर प्रसाद सिंह

इनका प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में योगदान बहुमूल्य है। इन्होने भारत के कोने-2 में प्राकृतिक चिकित्सा का प्रचार प्रसार किया। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए इन्होने बहुत सारे शिविरों का आयोजन कर हजारों लोगों को भी उपचार उपलब्ध करा कर उन्हें रोग मुक्त किया। इनके द्वारा अनेक पत्रिकाओं का सम्पादन कुशलता-पूर्वक किया गया। 'जीवन-सखा' एक श्रेष्ठ पत्रिका थी। इन्होने गांधी जी से प्राकृतिक चिकित्सा की प्रेरणा प्राप्त की तथा अपना पूरा जीवन प्राकृतिक चिकित्सा को सर्म्पित किया। इन्होने अनेकों युवकों को प्रशिक्षण देकर सुयोग्य प्राकृतिक चिकित्सक बनाया।

महात्मा गांधी

महात्मा गांधी महान प्राकृतिक चिकित्सक थे। इन्होने भारत में प्राकृतिक चिकित्सा के अतिरिक्त उपवास और सत्याग्रह के नियमों का भी अनुपालन किया। इन्होने सर्वप्रथम भारत में प्राकृतिक आश्रम का निर्माण किया। इन्होने 'आरोग्य की कुंजी' का सम्पादन किया जिसका प्रचार-प्रसार देश और विदेश में हुआ तथा लाखों लोगों ने इससे लाभ उठाया।

गांधी जी ने एडोल्फ जुस्ट द्वारा रचित प्रसिद्ध पुस्तक 'रिटन टू नेचर' का अध्ययन करके प्राकृतिक चिकित्सा की प्रेरणा प्राप्त की और इस क्षेत्र में बहुत सफलता प्राप्त की। इन्होने भारत के साथ-2 विदेशों में भी इस पद्धति का प्रचार किया। इनकी लिखी पुस्तकों में "Diet & Diet reform" अपने समय की आहारशास्त्र की लाभकारी और उपयोगी पुस्तक है।

डॉ॰ वेगिराज कृष्णम राजू

इनका जन्म 1910 में हुआ। इन्होने आन्ध्र प्रदेश में विशाल प्राकृतिक चिकित्सालय की स्थापना की तथा एक आदर्श प्राकृतिक चिकित्सा शिक्षण संस्था का संचालन किया। इन्होने कई पुस्तकें भी लिखी जो प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है।

डॉ॰ महावीर प्रसाद पोद्दार

इस प्राकृतिक चिकित्सक ने महात्मा गांधी जी से प्रेरणा प्राप्त कर इस पद्धति को अपनाया। अपनी सम्पूर्ण आयु प्राकृतिक चिकित्सालय में रहकर हजारों निराश रोगियों को जीवन दान दिया और हिन्दी में अनेक किताबों भी लिखी।

सन्त विनोबा भावे

विनोबा भावे महात्मा गांधी जी के आध्यात्मिक आचार्य थे तथा इन्होने भी राम नाम तत्व की प्राकृतिक चिकित्सा से महत्वपूर्ण बताते हुए 'राम नाम एक चिन्तन' पुस्तक में प्राकृतिक जीवन के मूलभूत आदर्शों का बड़े सुन्दर विवेचन किया। इन्होने कई सम्मेलनों में प्राकृतिक चिकित्सकों का विषेष मार्गदर्शन किया।

मोरार जी देसाई

अंग्रेजी शासन के समय एक उच्च पद पर कार्यरत होते हुए भी इन्होने इसका त्याग कर स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लिया और भारत के प्रधानमंत्री का पद भार को सम्हालते हुए प्राकृतिक चिकित्सा को नया मोड दिया। इन्होने कई पुस्तकों के द्वारा अपने अनुभवों को जन-2 तक पहुचाया।

डॉ॰ शरण प्रसाद

आपने अनेक वर्षों तक भारतीय प्राकृतिक चिकित्सा विद्यापीठ कलकत्ता में प्राचार्य एवं मुख्य चिकित्सक के रूप में कार्य किया तथा कई वर्षों तक गांधी जी द्वारा स्थापित निसर्गोपचार केन्द्र उरूलीकंचन में मुख्य चिकित्सक के पद पर कार्य किया। इन्होने अपने अनुभवों के आधार पर कई श्रेष्ठ तथा प्रमाणिक ग्रन्थों का लेखन किया जिनका प्रकाशन सर्व सेवा संघ द्वारा किया गया।

डॉ॰ एस. जे. सिंह

ये श्रेष्ठ प्राकृतिक चिकित्सकों में से एक हैं। इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा का प्रशिक्षण विदेश से प्राप्त किया तथा अपने जीवन का बड़ा काल प्राकृतिक चिकित्सा को समर्पित किया। इन्होने लेलिंग का अंग्रेजी भाषा से उर्दु तथा हिन्दी लिपि में सविस्तार अनुवाद किया जो उस समय के महत्वपूर्ण योगदानों में से एक था। ये बहुत ही लोकप्रिय प्राकृतिक चिकित्सक थे।

डॉ॰ बी. वेंकटराव तथा डॉ॰ श्रीमती विजय लक्ष्मी

ये दोनो ही डॉ॰ कृष्णम राजू के शिष्य थे तथा उनसे प्रशिक्षण ग्रहण कर इन्होने हैदराबाद में एक विशाल प्राकृतिक चिकित्सालय की स्थापना की। इसी के साथ नेचर केयर कॉलेज की स्थापना कर उसे उस्मानिया विश्वविद्यालय से मान्यता भी दिलाई जहां M.B.B.S. योग्यता के बराबर उपाधि छात्रों को दी जाती थी।

डॉ॰ एस. स्वामीनाथन

ये एक महान चिकित्सक तथा डॉ॰ स्व. के लक्ष्मण शर्मा के शिष्य भी थे। उच्च शिक्षा ग्रहण कर केन्द्रीय सरकार में उच्च अधिकार के पद पर कार्यरत होते हुए भी प्राकृतिक चिकित्सा के प्रचार प्रसार में निस्वार्थ भाव से बढ चढ कर सेवा की। यह 'लाइफ नेचुरल' अंग्रेजी मासिक पत्रिका के सम्पादक के साथ-2 'जीवन सखा' मासिक पत्रिका का भी सम्पादन किया।

डॉ॰ हीरा लाल

भारत के प्राकृतिक चिकित्सकों में डॉ॰ हीरा लाल जी का विषेष स्थान है। इन्होने डॉ॰ विट्ठल दास और डॉ॰ महावीर प्रसाद पोद्दार के साथ प्राकृतिक चिकित्सा का कार्य आरोग्य मन्दिर में प्रारम्भ किया। इसके साथ-2 ही इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा के प्रचार-प्रसार के लिए गांव-गांव जाकर अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी निभाई साथ ही प्रकाशन के कार्य में भी क्रियाशील रहे। चिकित्सा के प्रचार प्रसार में इन्होने अपना जो सहयोग दिया उसके परिणामस्वरूप जन-जन तक इस चिकित्सा को पहुंचाना सम्भव हो पाया। इन्होने महामंत्री के रूप में अखिल भारत प्राकृतिक चिकित्सा परिषद एवं योग परिषद के कार्य भार को संभाला। इनके द्वारा कई पुस्तकों का सम्पादन हिन्दी व अंग्रेजी में किया गया।

डॉ॰ जे. एम. जस्सावला

यह भी लम्बे समय से प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र से जुडे हुए हैं तथा इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा के अनुभवों के आधार पर प्राकृतिक चिकित्सकों को अनेकों उच्च कोटि की प्रमाणिक पुस्तकें भी दी है।

डॉ॰ गौरीशंकर

डॉ॰ एम. जस्सावला की तरह इन्होने भी अपने जीवन के लगभग 44 वर्ष प्राकृतिक चिकित्सा संगठनों एवं अन्य रचनात्मक कार्यो में सक्रिय रूप से कार्य करते हुए शिक्षण प्राप्त कर उत्तर प्रदेश में प्रमुख चिकित्सक के रूप में कार्य किया। इन्होने 1980 में महर्षि दयानन्द प्राकृतिक योग प्रतिष्ठान की स्थापना की। इन्होने तीन महत्वपूर्ण पुस्तकें भी लिखी।

डॉ॰ जगदीश चन्द्र जौहर

इन्होने सन् 1947 में महात्मा गांधी जी के सम्पर्क में आने पर इस पद्धति की ओर अग्रसर होकर कई महत्वपूर्ण कार्य किए तथा आयुर्वेद का प्रशिक्षण प्राप्त कर सेवा में लग गए। पट्टी कल्याणा प्राकृतिक चिकित्सालय के संस्थापक पं॰ ओम प्रकाश त्रिखा के सम्पर्क में आने से पूर्ण रूप से केवल प्राकृतिक चिकित्सा के प्रचार प्रसार में लग गए। इन्होने बाद में गांधी जी द्वारा लिखी गई पुस्तक 'आरोग्य की कुंजी' की उर्दु में अनुवाद भी किया।

डॉ॰ युगल किशोर चौधरी

इन्होने अपना पूरा जीवन केवल प्राकृतिक चिकित्सा को समर्पित किया तथा इसका प्रचार प्रसार करते हुए तीस से अधिक पुस्तक लिखकर प्राकृतिक चिकित्सा साहित्य को समृद्ध किया।

 

डॉ॰ भास्कर सिन्हा

यह वर्तमान समय के प्राकृतिक चिकित्सक है. इन्होने अपना पूरा जीवन प्राकृतिक चिकित्सा को समर्पित किया हुआ है तथा इसका प्रचार प्रसार कर रहे हैं साथ ही इन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा को अपने जीवन में अपना कर नए नए प्रयोग कर पद्धति को आगे बढ़ाया है और नए निष्कर्ष भी निकालें है जिसमें एक प्रयोग यह भी है कि कैसे अपनी उम्र को बढ़ाया जाए तथा 50 से अधिक लेख लिखकर प्राकृतिक चिकित्सा साहित्य को समृद्ध किया है

 

योग

योग भारत और नेपाल में एक आध्यात्मिक प्रकिया को कहते हैं जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने (योग) का काम होता है। यह शब्द, प्रक्रिया और धारणा बौद्ध धर्म,जैन धर्म और हिंदू धर्म में ध्यान प्रक्रिया से सम्बंधित है। योग शब्द भारत से बौद्ध धर्म के साथ चीनजापानतिब्बत, दक्षिण पूर्व एशिया और श्री लंका में भी फैल गया है और इस समय सारे सभ्य जगत्‌में लोग इससे परिचित हैं।

इतनी प्रसिद्धि के बाद पहली बार ११ दिसंबर २०१४ को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रत्येक वर्ष २१ जून को विश्व योग दिवस के रूप में मान्यता दी है। भगवद्गीता प्रतिष्ठित ग्रंथ माना जाता है। उसमें योग शब्द का कई बार प्रयोग हुआ है, कभी अकेले और कभी सविशेषण, जैसे बुद्धियोग, संन्यासयोग, कर्मयोग। वेदोत्तर काल में भक्तियोग और हठयोग नाम भी प्रचलित हो गए हैं पतंजलि योगदर्शन में क्रियायोग शब्द देखने में आता है। पाशुपत योग और माहेश्वर योग जैसे शब्दों के भी प्रसंग मिलते है। इन सब स्थलों में योग शब्द के जो अर्थ हैं वह एक दूसरे के विरोधी हैं परंतु इस प्रकार के विभिन्न प्रयोगों को देखने से यह तो स्पष्ट हो जाता है, कि योग की परिभाषा करना कठिन कार्य है। परिभाषा ऐसी होनी चाहिए जो अव्याप्ति और अतिव्याप्ति दोषों से मुक्त हो, योग शब्द के वाच्यार्थ का ऐसा लक्षण बतला सके जो प्रत्येक प्रसंग के लिये उपयुक्त हो और योग के सिवाय किसी अन्य वस्तु के लिये उपयुक्त न हो।


अत्याधिक चिंतन मनन करने पर विश्व का परम् सत्य ज्ञात हो जाता है जो स्वयं के ह्रदय की गहराई में है ।

सबसे पहले मस्तिष्क के केन्द्र बिन्दु जो चेतना है उसे अपने मन के इच्छाओ को समझ कर अपने अंतर्मन की आवाज के परे स्वयं के धर्म कथाओ की परिकल्पना करके सतयुग त्रेता युग व द्वारापाक युग होने के बाद कालयुग में बुध्द तीर्थंकर मूसा यशु पैगम्बर की परिकल्पना करके सभी प्रचीन धर्म सभ्यता व साम्राज्य को समझ कर अपने धर्म के परमात्मा के स्वरूप के परे एक बिन्दु है जो परम् सत्य प्रकाश बिन्दु है उसे से सम्पूर्ण विश्व व्याप्त है अस्तित्व में है ।

उस परम् सत्य प्रकाश बिन्दु के बाद हिन्दू का शिव मुस्लिम का अल्लाहा इसाई का गाॅड फादर बौध्द का बुध्द जैन का तीर्थंकर सिख का वाहे गुरू परिकल्पित परमात्मा के स्वरूप है फिर अपने धर्म की कथाऐ है जो तीन वर्षों तक परिकल्पना होता है फिर सभी प्रचीन धर्म सभ्यता व साम्राज्य है फिर विभिन्न प्रकार के संस्कृति देवी देवता महात्मा मसीहा पैगम्बर है फिर सभी मनुष्यों का अंतर्मन है जिसमें प्रेमिका प्रेमी पति पत्नी या प्रेम प्रसंग सम्बन्ध है फिर मन है जो शरीर का ही एक अदृश्य अंग है जिसके कारण परिवारिक सम्बन्ध मित्रगण प्रियजन है फिर उसके बाद मस्तिष्क की चेतना है जो स्वयं का अस्तित्व या आत्मा कहा जा सकता है फिर शरीर में पंचमहाभूत है जो तैरहा रस हैं इन्द्रियों सात कुण्डली पांच तत्व और कई इच्छा है फिर शरीरिक की आंतरिक व बाहरी रचना है ।

ध्यान योग करके चिंतन मनन से ज्ञात होता है यहां परिकल्पना।

फिर वही प्रकाश बिन्दु धरती है परमात्मा का स्वरूप स्वयं की मातृभूमि है अंतर्मन के प्रतिक स्वयं के पति पत्नी प्रेमिका प्रेमी या प्रेम प्रसंग सम्बन्ध मनुष्य है ये दो तीन एक सैकड़ों हजारों भी हो सकते है फिर मन है परिवारिक सम्बन्ध ही मुख्य है और मन के विचार बदलने अनुसार मित्रगण प्रियजन है फिर मस्तिष्क है जो स्वयं की अस्तित्व है जिस पर चेतना है वही आत्मा है फिर स्वयं का शरीर है फिर विश्व की प्रकृति व मानव समाज है ।

फिर इस विश्व पर समय है जहां जन्म मृत्यु का चक्र चल रहा है ।

इस सिध्दान्त का प्रमाण पांच वर्षों के लगातार दिन रात चौबीस घंटे चिंतन मनन व परिकल्पना होने पर प्रमाणित हो जाता है।

 

योग के फायदे। Benefits of Yoga

योग के अनगिनत लाभ है। यहां पर इसके कुछ महत्वपूर्ण फायदे के बारे में बताया जा रहा है।

योग विभिन्य प्रकार के रोग/विकार के लिए लाभकारी है।

 

  1. अम्लता: अगर आपको एसिडिटी को कम करना हो तो पवनमुक्ताकसन, सुप्त वज्रासन, उष्ट्रा सन, हलासन, वज्रासन, प्राणायाम आदि का अभ्यास करना चाहिए।
  2. क्रोध: आजकल प्राय लोग क्रोध से ग्रसित देखा जा सकता है। पद्मासन, मकरासन, शलभासन, उष्ट्रासन, प्राणायाम, आदि इसके लिए लाभदायक है।
  3. दमा: दमा के लिए ताड़ासन, गोमुखासन, सुप्तरवज्रासन, उष्ट्रा्सन, उत्ताानासन, भुजंगासन, मकरासन, प्राणायाम, इत्यादि फायदेमंद है।
  4. पीठ दर्द: पीठ दर्द में आपको पवनमुक्तासन, भुजंगासन, ताड़ासन, त्रिकोणासन, मर्कटासन का अभ्यास करना चाहिए।
  5. खांसी/जुकाम: इसके लिए सूर्यनमस्काार, भुजंगासन, ताड़ासन, सिंहासन, प्राणायाम बहुत मुफ़ीद है।
  6. मधुमेह: डायबिटीज को रोकने के लिए पश्चिमोत्ताआनासन, अर्द्धमत्येंद्रासन, वक्रासन, मंडूकासन, भुजंगासन, हलासन, सर्वांगासन,
  7. मयूरासन, गोमुखासन,कपालभाति कपालभाति आदि योगाभ्यास करना चाहिए।
  8. साइनसाइटिस: साइनसाइटिस से नजात पाने के लिए षट्कर्म करनी चाहिए।
  9. स्लिप्डस डिस्का: अगर आपको इस तरह की परेशानी है तो भुजंगासन किसी एक्सपर्ट्स के सामने करनी चाहिए।
  10. कफ: कफ में जालंधर बंध सहायक है।
  11. रक्त प्रवाह: रक्त प्रवाह को ठीक करने के लिए उड्डीयान बंध का अभ्यास करना चाहिए।
  12. तंत्रिका तंत्र: तंत्रिका तंत्र स्वस्थ रखने के लिए मूलबंध सहायक है।
  13. बलगम: सूर्यबेधना से पित्त बढ़ता है और बलगम कम होता है।
  14. थयरॉइड: थयरॉइड को कम करने के लिए उज्जायी प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए।
  15. वजन: वजन कम करने के लिए भाष्त्रिका का अभ्यास करें।
  16. तनाव: तनाव मुक्त जीवन पाने के लिए भ्रामरी रामबाण का काम करता है।
  17. कपालभाति: इसका नियमित अभ्यास करने से आप बहुत सारी बीमारियों से नजात पा सकते हैं।
  18. पेट की समस्यां: पेट की समस्यां से निदान पाने के लिए नौलि एवं कुंजल का अभ्यास करें।
  19. सर्दी एवं जुकाम: इससे नजात पाने के लिए जलनेति एवं सूत्रनेति बहुत लाभदायक है।

 

योग के नियम। Yoga rules

  • योग करने से पहले, योग करते समय एवं इसके बाद कुछ नियमों का पालन करने से योग के फायदे और भी नजर आने लगते हैं।
  • शौच करके आसन करें।
  • योग खाली पेट किए जाने चाहिए।
  • योग हवादार स्थान पर करने चाहिए।
  • ढीले, हल्के एवं आरामदेह कपड़े पहन कर योग करनी चाहिए।
  • अगर कोई समस्या हो तो एक्सपर्ट के हिसाब से ही योग करनी चाहिए।
  • योग के तुरंत बाद भोजन नहीं करना चाहिए।

 

योग के सावधानियां ।Yoga precautions

  • योग करते समय कुछ सावधानी लेना जरूरी है।
  • बहुत गंभीर गठिया, नसों में सूजन और हड्डियों तथा जोड़ों में चोट होने पर पार्श्वतकोणासन नहीं करना चाहिए।
  • गंभीर गठिया रोग होने पर उत्कटासन नहीं करनी चाहिए।
  • घुटनों में दर्द होने से पद्मासन न करें।
  • बवासीर के रोगियों को वज्रासन नहीं करना चाहिए।
  • घुटनों अथवा कूल्हेक की गठिया संबंधी समस्यााओं से ग्रस्त भद्रासन नहीं करनी चाहिए।
  • बवासीर में गोमुखासन नहीं करना चाहिए।
  • रीढ़ में अकड़न होने पर और गर्भवती स्त्रियों को अर्द्धमत्येंद्रासन नहीं करना चाहिए।
  • पेट में अल्सर की समस्या‍होने पर पश्चिमोत्ताानासन करने से बचे।
  • उच्च‍रक्तपचाप, हृदय रोग, हर्निया में उष्ट्रासन ने करें।
  • पीठ दर्द में शशांकासन करने से बचें।
  • हर्निया के रोगी एवं पेट में जख्म वाले व्यक्ति भुजंगासन कदापि न करें।
  • हर्निया, पेप्टिक अल्सर, कोलाइटिस, उच्च रक्तचाप वाले व्यक्तियों को धनुरासन नहीं करनी चाहिए।
  • हृदय की गंभीर समस्याओं, उच्च रक्तचाप, चक्कर आने, पेट में सूजन, इत्यादि में चक्रासन न करें

 

योग परिचय : परिभाषा एवं प्रकार

‘योग’ शब्द ‘युज समाधौ’ आत्मनेपदी दिवादिगणीय धातु में ‘घं’ प्रत्यय लगाने से निष्पन्न होता है। इस प्रकार ‘योग’ शब्द का अर्थ हुआ- समाधि अर्थात् चित्त वृत्तियों का निरोध। वैसे ‘योग’ शब्द ‘युजिर योग’ तथा ‘युज संयमने’ धातु से भी निष्पन्न होता है किन्तु तब इस स्थिति में योग शब्द का अर्थ क्रमशः योगफल, जोड़ तथा नियमन होगा। आगे योग में हम देखेंगे कि आत्मा और परमात्मा के विषय में भी योग कहा गया है।

गीता में श्रीकृष्ण ने एक स्थल पर कहा है 'योगः कर्मसु कौशलम्‌' (योग से कर्मो में कुशलता आती हैं)। स्पष्ट है कि यह वाक्य योग की परिभाषा नहीं है। कुछ विद्वानों का यह मत है कि जीवात्मा और परमात्मा के मिल जाने को योग कहते हैं। इस बात को स्वीकार करने में यह बड़ी आपत्ति खड़ी होती है कि बौद्धमतावलंबी भी, जो परमात्मा की सत्ता को स्वीकार नहीं करते, योग शब्द का व्यवहार करते और योग का समर्थन करते हैं। यही बात सांख्यवादियों के लिए भी कही जा सकती है जो ईश्वर की सत्ता को असिद्ध मानते हैं। पंतजलि ने योगदर्शन में, जो परिभाषा दी है 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः', चित्त की वृत्तियों के निरोध का नाम योग है। इस वाक्य के दो अर्थ हो सकते हैं: चित्तवृत्तियों के निरोध की अवस्था का नाम योग है या इस अवस्था को लाने के उपाय को योग कहते हैं।

परंतु इस परिभाषा पर कई विद्वानों को आपत्ति है। उनका कहना है कि चित्तवृत्तियों के प्रवाह का ही नाम चित्त है। पूर्ण निरोध का अर्थ होगा चित्त के अस्तित्व का पूर्ण लोप, चित्ताश्रय समस्त स्मृतियों और संस्कारों का नि:शेष हो जाना। यदि ऐसा हो जाए तो फिर समाधि से उठना संभव नहीं होगा। क्योंकि उस अवस्था के सहारे के लिये कोई भी संस्कार बचा नहीं होगा, प्रारब्ध दग्ध हो गया होगा। निरोध यदि संभव हो तो श्रीकृष्ण के इस वाक्य का क्या अर्थ होगा? योगस्थ: कुरु कर्माणि, योग में स्थित होकर कर्म करो। विरुद्धावस्था में कर्म हो नहीं सकता और उस अवस्था में कोई संस्कार नहीं पड़ सकते, स्मृतियाँ नहीं बन सकतीं, जो समाधि से उठने के बाद कर्म करने में सहायक हों।

संक्षेप में आशय यह है कि योग के शास्त्रीय स्वरूप, उसके दार्शनिक आधार, को सम्यक्‌रूप से समझना बहुत सरल नहीं है। संसार को मिथ्या माननेवाला अद्वैतवादी भी निदिध्याह्न के नाम से उसका समर्थन करता है। अनीश्वरवादी सांख्य विद्वान भी उसका अनुमोदन करता है। बौद्ध ही नहीं, मुस्लिम सूफ़ी और ईसाई मिस्टिक भी किसी न किसी प्रकार अपने संप्रदाय की मान्यताओं और दार्शनिक सिद्धांतों के साथ उसका सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं।

इन विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं में किस प्रकार ऐसा समन्वय हो सकता है कि ऐसा धरातल मिल सके जिस पर योग की भित्ति खड़ी की जा सके, यह बड़ा रोचक प्रश्न है परंतु इसके विवेचन के लिये बहुत समय चाहिए। यहाँ उस प्रक्रिया पर थोड़ा सा विचार कर लेना आवश्यक है जिसकी रूपरेखा हमको पतंजलि के सूत्रों में मिलती है। थोड़े बहुत शब्दभेद से यह प्रक्रिया उन सभी समुदायों को मान्य है जो योग के अभ्यास का समर्थन करते हैं।

परिभाषा

  • (१)पातञ्जल योग दर्शन के अनुसार - योगश्चित्तवृत्त निरोधः (1/2) अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।
  • (२)सांख्य दर्शन के अनुसार - पुरुषप्रकृत्योर्वियोगेपि योगइत्यमिधीयते। अर्थात् पुरुष एवं प्रकृति के पार्थक्य को स्थापित कर पुरुष का स्व स्वरूप में अवस्थित होना ही योग है।
  • (३)विष्णुपुराण के अनुसार - योगः संयोग इत्युक्तः जीवात्म परमात्मने अर्थात् जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतया मिलन ही योग है।
  • (४)भगवद्गीता के अनुसार - सिद्धासिद्धयो समोभूत्वा समत्वं योग उच्चते (2/48) अर्थात् दुःख-सुख, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, शीत और उष्ण आदि द्वन्दों में सर्वत्र समभाव रखना योग है।
  • (५)भगवद्गीता के अनुसार - तस्माद्दयोगाययुज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् अर्थात् कर्त्तव्य कर्म बन्धक न हो, इसलिए निष्काम भावना से अनुप्रेरित होकर कर्त्तव्य करने का कौशल योग है।
  • (६)आचार्य हरिभद्र के अनुसार - मोक्खेण जोयणाओ सव्वो वि धम्म ववहारो जोगो मोक्ष से जोड़ने वाले सभी व्यवहार योग है।
  • (७)बौद्ध धर्म के अनुसार - कुशल चितैकग्गता योगः अर्थात् कुशल चित्त की एकाग्रता योग है।

योग के प्रकार

योग की उच्चावस्था समाधिमोक्षकैवल्य आदि तक पहुँचने के लिए अनेकों साधकों ने जो साधन अपनाये उन्हीं साधनों का वर्णन योग ग्रन्थों में समय समय पर मिलता रहा। उसी को योग के प्रकार से जाना जाने लगा। योग की प्रामाणिक पुस्तकों में शिवसंहिता तथा गोरक्षशतक में योग के चार प्रकारों का वर्णन मिलता है -

मंत्रयोगों हष्ष्चैव लययोगस्तृतीयकः।

चतुर्थो राजयोगः (शिवसंहिता , 5/11)

मंत्रो लयो हठो राजयोगन्तर्भूमिका क्रमात्

एक एव चतुर्धाऽयं महायोगोभियते॥ (गोरक्षशतकम् )

उपर्युक्त दोनों श्लोकों से योग के प्रकार हुए : मंत्रयोग, हठयोग लययोग व राजयोग।

मंत्रयोग

मन्त्र योग

'मंत्र' का समान्य अर्थ है- 'मननात् त्रायते इति मंत्रः'। मन को त्राय (पार कराने वाला) मंत्र ही है। मंत्र योग का सम्बन्ध मन से है, मन को इस प्रकार परिभाषित किया है- मनन इति मनः। जो मनन, चिन्तन करता है वही मन है। मन की चंचलता का निरोध मंत्र के द्वारा करना मंत्र योग है। मंत्र योग के बारे में योगतत्वोपनिषद में वर्णन इस प्रकार है-

योग सेवन्ते साधकाधमाः।

( अल्पबुद्धि साधक मंत्रयोग से सेवा करता है अर्थात मंत्रयोग अनसाधकों के लिए है जो अल्पबुद्धि है।)

मंत्र से ध्वनि तरंगें पैदा होती है मंत्र शरीर और मन दोनों पर प्रभाव डालता है। मंत्र में साधक जप का प्रयोग करता है मंत्र जप में तीन घटकों का काफी महत्व है वे घटक-उच्चारण, लय व ताल हैं। तीनों का सही अनुपात मंत्र शक्ति को बढ़ा देता है। मंत्रजप मुख्यरूप से चार प्रकार से किया जाता है।

(1) वाचिक (2) मानसिक (3) उपांशु (4) अणपा।

हठयोग

हठयोग

हठ का शाब्दिक अर्थ हठपूर्वक किसी कार्य करने से लिया जाता है। हठ प्रदीपिका पुस्तक में हठ का अर्थ इस प्रकार दिया है-

हकारेणोच्यते सूर्यष्ठकार चन्द्र उच्यते।

सूर्या चन्द्रमसो र्योगाद्धठयोगोऽभिधीयते॥

 का अर्थ सूर्य तथ  का अर्थ चन्द्र बताया गया है। सूर्य और चन्द्र की समान अवस्था हठयोग है। शरीर में कई हजार नाड़ियाँ है उनमें तीन प्रमुख नाड़ियों का वर्णन है, वे इस प्रकार हैं। सूर्यनाड़ी अर्थात पिंगला जो दाहिने स्वर का प्रतीक है। चन्द्रनाड़ी अर्थात इड़ा जो बायें स्वर का प्रतीक है। इन दोनों के बीच तीसरी नाड़ी सुषुम्ना है। इस प्रकार हठयोग वह क्रिया है जिसमें पिंगला और इड़ा नाड़ी के सहारे प्राण को सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश कराकर ब्रहमरन्ध्र में समाधिस्थ किया जाता है। हठ प्रदीपिका में हठयोग के चार अंगों का वर्णन है- आसन, प्राणायाम, मुद्रा और बन्ध तथा नादानुसधान। घेरण्डसंहिता में सात अंग- षटकर्म, आसन, मुद्राबन्ध, प्राणायाम, ध्यान, समाधि जबकि योगतत्वोपनिषद में आठ अंगों का वर्णन है- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, भ्रमध्येहरिम् और समाधि।

लययोग

कुंडलिनी योग

चित्त का अपने स्वरूप विलीन होना या चित्त की निरूद्ध अवस्था लययोग के अन्तर्गत आता है। साधक के चित्त् में जब चलते, बैठते, सोते और भोजन करते समय हर समय ब्रह्म का ध्यान रहे इसी को लययोग कहते हैं। योगत्वोपनिषद में इस प्रकार वर्णन है-

गच्छस्तिष्ठन स्वपन भुंजन् ध्यायेन्त्रिष्कलमीश्वरम् स एव लययोगः स्यात (22-23)

राजयोग

राजयोग

राजयोग सभी योगों का राजा कहलाया जाता है क्योंकि इसमें प्रत्येक प्रकार के योग की कुछ न कुछ सामग्री अवश्य मिल जाती है। राजयोग महर्षि पतंजलि द्वारा रचित अष्टांग योग का वर्णन आता है। राजयोग का विषय चित्तवृत्तियों का निरोध करना है।

महर्षि पतंजलि के अनुसार समाहित चित्त वालों के लिए अभ्यास और वैराग्य तथा विक्षिप्त चित्त वालों के लिए क्रियायोग का सहारा लेकर आगे बढ़ने का रास्ता सुझाया है। इन साधनों का उपयोग करके साधक के क्लेशों का नाश होता है, चित्तप्रसन्न होकर ज्ञान का प्रकाश फैलता है और विवेकख्याति प्राप्त होती है है।

योगाडांनुष्ठानाद शुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिरा विवेक ख्यातेः (2/28)

राजयोग के अन्तर्गत महिर्ष पतंजलि ने अष्टांग को इस प्रकार बताया है-

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टांगानि।

 

योग के आठ अंगों में प्रथम पाँच बहिरंग तथा अन्य तीन अन्तरंग में आते हैं।

उपर्युक्त चार पकार के अतिरिक्त गीता में दो प्रकार के योगों का वर्णन मिलता है-

ज्ञानयोग, सांख्ययोग से सम्बन्ध रखता है। पुरुष प्रकृति के बन्धनों से मुक्त होना ही ज्ञान योग है। सांख्य दर्शन में 25 तत्वों का वर्णन मिलता है।

योग का इतिहास

मोहनजोदड़ो-हड़प्पा से प्राप्त मुहर में योगमुद्रा

योग का इतिहास

वैदिक संहिताओं के अंतर्गत तपस्वियों तपस (संस्कृत) के बारे में ((कल | ब्राह्मण)) प्राचीन काल से वेदों में (९०० से ५०० बी सी ई) उल्लेख मिलता है, जब कि तापसिक साधनाओं का समावेश प्राचीन वैदिक टिप्पणियों में प्राप्त है।1 कई मूर्तियाँ जो सामान्य योग या समाधि मुद्रा को प्रदर्शित करती है, सिंधु घाटी सभ्यता (सी.3300-1700 बी.सी. इ.) के स्थान पर प्राप्त हुईं है। पुरातत्त्वज्ञ ग्रेगरी पोस्सेह्ल के अनुसार," ये मूर्तियाँ योग के धार्मिक संस्कार" के योग से सम्बन्ध को संकेत करती है।2 यद्यपि इस बात का निर्णयात्मक सबूत नहीं है फिर भी अनेक पंडितों की राय में सिंधु घाटी सभ्यता और योग-ध्यान में सम्बन्ध है।3


ध्यान में उच्च चैतन्य को प्राप्त करने कि रीतियों का विकास श्रमानिक परम्पराओं द्वारा एवं उपनिषद् की परंपरा द्वारा विकसित हुआ था।4

बुद्ध के पूर्व एवं प्राचीन ब्रह्मिनिक ग्रंथों मे ध्यान के बारे में कोई ठोस सबूत नहीं मिलते हैं, बुद्ध के दो शिक्षकों के ध्यान के लक्ष्यों के प्रति कहे वाक्यों के आधार पर वय्न्न यह तर्क करते है की निर्गुण ध्यान की पद्धति ब्रह्मिन परंपरा से निकली इसलिए उपनिषद् की सृष्टि के प्रति कहे कथनों में एवं ध्यान के लक्ष्यों के लिए कहे कथनों में समानता है।5 यह संभावित हो भी सकता है, नहीं भी.6

उपनिषदों में ब्रह्माण्ड संबंधी बयानॉ के वैश्विक कथनों में किसी ध्यान की रीति की सम्भावना के प्रति तर्क देते हुए कहते है की नारदीय सूक्त किसी ध्यान की पद्धति की ओर ऋग वेद से पूर्व भी इशारा करते है।7

यह बौद्ध ग्रंथ शायद सबसे प्राचीन ग्रंथ है जिन में ध्यान तकनीकों का वर्णन प्राप्त होता है।8 वे ध्यान की प्रथाओं और अवस्थाओं का वर्णन करते है जो बुद्ध से पहले अस्तित्व में थीं और साथ ही उन प्रथाओं का वर्णन करते है जो पहले बौद्ध धर्म के भीतर विकसित हुईं.9 हिंदु वाङ्मय में,"योग" शब्द पहले कथा उपानिषद में प्रस्तुत हुआ जहाँ ज्ञानेन्द्रियों का नियंत्रण और मानसिक गतिविधि के निवारण के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है जो उच्चतम स्थिति प्रदान करने वाला मन गया है।10 महत्वपूर्ण ग्रन्थ जो योग की अवधारणा से सम्बंधित है वे मध्य कालीन उपनिषद्महाभारत,भगवद गीता 200 BCE) एवं पतंजलि योग सूत्र है। (ca. 400 BCE)

 

पतंजलि के योग सूत्र

योग सूत्र और पतंजलि योग सूत्र

भारतीय दर्शन में, षड् दर्शनों में से एक का नाम योग है।1112 योग दार्शनिक प्रणाली,सांख्य स्कूल के साथ निकटता से संबन्धित है।13 ऋषि पतंजलि द्वारा व्याख्यायित योग संप्रदाय सांख्य मनोविज्ञान और तत्वमीमांसा को स्वीकार करता है, लेकिन सांख्य घराने की तुलना में अधिक आस्तिक है, यह प्रमाण है क्योंकि सांख्य वास्तविकता के पच्चीस तत्वों में ईश्वरीय सत्ता भी जोड़ी गई है।1415 योग और सांख्य एक दूसरे से इतने मिलते-जुलते है कि मेक्स म्युल्लर कहते है,"यह दो दर्शन इतने प्रसिद्ध थे कि एक दूसरे का अंतर समझने के लिए एक को प्रभु के साथ और दूसरे को प्रभु के बिना माना जाता है।...."16 सांख्य और योग के बीच घनिष्ठ संबंध हेंरीच ज़िम्मेर समझाते है:

इन दोनों को भारत में जुड़वा के रूप में माना जाता है, जो एक ही विषय के दो पहलू है।Sāṅkhya41यहाँ मानव प्रकृति की बुनियादी सैद्धांतिक का प्रदर्शन, विस्तृत विवरण और उसके तत्वों का परिभाषित, बंधन (बंधा) के स्थिति में उनके सहयोग करने के तरीके, सुलझावट के समय अपने स्थिति का विश्लेषण या मुक्ति में वियोजन ({{2}{IAST|मोक्ष}}) का व्याख्या किया गया है। योग विशेष रूप से प्रक्रिया की गतिशीलता के सुलझाव के लिए उपचार करता है और मुक्ति प्राप्त करने की व्यावहारिक तकनीकों को सिद्धांत करता है अथवा 'अलगाव-एकीकरण'(कैवल्य) का उपचार करता है।17

पतंजलि, व्यापक रूप से औपचारिक योग दर्शन के संस्थापक मने जाते है।18 पतंजलि के योग, बुद्धि का नियंत्रण के लिए एक प्रणाली है,राज योग के रूप में जाना जाता है।19 पतंजलि उनके दूसरे सूत्र मे "योग" शब्द का परिभाषित करते है,20 जो उनके पूरे काम के लिए व्याख्या सूत्र माना जाता है:

योग: चित्त-वृत्ति निरोध: 

- योग सूत्र 1.2

तीन संस्कृत शब्दों के अर्थ पर यह संस्कृत परिभाषा टिका है। अई.के.तैम्नी इसकी अनुवाद करते है की,"योग बुद्धि के संशोधनों (vṛtti 49) का निषेध (nirodhaḥ 48) है" (citta 50)। 21 योग का प्रारंभिक परिभाषा मे इस शब्द nirodhaḥ 52 का उपयोग एक उदाहरण है कि बौद्धिक तकनीकी शब्दावली और अवधारणाओं, योग सूत्र मे एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है; इससे यह संकेत होता है कि बौद्ध विचारों के बारे में पतंजलि को जानकारी थी और अपने प्रणाली मे उन्हें बुनाई.22स्वामी विवेकानंद इस सूत्र को अनुवाद करते हुए कहते है,"योग बुद्धि (चित्त) को विभिन्न रूपों (वृत्ति) लेने से अवरुद्ध करता है।23

 

पतंजलि का लेखन 'अष्टांग योग"("आठ-अंगित योग") एक प्रणाली के लिए आधार बन गया।

 

 

योग के  आठ अंग हैं:

  1. यम(पांच "परिहार"): अहिंसा, झूठ नहीं बोलना, गैर लोभ, गैर विषयासक्ति और गैर स्वामिगत.
  2. नियम(पांच "धार्मिक क्रिया"): पवित्रता, संतुष्टि, तपस्या, अध्ययन और भगवान को आत्मसमर्पण.
  3. आसन:मूलार्थक अर्थ "बैठने का आसन" और पतंजलि सूत्र में ध्यान
  4. प्राणायाम("सांस को स्थगित रखना"): प्राण, सांस, "अयाम ", को नियंत्रित करना या बंद करना। साथ ही जीवन शक्ति को नियंत्रण करने की व्याख्या की गयी है।
  5. प्रत्यहार("अमूर्त"):बाहरी वस्तुओं से भावना अंगों के प्रत्याहार.
  6. धारणा("एकाग्रता"): एक ही लक्ष्य पर ध्यान लगाना.
  7. ध्यान("ध्यान"):ध्यान की वस्तु की प्रकृति गहन चिंतन.
  8. समाधि("विमुक्ति"):ध्यान के वस्तु को चैतन्य के साथ विलय करना। इसके दो प्रकार है - सविकल्प और अविकल्प। अविकल्प समाधि में संसार में वापस आने का कोई मार्ग या व्यवस्था नहीं होती। यह योग पद्धति की चरम अवस्था है।

इस संप्रदाय के विचार मे, उच्चतम प्राप्ति विश्व के अनुभवी विविधता को भ्रम के रूप मे प्रकट नहीं करता. यह दुनिया वास्तव है। इसके अलावा, उच्चतम प्राप्ति ऐसा घटना है जहाँ अनेक में से एक व्यक्तित्व स्वयं, आत्म को आविष्कार करता है, कोई एक सार्वभौमिक आत्म नहीं है जो सभी व्यक्तियों द्वारा साझा जाता है।24

 

 

भगवद गीता

भगवद्गीता

भगवद गीता (प्रभु के गीत), बड़े पैमाने पर विभिन्न तरीकों से योग शब्द का उपयोग करता है। एक पूरा अध्याय (छठा अध्याय) सहित पारंपरिक योग का अभ्यास को समर्पित, ध्यान के सहित, करने के अलावा25 इस मे योग के तीन प्रमुख प्रकार का परिचय किया जाता है।26

  • कर्म योग: कार्रवाई का योग। इसमें व्यक्ति अपने स्थिति के उचित और कर्तव्यों के अनुसार कर्मों का श्रद्धापूर्वक निर्वाह करता है।
  • भक्ति योग: भक्ति का योग। भगवत कीर्तन। इसे भावनात्मक आचरण वाले लोगों को सुझाया जाता है।
  • ज्ञाना योग: ज्ञान का योग - ज्ञानार्जन करना।

मधुसूदना सरस्वती (जन्म 1490) ने गीता को तीन वर्गों में विभाजित किया है, जहाँ प्रथम छह अध्यायों मे कर्म योग के बारे मे, बीच के छह मे भक्ति योग और पिछले छह अध्यायों मे ज्ञाना (ज्ञान) योग के बारे मे गया है।27अन्य टिप्पणीकारों प्रत्येक अध्याय को एक अलग 'योग' से संबंध बताते है, जहाँ अठारह अलग योग का वर्णन किया है।28

हठयोग

हठ योग

हठयोग योग, योग की एक विशेष प्रणाली है जिसे 15वीं सदी के भारत में हठ योग प्रदीपिका के संकलक, योगी स्वत्मरमा द्वारा वर्णित किया गया था।

हठयोग पतांजलि के राज योग से काफी अलग है जो सत्कर्म पर केन्द्रित है, भौतिक शरीर की शुद्धि ही मन की, प्राण की और विशिष्ट ऊर्जा की शुद्धि लाती है।62 63 केवल पतंजलि राज योग के ध्यान आसन के बदले, 64 यह पूरे शरीर के लोकप्रिय आसनों की चर्चा करता है।29 हठयोग अपनी कई आधुनिक भिन्नरूपों में एक शैली है जिसे बहुत से लोग "योग" शब्द के साथ जोड़ते है।30

 

 

भारत के प्रसिद्ध योगगुरु

वैसे तो योग हमेशा से हमारी प्राचीन धरोहर रही है। समय के साथ-साथ योग विश्व प्रख्यात तो हुआ ही है साथ ही इसके महत्व को जानने के बाद आज योग लोगों की दिनचर्या का अभिन्न अंग भी बन गया है। लेकिन योग के प्रचार-प्रसार में विश्व प्रसिद्ध योगगुरुओं का भी योगदान रहा है, जिनमें से अयंगर योग के संस्थापक बी के एस अयंगर और योगगुरु रामदेव का नाम अधिक प्रसिद्ध है।72

बीकेएस अंयगर

अयंगर को विश्व के अग्रणी योग गुरुओं में से एक माना जाता है और उन्होंने योग के दर्शन पर कई किताबें भी लिखी थीं, जिनमें 'लाइट ऑन योगा', 'लाइट ऑन प्राणायाम' और 'लाइट ऑन द योग सूत्राज ऑफ पतंजलि' शामिल हैं। 73 अयंगर का जन्‍म 14 दिसम्‍बर 1918 को बेल्‍लूर के एक गरीब परिवार में हुआ था। बताया जाता है कि अयंगर बचपन में काफी बीमार रहा करते थे। ठीक नहीं होने पर उन्‍हें योग करने की सलाह दी गयी और तभी से वह योग करने लगे। अयंगर को 'अयंगर योग' का जन्‍मदाता कहा जाता है। उन्होंने इस योग को देश-दुनिया में फैलाया। सांस की तकलीफ के चलते 20 अगस्त 2014 को उनका निधन हो गया।74

बाबा रामदेव

बाबा रामदेव भारतीय योग-गुरु हैं, उन्होंने योगासन व प्राणायामयोग के क्षेत्र में योगदान दिया है। रामदेव स्वयं जगह-जगह जाकर योग शिविरों का आयोजन करते हैं।

योग दिवस

 

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस

21 जून 2015 को प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया। इस अवसर पर 192 देशों और 47 मुस्लिम देशों में योग दिवस का आयोजन किया गया। दिल्ली में एक साथ ३५९८५ लोगों ने योगाभ्यास किया।इसमें 84 देशों के प्रतिनिधि मौजूद थे। इस अवसर पर भारत ने दो विश्व रिकॉर्ड बनाकर 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' में अपना नाम दर्ज करा लिया है। पहला रिकॉर्ड एक जगह पर सबसे अधिक लोगों के एक साथ योग करने का बना, तो दूसरा एक साथ सबसे अधिक देशों के लोगों के योग करने का। 75

योग का महत्व

वर्तमान समय में अपनी व्यस्त जीवन शैली के कारण लोग संतोष पाने के लिए योग करते हैं। योग से न केवल व्यक्ति का तनाव दूर होता है बल्कि मन और मस्तिष्क को भी शांति मिलती है।76 योग बहुत ही लाभकारी है। योग न केवल हमारे दिमाग, मस्‍तिष्‍क को ही ताकत पहुंचाता है बल्कि हमारी आत्‍मा को भी शुद्ध करता है। आज बहुत से लोग मोटापे से परेशान हैं, उनके लिए योग बहुत ही फायदेमंद है। योग के फायदे से आज सब ज्ञात है, जिस वजह से आज योग विदेशों में भी प्रसिद्ध है। 77

योग का लक्ष्य

योग का लक्ष्य स्वास्थ्य में सुधार से लेकर मोक्ष प्राप्त करने तक है।78 जैन धर्म, अद्वैत वेदांत के मोनिस्ट संप्रदाय और शैव सम्रदाय के अन्तर में योग का लक्ष्य मोक्श का रूप लेता है, जो सभी सांसारिक कष्ट एवं जन्म और मृत्यु के चक्र (संसार) से मुक्ति प्राप्त करना है, उस क्षण में परम ब्रह्मण के साथ समरूपता का एक एहसास है। महाभारत में, योग का लक्ष्य ब्रह्मा के दुनिया में प्रवेश के रूप में वर्णित किया गया है, ब्रह्म के रूप में, अथवा आत्मन को अनुभव करते हुए जो सभी वस्तुओं मे व्याप्त है।79

मीर्चा एलीयाडे योग के बारे में कहते हैं कि यह सिर्फ एक शारीरिक व्यायाम ही नहीं है, एक आध्यात्मिक तकनीक भी है। 80 सर्वपल्ली राधाकृष्णन लिखते हैं कि समाधि में निम्नलिखित तत्व शामिल हैं: वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता।81

योग के प्रसिद्ध ग्रन्थ

ग्रन्थ

रचयिता

रचनाकाल

योगसूत्र

पतंजलि

-

योगभाष्य

वेदव्यास

द्वितीय शताब्दी

तत्त्ववैशारदी

वाचस्पति मिश्र

८४१ ई

भोजवृत्ति

राजा भोज

११वीं शताब्दी

गोरक्षशतक

गुरु गोरख नाथ

११वीं-१२वीं शताब्दी

योगवार्तिक

विज्ञानभिक्षु

१६वीं शताब्दी

योगसारसंग्रह

विज्ञानभिक्षु

१६वीं शताब्दी

हठयोगप्रदीपिका

स्वामी स्वात्माराम

१५वीं-१६वीं शताब्दी

सूत्रवृत्ति

गणेशभावा

१७वीं शताब्दी

योगसूत्रवृत्ति

नागेश भट्ट

१७वीं शताब्दी

मणिप्रभा

रामानन्द यति

१८वीं शताब्दी

सूत्रार्थप्रबोधिनी

नारायण तीर्थ

१८वीं शताब्दी

शिवसंहिता

अज्ञात

-

घेरण्डसंहिता

घेरण्ड मुनि

-

योगचूडामण्युपनिषद

-

 

 

योग दर्शन

योगदर्शन छः आस्तिक दर्शनों (षड्दर्शन) में से प्रसिद्ध है। इस दर्शन का प्रमुख लक्ष्य मनुष्य को वह परम लक्ष्य (मोक्ष) की प्राप्ति कर सके। अन्य दर्शनों की भांति योगदर्शन तत्त्वमीमांसा के प्रश्नों (जगत क्या है, जीव क्या है?, आदि) में न उलझकर मुख्यतः मोक्ष वाले दर्शन की प्रस्तुति करता है। किन्तु मोक्ष पर चर्चा करने वाले प्रत्येक दर्शन की कोई न कोई तात्विक पृष्टभूमि होनी आवश्यक है। अतः इस हेतु योगदर्शन, सांख्यदर्शन का सहारा लेता है और उसके द्वारा प्रतिपादित तत्त्वमीमांसा को स्वीकार कर लेता है। इसलिये प्रारम्भ से ही योगदर्शन, सांख्यदर्शन से जुड़ा हुआ है। 1

प्रकृति, पुरुष के स्वरुप के साथ ईश्वर के अस्तित्व को मिलाकर मनुष्य जीवन की आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक उन्नति के लिये दर्शन का एक बड़ा व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक रूप योगदर्शन में प्रस्तुत किया गया है। इसका प्रारम्भ पतंजलि मुनि के योगसूत्रों से होता है। योगसूत्रों की सर्वोत्तम व्याख्या व्यास मुनि द्वारा लिखित व्यासभाष्य में प्राप्त होती है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार मनुष्य अपने मन (चित) की वृत्तियों पर नियन्त्रण रखकर जीवन में सफल हो सकता है और अपने अन्तिम लक्ष्य निर्वाण को प्राप्त कर सकता है।

योगदर्शन, सांख्य की तरह द्वैतवादी है। सांख्य के तत्त्वमीमांसा को पूर्ण रूप से स्वीकारते हुए उसमें केवल 'ईश्वर' को जोड़ देता है। इसलिये योगदर्शन को 'सेश्वर सांख्य' (स + ईश्वर सांख्य) कहते हैं और सांख्य को ' कहा जाता है।2

 

परिचय

योगदर्शन में पुरूष तत्व केंद्रीय विषय के रूप में प्रस्तुत हुआ है। यद्यपि पुरूष और प्रकृति दोनों की स्वतंत्र सत्ता मानी गयी है परन्तु तात्विक रूप में पुरूष की सत्ता ही सर्वोच्च है। पुरूष के दो भेद कहे गये हैं। पुरूष को चैतन्य एवं अपरिणामी कहा गया है, किन्तु अविद्या के कारण पुरूष जड़ एवं परिणाम चित्त में स्वयं को आरोपित कर लेता है। पुरूष और चित्त के संयुक्त हो जाने पर विवेक जाता रहता है और पुरूष स्वयं को चित्त रूप में अनुभव करने लगता है। यह अज्ञान ही पुरूष के समस्त दुःखों, क्लेशों का कारण हैं। योग दर्शन का उद्देश्य पुरूष को इस दुःख से, अज्ञान से, मुक्त कराना है। इसी तथ्य को सैद्धान्तिक रूप से योग दर्शन में हेय, हेय-हेतु, हान और हानोपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इन चार क्रमों में पुरूष दुःखों से मुक्ति पाता है, इसलिये योग में इसे 'चतुर्व्यूहवाद' कहा गया है एवं इस चतुर्व्यूह से मुक्त होना ही योग का परम उद्देश्य है। चतुर्व्यूहवाद की विवेचना में ही योग दर्शन में पुरूष, पुरूषार्थ और पुरूषार्थशून्यता का दर्शन प्रकट होता है। पुरूष अविद्याग्रस्त होने पर संसार-चक्र में पड़ता है और पुरूषार्थशून्यता की अवस्था को प्राप्त करता है। पुरूष का परम लक्ष्य कैवल्य की प्राप्ति है। योग में पुरूष को आत्मा का पर्याय माना गया है। अतः आत्मा, जो कि संख्या में असंख्य है, उसकी कैवल्य प्राप्ति तभी हो सकती है जब चतुर्व्यूह का पुरूषार्थ साधन कर दुःख के त्रिविध रूपों का सामाधान कर लिया जाय। दुःख के तीन रूप है - आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक। पुरूषार्थशून्यता इन त्रितापों से ऊपर की अवस्था है। पुरूषार्थशून्यता के पश्चात् ही पुरूष की अपने स्वरूप की स्थिति होती है। योगदर्शन में इसे ही कैवल्य अथवा मोक्ष कहा गया है।

पतंजलि को कपिल द्वारा बताया गया सांख्यदर्शन ही अभिमत है। थोड़े में, इस दर्शन के अनुसार इस जगत्‌में असंख्य पुरुष हैं और एक प्रधान या मूल प्रकृति। पुरुष चित्‌है, प्रधान अचित्‌। पुरुष नित्य है और अपरिवर्तनशील, प्रधान भी नित्य है परंतु परिवर्तनशील। दोनों एक दूसरे से सदा पृथक हैं, परंतु एक प्रकार से एक का दूसरे पर प्रभाव पड़ता है। पुरुष के सान्निध्य से प्रकृति में परिवर्तन होने लगते हैं। वह क्षुब्ध हो उठती है। पहले उसमें महत्‌या बुद्धि की उत्पत्ति होती है, फिर अहंकार की, फिर मन की। अहंकार से ज्ञानेंद्रियों और कर्मेद्रियों तथा पाँच तन्मात्राओं अर्थात्‌शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गंध की, अंत में इन पाँचों से आकाश, वायु, तेज, अप और क्षिति नाम के महाभूतों की। इन सबके संयोग वियोग से इस विश्व का खेल हो रहा है। संक्षेप में, यही सृष्टि का क्रम है। प्रकृति में परिवर्तन भले ही हो परंतु पुरुष ज्यों का त्यों रहता है। फिर भी एक बात होती है। जैसे श्वेत स्फटिक के सामने रंग बिरंगे फूलों को लाने से उसपर उनका रंगीन प्रतिबिंब पड़ता है, इसी प्रकार पुरुष पर प्राकृतिक विकृतियों के प्रतिबिंब पड़ते हैं। क्रमश: वह बुद्धि से लेकर क्षिति तक से रंजित प्रतीत होता है, अपने को प्रकृति के इन विकारों से संबद्ध मानने लगता है। आज अपने को धनी, निर्धन, बलवान्‌दुर्बल, कुटुंबी, सुखी, दु:खी, आदि मान रहा है। अपने शुद्ध रूप से दूर जा पड़ा है। यह उसका भ्रम, अविद्या है। प्रधान से बने हुए इन पदार्थो ने उसके रूप को ढँक रखा है, उसके ऊपर कई तह खोल पड़ गई है। यदि वह इन खोलों, इन आवरणों को दूर फेंक दे तो उसका छुटकारा हो जायगा। जिस क्रम से बँधा है, उसके उलटे क्रम से बंधन टूटेंगे। पहले महाभूतों से ऊपर उठना होगा। अंत में प्रधान की ओर से मुँह फेरना होगा। यह बंधन वास्तविक नहीं है, परंतु बहुत ही दृढ़ प्रतीत होते हैं। जिस उपयोग से बंधनों को तोड़कर पुरुष अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो सके उस उपाय का नाम योग है। सांख्य के आचार्यो का कहना है: यद्वा तद्वा तदुच्छिति: परमपुरुषार्थः - जैसे भी हो सके पुरुष और प्रधान के इस कृत्रिम संयोग का उच्छेद करना परम पुरुषार्थ हैं।

योग का यही दार्शनिक धरातल है: अविद्या के दूर होने पर जो अवस्था होती है उसका वर्णन विभिन्न आचार्यों और विचारकों के विभिन्न ढंग से किया है। अपने-अपने विचार के अनुसार उन्होंने उसको पृथक नाम भी दिए हैं। कोई उसे कैवल्य कहता है, कोई मोक्ष, कोई निर्वाण। ऊपर पहुँचकर जिसको जैसा अनुभव हो वह उसे उस प्रकार कहे। वस्तुत: वह अवस्था ऐसी है, यतो वाचो निवर्तते अप्राप्य मनसा सह - जहाँ मन ओर वाणी की पहुँच नहीं है। थोड़े से शब्दों में एक और बात का भी चर्चा कर देना आवश्यक है। असंख्य पुरुषों के साथ पतंजलि ने 'पुरुष विशेष' नाम से ईश्वर की सत्ता को भी माना है। सांख्य के आचार्य ऐसा नहीं मानते। वस्तुत: मानने की आवश्यकता भी नहीं है। यदि योगदर्शन में से वह थोड़े से सूत्र निकाल भी लें तो कोई अंतर नहीं पड़ता। योग की साधना की दृष्टि से ईश्वर को मानने, न मानने का विशेष महत्व नहीं है। ईश्वर की सत्ता को मानने वाले और न मानने वाले, दोनों योग में समान रूप से अधिकार रखते हैं।

यम-नियम

विद्या और अविद्या, बंधन और उससे छुटकारा, सुख और दु:ख सब चित्त में हैं। अत: जो कोई अपने स्वरूप में स्थिति पाने का इच्छुक है उसको अपने चित्त को उन वस्तुओं से हटाने का प्रयत्न करना होगा, जो हठात्‌प्रधान और उसके विकारों की ओर खींचती हैं और सुख दु:ख की अनुभूति उत्पन्न करती हैं। इस तरह चित्त को हटाने तथा चित्त के ऐसी वस्तुओं से हट जाने का नाम वैराग्य है। यह योग की पहली सीढ़ी है। पूर्ण वैराग्य एकदम नहीं हुआ करता। ज्यों ज्यों व्यक्ति योग की साधना में प्रवृत्त होता है त्यों त्यों वैराग्य भी बढ़ता है और ज्यों ज्यों वेराग्य बढ़ता है त्यों त्यों साधना में प्रवृत्ति बढ़ती है। जेसा पतंजलि ने कहा है: दृष्ट और अनुश्रविक दोनों प्रकार के विषयों में विरक्ति, गांधी जी के शब्दों में अनासक्ति, होनी चाहिए। स्वर्ग आदि, जिनका ज्ञान हमको अनुश्रुति अर्थात्‌महात्माओं के वचनों और धर्मग्रंथों से होता है, अनुश्रविक कहलाते हैं। योग की साधना को अभ्यास कहते हैं। इधर कई सौ वर्षो से साधुओं में इस आरम्भ में भजन शब्द भी चल पड़ा है।

चित्त जब तक इंद्रियों के विषयों की ओर बढ़ता रहेगा, चंचल रहेगा। इंद्रियाँ उसका एक के बाद दूसरी भोग्य वस्तु से संपर्क कराती रहेंगी। कितनों से वियोग भी कराती रहेंगी। काम, क्रोध, लोभ, आदि के उद्दीप्त होने के सैकड़ों अवसर आते रहेंगे। सुख दु:ख की निरंतर अनुभूति होती रहेगी। इस प्रकार प्रधान ओर उसके विकारों के साथ जो बंधन अनेक जन्मों से चले आ रहे हैं वे दृढ़ से दृढ़तर होते चले जाएँगे। अत: चित्त को इंद्रियों के विषयों से खींचकर अंतर्मुख करना होगा। इसके अनेक उपाय बताए गए हैं जिनके ब्योरे में जाने की आवश्यकता नहीं है। साधारण मनुष्य के चित्त की अवस्था क्षिप्त कहलाती है। वह एक विषय से दूसरे विषय की ओर फेंका फिरता है। जब उसको प्रयत्न करके किसी एक विषय पर लाया जाता है तब भी वह जल्दी से विषयंतर की ओर चला जाता है। इस अवस्था को विक्षिप्त कहते हैं। दीर्ध प्रयत्न के बाद साधक उसे किसी एक विषय पर देर तक रख सकता है। इस अवस्था का नाम एकाग्र है। चित्त को वशीभूत करना बहुत कठिन काम है। श्रीकृष्ण ने इसे प्रमाथि बलवत्‌मस्त हाथी के समान बलवान्‌बताया है।

 

आसन

चित्त को वश में करने में एक चीज से सहायता मिलती है। यह साधारण अनुभव की बात है कि जब तक शरीर चंचल रहता है, चित्त चंचल रहता है और चित्त की चंचलता शरीर को चंचल बनाए रहती है। शरीर की चंचलता नाड़ीसंस्थान की चंचलता पर निर्भर करती है। जब तक नाड़ीसंस्थान संक्षुब्ध रहेगा, शरीर पर इंद्रिय ग्राह्य विषयों के आधात होते रहेंगे। उन आधातों का प्रभाव मस्तिष्क पर पड़ेगा जिसके फलस्वरूप चित्त और शरीर दोनों में ही चंचलता बनी रहेगी। चित्त को निश्चल बनाने के लिये योगी वैसा ही उपाय करता है जैसा कभी-कभी युद्ध में करना पड़ता है। किसी प्रबल शत्रु से लड़ने में यदि उसके मित्रों को परास्त किया जा सके तो सफलता की संभावना बढ़ जाती है। योगी चित्त पर अधिकार पाने के लिए शरीर और उसमें भी मुख्यत: नाड़ीसंस्थान, को वश में करने का प्रयत्न करता है। शरीर भौतिक है, नाड़ियाँ भी भौतिक हैं। इसलिये इनसे निपटना सहज है। जिस प्रक्रिया से यह बात सिद्ध होती है उसके दो अंग हैं: आसन और प्राणायाम। आसन से शरीर निश्चल बनता है। बहुत से आसनों का अभ्यास तो स्वास्थ्य की दृष्टि से किया जाता है। पतंजलि ने इतना ही कहा है: स्थिर सुखमासनम्‌ : जिसपर देर तक बिना कष्ट के बैठा जा सके वही आसन श्रेष्ठ है। यही सही है कि आसनसिद्धि के लिये स्वास्थ्य संबंधी कुछ नियमों का पालन आवश्यक है। जैसा श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है-

युक्ताहार बिहारस्य, युक्त चेष्टस्य कर्मसु।

युक्तस्वप्नावबोधस्य, योगो भवति दु:खहा॥

खाने, पीने, सोने, जागने सभी का नियंत्रण करना होता है।

प्राणायाम

प्राणायाम शब्द के संबंध में बहुत भ्रम फैला हुआ है। इस भ्रम का कारण यह है कि आज लोग प्राण शब्द के अर्थ को प्राय: भूल गए हैं। बहुत से ऐसे लोग भी, जो अपने को योगी कहते हैं, इस शब्द के संबंध में भूल करते हैं। योगी को इस बात का प्रयत्न करना होता है कि वह अपने प्राण को सुषुम्ना में ले जाय। सुषुम्ना वह नाड़ी है जो मेरुदंड की नली में स्थित है और मस्त्तिष्क के नीचे तक पहुँचती है। यह कोई गुप्त चीज नहीं है। आँखों से देखी जा सकती है। करीब-करीब कनष्ठाि उँगली के बराबर मोटी होती है, ठोस है, इसमें कोई छेद नहीं है। प्राण का और साँस या हवा करनेवालों को इस बात का पता नहीं है कि इस नाड़ी में हवा के घुसने के लिये और ऊपर चढ़ने के लिये कोई मार्ग नहीं है। प्राण को हवा का समानार्थक मानकर ही ऐसी बातें कही जाती हैं कि अमुक महात्मा ने अपनी साँस को ब्रह्मांड में चढ़ा लिया। साँस पर नियंत्रण रखने से नाड़ीसंस्थान को स्थिर करने में निश्चय ही सहायता मिलती है, परंतु योगी का मुख्य उद्देश्य प्राण का नियंत्रण है, साँस का नहीं। प्राण वह शक्ति है जो नाड़ीसंस्थान में संचार करती है। शरीर के सभी अवयवों को और सभी धातुओं को प्राण से ही जीवन और सक्रियता मिलती है। जब शरीर के स्थिर होने से ओर प्राणायाम की क्रिया से, प्राण सुषुम्ना की ओर प्रवृत्त होता है तो उसका प्रवाह नीचे की नाड़ियों में से खिंच जाता है। अत: ये नाड़ियाँ बाहर के आधातों की ओर से एक प्रकार से शून्यवत्‌हो जाती हैं।

प्रत्याहार

प्राणयाम का अभ्यास करना और प्राणायाम में सफलता पा जाना दो अलग अलग बातें हैं। परंतु वैराग्य और तीव्र संवेग के बल से सफलता का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। ज्यों-ज्यों अभ्यास दृढ़ होता है, त्यों-त्यों साधक के आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। एक और बात होती है। वह जितना ही अपने चित्त को इंद्रियों और उनके विषयों से दूर खींचता है उतना ही उसकी ऐंद्रिय शक्ति भी बढ़ती है अर्थात्‌इंद्रियों की विषयों के भोग की शक्ति भी बढ़ती है। इसीलिये प्राणायाम के बाद प्रत्याहार का नाम लिया जाता है। प्रत्याहार का अर्थ है इंद्रियों को उनके विषयों से खींचना। वैराग्य के प्रसंग में यह उपदेश दिया जा चुका है परंतु प्राणायम तक पहँचकर इसकों विशेष रूप से दुहराने की आवश्यकता है। आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार के ही समुच्चय का नाम हठयोग है।

धारणा ध्यान, समाधि

खेद की बात है कि कुछ अभ्यासी यहीं रुक जाते हैं। जो लोग आगे बढ़ते हैं उनके मार्ग को तीन विभागों में बाँटा जाता है: धारणा, ध्यान और समाधि। इन तीनों को एक दूसरे से बिल्कुल पृथक करना असंभव है। धारण पुष्ट होकर ध्यान का रूप धारण करती है और उन्नत ध्यान ही समाधि कहलाता है। पतंजलि ने तीनों को सम्मिलित रूप से संयम कहा है। धारणा वह उपाय है जिससे चित्त को एकाग्र करने में सहायता मिलती है। यहाँ उपाय शब्द का एकवचन में प्रयोग हुआ है परंतु वस्तुत: इस काम के अनेक उपाय हैं। इनमें से कुछ का चर्चा उपनिषदों में आया है। वैदिक वाड्मय में विद्या शब्द का प्रयोग किया गया है। किसी मंत्र के जप, किसी देव, देवी या महात्मा के विग्रह या सूर्य, अग्नि, दीपशिखा आदि को शरीर के किसी स्थानविशेष जेसे हृदयमूर्घा, तिल अर्थात दोनों आँखों के बीच के बिंदु, इनमें से किसी जगह कल्पना में स्थिर करना, इस प्रकार के जो भी उपाय किए जायँ वे सभी धारणा के अंतर्गत हैं। जैसा कि कुछ उपायों को बतलाने के बाद पतंजलि ने यह लिख दिया है - यथाभिमत ध्यानाद्वा-जो वस्तु अपने को अच्छी लगे उसपर ही चित्त को एकाग्र करने से काम चल सकता है। किसी पुराण में ऐसी कथा आई है कि अपने गुरु की आज्ञा से किसी अशिक्षित व्यक्ति ने अपनी भैंस के माध्यम से चित्त को एकाग्र करके समाधि प्राप्त की थी।

धारणा की सबसे उत्तम पद्धति वह है जिसे पुराने शब्दों में नादानुसंधान कहते हैं। कबीर और उनके परवर्ती संतों ने इसे सुरत शब्द योग की संज्ञा दी है। जिस प्रकार चंचल मृग वीणा के स्वरों से मुग्ध होकर चौकड़ी भरना भूल जाता है, उसी प्रकार साधक का चित्त नाद के प्रभाव से चंचलता छोड़कर स्थिर हो जाता है। वह नाद कौन सा है जिसमें चित्त की वृत्तियों को लय करने का प्रयास किया जाता है और यह प्रयास कैसे किया जाता है, ये बातें तो गुरुमुख से ही जानी जाती हैं। अंतर्नाद के सूक्ष्मत्तम रूप को प्रवल, ओंकार, कहते हैं। प्रणव वस्तुत: अनुच्चार्य्य है। उसका अनुभव किया जा सकता है, वाणी में व्यंजना नहीं, नादविंदूपनिषद् के शब्दों में:

ब्रह्म प्रणव संयानं, नादों ज्योतिर्मय: शिव:।

स्वयमाविर्भवेदात्मा मेयापायेऽशुमानिव॥

प्रणव के अनुसंधान से, ज्योतिर्मय और कल्याणकारी नाद उदित होता है। फिर आत्मा स्वयं उसी प्रकार प्रकट होता है, जेसे कि बादल के हटने पर चंद्रमा प्रकट होता है। आदि शब्द आंकार को परमात्मा का प्रतीक कहा जाता है। योगियों में सर्वत्र ही इसकी महिमा गाई गई है। बाइबिल के उस खंड में, जिसे सेंट जान्स गास्पेल कहते हैं, पहला ही वाक्य इस प्रकार हैं, आरंभ में शब्द था। वह शब्द परमात्मा के साथ था। वह शब्द परमात्मा था। सूफी संत कहते हैं हैफ़ दर बंदे जिस्म दरमानी, न शुनवी सौते पाके रहमानी दु:ख की बात है कि तू शरीर के बंधन में पड़ा रहता है और पवित्र दिव्य नाद को नहीं सुनता।

चित्त की एकाग्रता ज्यों ज्यों बढ़ती है त्यों त्यों साधकर को अनेक प्रकार के अनुभव होते हैं। मनुष्य अपनी इंद्रियों की शक्ति से परिचित नहीं है। उनसे न तो काम लेता है और न लेना चाहता है। यह बात सुनने में आश्चर्य की प्रतीत होती है, पर सच है। मान लीजिए, हमारी चक्षु या श्रोत्र इंद्रिया की शक्ति कल आज से कई गुना बढ़ जाय। तब न जाने ऐसी कितनी वस्तुएँ दृष्टिगोचर होने लगेंगी जिनको देखकर हम काँप उठेंगे। एक दूसरे के भीतर की रासायनिक क्रिया यदि एक बार देख पड़ जाय तो अपने प्रिय से प्रिय व्यक्ति की ओर से घृणा हो जायगी। हमारे परम मित्र पास की कोठरी में बैठे हमारे संबंध में क्या कहते हैं, यदि यह बात सुनने में आ जाय तो जीना दूभर हो जाय। हम कुछ वासनाओं के पुतले हैं। अपनी इंद्रयों से वहीं तक काम लेते हैं जहाँ तक वासनाओं की तृप्ति हो। इसलिये इंद्रियों की शक्ति प्रसुप्त रहती है परंतु जब योगाभ्यास के द्वारा वासनाओं का न्यूनाधिक शमन होता है तब इंद्रियाँ निर्बाध रूप से काम कर सकती हैं और हमको जगत्‌के स्वरूप के वास्तविक रूप का कुछ परिचय दिलाती हैं। इस विश्व में स्पर्श, रूप, रस और गंध का अपार भंडार भरा पड़ा है जिसकी सत्ता का हमको अनुभव नहीं हैं। अंर्तर्मुख होने पर बिना हमारे प्रयास के ही इंद्रियाँ इस भंडार का द्वार हमारे सामने खोल देती हैं। सुषुम्ना में नाड़ियों की कई ग्रंथियाँ हैं, जिनमें कई जगहों से आई हुई नाड़ियाँ मिलती हैं। इन स्थानों को चक्र कहते हैं। इनमें से विशेष रूप से छह चक्रों का चर्चा योग के ग्रंथों में आता है। सबसे नीचे मुलाधार है जो प्राय: उस जगह पर है जहाँ सुषुम्ना का आरंभ होता है। और सबसे ऊपर आज्ञा चक्र है जो तिल के स्थान पर है। इसे तृतीय नेत्र भी कहते हैं। थोड़ा और ऊपर चलकर सुषुम्ना मस्तिष्क के नाड़िसंस्थान से मिल जाती है। मस्तिष्क के उस सबसे ऊपर के स्थान पर जिसे शरीर विज्ञान में सेरेब्रम कहते हैं, सहस्रारचक्र है। जैसा कि एक महात्मा ने कहा है:

मूलमंत्र करबंद विचारी सात चक्र नव शोधै नारी।।

योगी के प्रारंभिक अनुभवों में से कुछ की ओर ऊपर संकेत किया गया है। ऐसे कुछ अनुभवों का उल्लेख श्वेताश्वर उपनिषद् में भी किया गया है। वहाँ उन्होंने कहा है कि अनल, अनिल, सूर्य, चंद्र, खद्योत, धूम, स्फुलिंग, तारे अभिव्यक्तिकरानि योगे हैंश् यह सब योग में अभिव्यक्त करानेवाले चिह्न हैं अर्थात्‌इनके द्वारा योगी को यह विश्वास हो सकता है कि मैं ठीक मार्ग पर चल रहा हूँ। इसके ऊपर समाधि तक पहुँचते पहुँचते योगी को जो अनुभव होते हैं उनका वर्णन करना असंभव है। कारण यह है कि उनका वर्णन करने के लिये साधारण मनुष्य को साधारण भाषा में कोई प्रतीक या शब्द नहीं मिलता। अच्छे योगियों ने उनके वर्णन के संबंध में कहा है कि यह काम वैसा ही है जैसे गूँगा गुड़ खाय। पूर्णांग मनुष्य भी किसी वस्तु के स्वाद का शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता, फिर गूँगा बेचारा तो असमर्थ है ही। गुड़ के स्वाद का कुछ परिचय फलों के स्वाद से या किसी अन्य मीठी चीज़ के सादृश्य के आधार पर दिया भी जा सकता है, पर जैसा अनुभव हमको साधारणत: होता ही नहीं, वह तो सचमुच वाणी के परे हैं।

समाधि की सर्वोच्च भूमिका के कुछ नीचे तक अस्मिता रह जाती है। अपनी पृथक सत्ता अहम्‌ अस्मि (मैं हूँ) यह प्रतीति रहती है। अहम्‌अस्मि = मैं हूँ की संतान अर्थात निरंतर इस भावना के कारण वहाँ तक काल की सत्ता है। इसके बाद झीनी अविद्या मात्र रह जाती है। उसके शय होने की अवस्था का नाम असंप्रज्ञात समाधि है जिसमें अविद्या का भी क्षय हो जाता है और प्रधान से कल्पित संबंध का विच्छेद हो जाता है। यह योग की पराकाष्ठा है। इसके आगे फिर शास्त्रार्थ का द्वार खुल जाता है। सांख्य के आचार्य कहते हैं कि जो योगी पुरुष यहाँ तक पहुँचा, उसके लिये फिर तो प्रकृति का खेल बंद हो जाता है। दूसरे लोगों के लिये जारी रहता है। वह इस बात को यों समझाते हैं। किसी जगह नृत्य हो रहा है। कई व्यक्ति उसे देख रहे हैं। एक व्यक्ति उनमें ऐसा भी है जिसको उस नृत्य में कोई अभिरुचि नहीं है। वह नर्तकी की ओर से आँख फेर लेता है। उसके लिये नृत्य नहीं के बराबर है। दूसरे के लिये वह रोचक है। उन्होंने कहा है कि उस अजा के साथ अर्थात नित्या के साथ अज एकोऽनुशेते = एक अज शयन करता है और जहात्येनाम्‌भुक्तभोगाम्‌तथान्य:-उसके भोग से तृप्त होकर दूसरा त्याग देता है।

अद्वैत वेदांत के आचार्य सांख्यसंमत पुरुषों की अनेकता को स्वीकार नहीं करते। उनके अतिरिक्त और भी कई दार्श्निक संप्रदाय हैं जिनके अपने अलग अलग सिद्धांत हैं। पहले कहा जा चुका हैं कि इस शास्त्रार्थ में यहां पड़ने की आवश्यकता नहीं हैं। जहां तक योग के व्यवहारिक रूप की बात है उसमें किसी को विरोध नहीं है। वेदांत के आचार्य भी निर्दिध्यासन की उपयोगिता को स्वीकार करते हैं और वेदांत दर्शन में व्यास ने भी असकृदभ्यासात्‌ओर आसीन: संभवात्‌जैसे सूत्रों में इसका समर्थन किया है। इतना ही हमारे लिये पर्याप्त है।

साधारणत: योग को अष्टांग कहा जाता है परंतु यहाँ अब तक आसन से लेकर समाधि तक छह अंगों का ही उल्लेख किया गया है। शेष दो अंगों को इसलिये नहीं छोड़ा कि वे अनावश्यक हैं वरन्‌इसलिए कि वह योगी ही नहीं प्रत्युत मनुष्य मात्र के लिए परम उपयोगी हैं। उनमें प्रथम स्थान यम का है। इनके संबंध में कहा गया है कि यह देश काल, समय से अनवच्छिन्न ओर सार्वभौम महाब्रत हैं अर्थात्‌प्रत्येक मनुष्य को प्रत्येक स्थान पर प्रत्येक समय और प्रत्येक अवस्था में प्रत्येक व्यक्ति के साथ इनका पालन करना चाहिए। दूसरा अंग नियम कहलाता है। जो लोग ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करते उनके लिये ईश्वर पर निष्ठा रखने का कोई और नहीं है। परंतु वह लोग भी प्राय: किसी न किसी ऐसे व्यक्ति पर श्रद्धा रखते हैं जो उनके लिये ईश्वर तुल्य है। बौद्ध को बुद्धदेव के प्रति जो निष्ठा है वह उससे कम नहीं है जो किसी भी ईश्वरवादी को ईश्वर पर होती होगी। एक और बात है। किसी को ईश्वर पर श्रद्धा हो या न हो, योग मार्ग के उपदेष्टा गुरु पर तो अनन्य श्रद्धा होनी ही चाहिए। योगाभ्यासी के लिये गुरु का स्थान किसी भी दृष्टि से ईश्वर से कम नहीं। ईश्वर हो या न हो परंतु गुरु के होने पर तो कोई संदेह हो ही नहीं सकता। एक साधक चरणादास जी की शिष्या सहजोबाई ने कहा है:

गुरुचरनन पर तन-मन वारूँ, गुरु न तजूँ हरि को तज डारूँ।

आज कल यह बात सुनने में आती है कि परम पुरुषार्थ प्राप्त करने के लिये ज्ञान पर्याप्त है। योग की आवश्यकता नहीं है। जो लोग ऐसा कहते हैं, वह ज्ञान शब्द के अर्थ पर गंभीरता से विचार नहीं करते। ज्ञान दो प्रकार का होता है-तज्ज्ञान और तद्विषयक ज्ञान। दोनों में अंतर है। कोई व्यक्ति अपना सारा जीवन रसायन आदि शास्त्रों के अध्ययन में बिताकर शक्कर के संबंध में जानकारी प्राप्त कर सकता है। शक्कर के अणु में किन किन रासायनिक तत्वों के कितने कितने परमाणु होते हैं? शक्कर कैसे बनाई जाती है? उसपर कौन कौन सी रासानिक क्रिया और प्रतिक्रियाएँ होती हैं? इत्यादि। यह सब शक्कर विषयक ज्ञान है। यह भी उपयोगी हो सकता है परंतु शक्कर का वास्तविक ज्ञान तो उसी समय होता है जब एक चुटकी शक्कर मुँह में रखी जाती है। यह शक्कर का तत्वज्ञान है। शास्त्रों के अध्ययन से जो ज्ञान प्राप्त होता है वह सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान है और उसके प्रकाश में तद्विषयक ज्ञान भी पूरी तरह समझ में आ सकता हैं। इसीलिये उपनिषद् के अनुसार जब यम ने नचिकेता को अध्यात्म ज्ञान का उपदेश दिया तो उसके साथ में योगविधि च कृत्स्नम्‌की भी दीक्षा दी, नहीं तो नचिकेता का बोध अधूरा ही रह जाता। जो लोग भक्ति आदि की साधना रूप से प्रशंसा करते हैं उनकोश् भी यह ध्यान में रखना चाहिए कि यदि उनके मार्ग में वित्त को एकाग्र करने का कोई उपाय है तो वह वस्तुत: योग की धारणा अंग के अंतर्गत है। यह उनकी मर्जी है कि सनातन योग शब्द को छोड़कर नये शब्दों का व्यवहार करते हैं।

योग के अभ्यास से उस प्रकार की शक्तियों का उदय होता है जिनको विभूति या सिद्धि कहते हैं। यदि पर्याप्त समय तक अभ्यास करने के बाद भी किसी मनुष्य में ऐसी असाधारण शक्तियों का आगम नहीं हुआ तो यह मानना चाहिए कि वह ठीक मार्ग पर नहीं चल रहा है। परंतु सिद्धियों में कोई जादू की बात नहीं है। इंद्रियों की शक्ति बहुत अधिक है परंतु साधारणत: हमको उसका ज्ञान नहीं होता और न हम उससे काम लेते हैं। अभयासी को उस शक्ति का परिचय मिलता है, उसको जगत्‌के स्वरूप के संबंध में ऐसे अनुभव होते हैं जो दूसरों को प्राप्त नहीं हैं। दूर की या छिपी हुई वस्तु को देख लेना, व्यवहृत बातों को सुन लेना इत्यादि इंद्रियों की सहज शक्ति की सीमा के भीतर की बाते हैं परंतु साधारण मनुष्य के लिये यह आश्चर्यश् का विषय हैं, इनकों सिद्धि कहा जायगा। इसी प्रकार मनुष्य में और भी बहुत सी शक्तियाँ हें जो साधरण अवस्था में प्रसुप्त रहती हैं। योग के अभयास से जाग उठती हैं। यदि हम किसी सड़क पर कहीं जा रहे हो तो अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए भी अनायास ही दाहिने बाएँ उपस्थित विषयों को देख लेंगे। सच तो यह है कि जो कोई इन विषयों को देखने के लिये रुकेगा वह गन्तव्य स्थान तक पहुँचेगा ही नहीं ओर बीच में ही रह जायगा। इसीलिये कहा गया है कि जो कोई सिद्धियों के लिये प्रयत्न करता है वह अपने को समाधि से वंचित करता है। पतंजलि ने कहा है:

ते समाधावुपसर्गाव्युत्थाने सिद्धयः।

अर्थात्‌ये विभूतियाँ समाधि में बाधक हैं परंतु समाधि से उठने की अवस्था में सिद्धि कहलाती हैं।

 

योग : इसकी उत्पित्ति, इतिहास एवं विकास


परिचय : योग तत्‍वत: बहुत सूक्ष्‍म विज्ञान पर आधारित एक आध्‍यात्मि विषय है जो मन एवं शरीर के बीच सामंजस्‍य स्‍थापित करने पर ध्‍यान देता है। यह स्‍वस्‍थ जीवन - यापन की कला एवं विज्ञान है। योग शब्‍द संस्‍कृत की युज धातु से बना है जिसका अर्थ जुड़ना या एकजुट होना या शामिल होना है। योग से जुड़े ग्रंथों के अनुसार योग करने से व्‍यक्ति की चेतना ब्रह्मांड की चेतना से जुड़ जाती है जो मन एवं शरीर, मानव एवं प्रकृति के बीच परिपूर्ण सामंजस्‍य का द्योतक है। आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्मांड की हर चीज उसी परिमाण नभ की अभिव्‍यक्ति मात्र है। जो भी अस्तित्‍व की इस एकता को महसूस कर लेता है उसे योग में स्थित कहा जाता है और उसे योगी के रूप में पुकारा जाता है जिसने मुक्‍त अवस्‍था प्राप्‍त कर ली है जिसे मुक्ति, निर्वाण या मोक्ष कहा जाता है। इस प्रकार, योग का लक्ष्‍य आत्‍म-अनुभूति, सभी प्रकार के कष्‍टों से निजात पाना है जिससे मोक्ष की अवस्‍था या कैवल्‍य की अवस्‍था प्राप्‍त होती है। जीवन के हर क्षेत्र में आजादी के साथ जीवन - यापन करना, स्‍वास्‍थ्‍य एवं सामंजस्‍य योग करने के प्रमुख उद्देश्‍य होंगे। योग का अभिप्राय एक आंतरिक विज्ञान से भी है जिसमें कई तरह की विधियां शामिल होती हैं जिनके माध्‍यम से मानव इस एकता को साकार कर सकता है और अपनी नियति को अपने वश में कर सकता है। चूंकि योग को बड़े पैमाने पर सिंधु - सरस्‍वती घाटी सभ्‍यता, जिसका इतिहास 2700 ईसा पूर्व से है, के अमर सांस्‍कृतिक परिणाम के रूप में बड़े पैमाने पर माना जाता है, इसलिए इसने साबित किया है कि यह मानवता के भौतिक एवं आध्‍यात्मिक दोनों तरह के उत्‍थान को संभव बनाता है। बुनियादी मानवीय मूल्‍य योग साधना की पहचान हैं।

योग का संक्षिप्‍त इतिहास एवं विकास:

ऐसा माना जाता है कि जब से सभ्‍यता शुरू हुई है तभी से योग किया जा रहा है। योग के विज्ञान की उत्‍पत्ति हजारों साल पहले हुई थी, पहले धर्मों या आस्‍था के जन्‍म लेने से काफी पहले हुई थी। योग विद्या में शिव को पहले योगी या आदि योगी तथा पहले गुरू या आदि गुरू के रूप में माना जाता है।

कई हजार वर्ष पहले, हिमालय में कांति सरोवर झील के तटों पर आदि योगी ने अपने प्रबुद्ध ज्ञान को अपने प्रसिद्ध सप्‍तऋषि को प्रदान किया था। सत्‍पऋषियों ने योग के इस ताकतवर विज्ञान को एशिया, मध्‍य पूर्व, उत्‍तरी अफ्रीका एवं दक्षिण अमरीका सहित विश्‍व के भिन्‍न - भिन्‍न भागों में पहुंचाया। रोचक बात यह है कि आधुनिक विद्वानों ने पूरी दुनिया में प्राचीन संस्‍कृतियों के बीच पाए गए घनिष्‍ठ समानांतर को नोट किया है। तथापि, भारत में ही योग ने अपनी सबसे पूर्ण अभिव्‍यक्ति प्राप्‍त की। अगस्‍त नामक सप्‍तऋषि, जिन्‍होंने पूरे भारतीय उप महाद्वीप का दौरा किया, ने यौगिक तरीके से जीवन जीने के इर्द-गिर्द इस संस्‍कृति को गढ़ा।

योग करते हुए पित्रों के साथ सिंधु - सरस्‍वती घाटी सभ्‍यता के अनेक जीवाश्‍म अवशेष एवं मुहरें भारत में योग की मौजूदगी का संकेत देती हैं।योग करते हुए पित्रों के साथ सिंधु - सरस्‍वती घाटी सभ्‍यता के अनेक जीवाश्‍म अवशेष एवं मुहरें भारत में योग की मौजूदगी का सुझाव देती हैं। देवी मां की मूर्तियों की मुहरें, लैंगिक प्रतीक तंत्र योग का सुझाव देते हैं। लोक परंपराओं, सिंधु घाटी सभ्‍यता, वैदिक एवं उपनिषद की विरासत, बौद्ध एवं जैन परंपराओं, दर्शनों, महाभारत एवं रामायण नामक महाकाव्‍यों, शैवों, वैष्‍णवों की आस्तिक परंपराओं एवं तांत्रिक परंपराओं में योग की मौजूदगी है। इसके अलावा, एक आदि या शुद्ध योग था जो दक्षिण एशिया की रहस्‍यवादी परंपराओं में अभिव्‍यक्‍त हुआ है। यह समय ऐसा था जब योग गुरू के सीधे मार्गदर्शन में किया जाता था तथा इसके आध्‍यात्मिक मूल्‍य को विशेष महत्‍व दिया जाता था। यह उपासना का अंग था तथा योग साधना उनके संस्‍कारों में रचा-बसा था। वैदिक काल के दौरान सूर्य को सबसे अधिक महत्‍व दिया गया। हो सकता है कि इस प्रभाव की वजह से आगे चलकर 'सूर्य नमस्‍कार' की प्रथा का आविष्‍कार किया गया हो। प्राणायाम दैनिक संस्‍कार का हिस्‍सा था तथा यह समर्पण के लिए किया जाता था। हालांकि पूर्व वैदिक काल में योग किया जाता था, महान संत महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्रों के माध्‍यम से उस समय विद्यमान योग की प्रथाओं, इसके आशय एवं इससे संबंधित ज्ञान को व्‍यवस्थित एवं कूटबद्ध किया। पतंजलि के बाद, अनेक ऋषियों एवं योगाचार्यों ने अच्‍छी तरह प्रलेखित अपनी प्रथाओं एवं साहित्‍य के माध्‍यम से योग के परिरक्षण एवं विकास में काफी योगदान दिया।

सूर्य नमस्‍कारपूर्व वैदिक काल (2700 ईसा पूर्व) में एवं इसके बाद पतंजलि काल तक योग की मौजूदगी के ऐतिहासिक साक्ष्‍य देखे गए। मुख्‍य स्रोत, जिनसे हम इस अवधि के दौरान योग की प्रथाओं तथा संबंधित साहित्‍य के बारे में सूचना प्राप्‍त करते हैं, वेदों (4), उपनिषदों (18), स्‍मृतियों, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, पाणिनी, महाकाव्‍यों (2) के उपदेशों, पुराणों (18) आदि में उपलब्‍ध हैं।

अनंतिम रूप से 500 ईसा पूर्व - 800 ईस्‍वी सन के बीच की अवधि को श्रेष्‍ठ अवधि के रूप में माना जाता है जिसे योग के इतिहास एवं विकास में सबसे उर्वर एवं महत्‍वपूर्ण अवधि के रूप में भी माना जाता है। इस अवधि के दौरान, योग सूत्रों एवं भागवद्गीता आदि पर व्‍यास के टीकाएं अस्तित्‍व में आईं। इस अवधि को मुख्‍य रूप से भारत के दो महान धार्मिक उपदेशकों - महावीर एवं बुद्ध को समर्पित किया जा सकता है। महावीर द्वारा पांच महान व्रतों - पंच महाव्रतों एवं बुद्ध द्वारा अष्‍ठ मग्‍गा या आठ पथ की संकल्‍पना - को योग साधना की शुरूआती प्रकृति के रूप में माना जा सकता है। हमें भागवद्गीता में इसका अधिक स्‍पष्‍ट स्‍पष्‍टीकरण प्राप्‍त होता है जिसमें ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्म योग की संकल्‍पना को विस्‍तार से प्रस्‍तुत किया गया है। तीन प्रकार के ये योग आज भी मानव की बुद्धिमत्ता के सर्वोच्‍च उदाहरण हैं तथा आज भी गीता में प्रदर्शित विधियों का अनुसरण करके लागों को शांति मिलती है। पतंजलि के योग सूत्र में न केवल योग के विभिन्‍न घटक हैं, अपितु मुख्‍य रूप से इसकी पहचान योग के आठ मार्गों से होती है। व्‍यास द्वारा योग सूत्र पर बहुत महत्‍वपूर्ण टीका भी लिखी गई। इसी अवधि के दौरान मन को महत्‍व दिया गया तथा योग साधना के माध्‍यम से स्पष्‍ट से बताया गया कि समभाव का अनुभव करने के लिए मन एवं शरीर दोनों को नियंत्रित किया जा सकता है। 800 ईसवी - 1700 ईसवी के बीच की अवधि को उत्‍कृष्‍ट अवधि के बाद की अवधि के रूप में माना जाता है जिसमें महन आचार्यत्रयों - आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और माधवाचार्य - के उपदेश इस अवधि के दौरान प्रमुख थे। इस अवधि के दौरान सुदर्शन, तुलसी दास, पुरंदर दास, मीराबाई के उपदेशों ने महान योगदान दिया। हठयोग परंपरा के नाथ योगी जैसे कि मत्‍स्‍येंद्र नाथ, गोरख नाथ, गौरांगी नाथ, स्‍वात्‍माराम सूरी, घेरांडा, श्रीनिवास भट्ट ऐसी कुछ महान हस्तियां हैं जिन्‍होंने इस अवधि के दौरान हठ योग की परंपरा को लोकप्रिय बनाया।

1700 - 1900 ईसवी के बीच की अवधि को आधुनिक काल के रूप में माना जाता है जिसमें महान योगाचार्यों - रमन महर्षि, रामकृष्‍ण परमहंस, परमहंस योगानंद, विवेकानंद आदि ने राज योग के विकास में योगदान दिया है। यह ऐसी अवधि है जिसमें वेदांत, भक्ति योग, नाथ योग या हठ योग फला - फूला। शादंगा - गोरक्ष शतकम का योग, चतुरंगा - हठयोग प्रदीपिका का योग, सप्‍तंगा - घेरांडा संहिता का योग - हठ योग के मुख्‍य जड़सूत्र थे।

अब समकालीन युग में स्‍वास्‍थ्‍य के परिरक्षण, अनुरक्षण और संवर्धन के लिए योग में हर किसी की आस्‍था है। स्‍वमी विवेकानंद, श्री टी कृष्‍णमचार्य, स्वामी कुवालयनंदा, श्री योगेंद्र, स्‍वामी राम, श्री अरविंदो, महर्षि महेश योगी, आचार्य रजनीश, पट्टाभिजोइस, बी के एस आयंगर, स्‍वामी सत्‍येंद्र सरस्‍वती आदि जैसी महान हस्तियों के उपदेशों से आज योग पूरी दुनिया में फैल गया है।

बी के एस आयंगर ''आयंगर योग'' के नाम से विख्‍यात योग शैली के संस्‍थापक थे तथा उनको दुनिया के सर्वश्रेष्‍ठ योग शिक्षकों में से एक के रूप में माना जाता है।भ्रातियों को दूर करना :

कई लोगों के लिए योग का अर्थ हठ योग एवं आसनों तक सीमित है। तथापि, योग सूत्रों में केवल तीन सूत्रों में आसनों का वर्णन आता है। मौलिक रूप से हठ योग तैयारी प्रक्रिया है जिससे कि शरीर ऊर्जा के उच्‍च स्‍तर को बर्दाश्‍त कर सके। प्रक्रिया शरीर से शुरू होती है फिर श्‍वसन, मन और अंतरतम की बारी आती है।

आम तौर पर योग को स्‍वास्‍थ्‍य एवं फिटनेस के लिए थिरेपी या व्‍यायाम की पद्धति के रूप में समझा जाता है। हालांकि शारीरिक एवं मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य योग के स्‍वाभाविक परिणाम हैं, परंतु योग का लक्ष्‍य अधिक दूरगामी है। ''योग ब्रह्माण्‍ड से स्‍वयं का सामंजस्‍य स्‍थापित करने के बारे में है। यह सर्वोच्‍च स्‍तर की अनुभूति एवं सामंजस्‍य प्राप्‍त करने के लिए ब्रह्माण्‍ड से स्‍वयं की ज्‍यामिती को संरेखित करने की कला है।

योग किसी खास धर्म, आस्‍था पद्धति या समुदाय के मुताबिक नहीं चलता है; इसे सदैव अंतरतम की सेहत के लिए कला के रूप में देखा गया है। जो कोई भी तल्‍लीनता के साथ योग करता है वह इसके लाभ प्राप्‍त कर सकता है, उसका धर्म, जाति या संस्‍कृति जो भी हो। योग की परंपरागत शैलियां : योग के ये भिन्‍न - भिन्‍न दर्शन, परंपराएं, वंशावली तथा गुरू - शिष्‍य परंपराएं योग की ये भिन्‍न - भिन्‍न परंपरागत शैलियों के उद्भव का मार्ग प्रशस्‍त करती हैं, उदाहरण के लिए ज्ञान योग, भक्ति योग, कर्म योग, ध्‍यान योग, पतंजलि योग, कुंडलिनी योग, हठ योग, मंत्र योग, लय योग, राज योग, जैन योग, बुद्ध योग आदि। हर शैली के अपने स्‍वयं के सिद्धांत एवं पद्धतियां हैं जो योग के परम लक्ष्‍य एवं उद्देश्‍यों की ओर ले जाती हैं।

स्‍वास्‍थ्‍य एवं तंदरूस्‍ती के लिए योग की पद्धतियां : वड़े पैमाने पर की जाने वाली योग साधनाएं इस प्रकार हैं : यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्‍याहार, धारणा, ध्‍यान, समाधि / साम्‍यामा, बंध एवं मुद्राएं, षटकर्म, युक्‍त आहार, युक्‍त कर्म, मंत्र जप आदि। यम अंकुश हैं तथा नियम आचार हैं। इनको योग साधना के लिए पहली आवश्यकता के रूप में माना जाता है। आसन, शरीर एवं मन की स्थिरता लाने में सक्षम 'कुर्यात तद आसनं स्थैर्यम...' के तहत काफी लंबी अवधि तक शरीर (मानसिक - शारीरिक) के विभिन्‍न पैटर्न को अपनाना, शरीर की मुद्रा बनाए रखने की सामर्थ्‍य प्रदान करना (अपने संरचनात्‍मक अस्तित्‍व की स्थिर चेतना) शामिल है।

प्राणायाम की विभिन्‍न मुद्राएंप्राणायाम के तहत अपने श्‍वसन की जागरूकता पैदा करना और अपने अस्तित्‍व के प्रकार्यात्‍मक या महत्‍वपूर्ण आधार के रूप में श्‍वसन को अपनी इच्‍छा से विनियमित करना शामिल है। यह अपने मन की चेतना को विकसित करने में मदद करता है तथा मन पर नियंत्रण रखने में भी मदद करता है। शुरूआती चरणों में, यह नासिकाओं, मुंह तथा शरीर के अन्‍य द्वारों, इसके आंतरिक एवं बाहरी मार्गों तथा गंतव्‍यों के माध्‍यम से श्‍वास - प्रश्‍वास की जागरूकता पैदा करके किया जाता है। आगे चलकर, विनियमित, नियंत्रित एवं पर्यवेक्षित श्‍वास के माध्‍यम से इस परिदृश्‍य को संशोधित किया जाता है जिससे यह जागरूकता पैदा होती है कि शरीर के स्‍थान भर रहे हैं (पूरक), स्‍थान भरी हुई अवस्‍था में बने हुए हैं (कुंभक) और विनियमित, नियंत्रित एवं पर्यवेक्षित प्रश्‍वास के दौरान यह खाली हो रहा है (रेचक)।

प्रत्‍याहार ज्ञानेंद्रियों से अपनी चेतना को अलग करने का प्रतीक है, जो बाहरी वस्‍तुओं से जुड़े रहने में हमारी मदद करती हैं। धारणा ध्‍यान (शरीर एवं मन के अंदर) के विस्‍तृत क्षेत्र का द्योतक है, जिसे अक्‍सर संकेंद्रण के रूप में समझा जाता है। ध्‍यान शरीर एवं मन के अंदर अपने आप को केंद्रित करना है और समाधि - एकीकरण।

बंध और मुद्राएं प्राणायाम से संबद्ध साधनाएं हैं। इनको योग की उच्‍चतर साधना के रूप में देखा जाता है क्‍योंकि इनमें मुख्‍य रूप से श्‍वसन पर नियंत्रण के साथ शरीर (शारीरिक - मानसिक) की कतिपय पद्धतियों को अपनाना शामिल है। इससे मन पर नियंत्रण और सुगम हो जाता है तथा योग की उच्‍चतर सिद्धि का मार्ग प्रशस्‍त होता है। षटकर्म विषाक्‍तता दूर करने की प्रक्रियाएं हैं तथा शरीर में संचित विष को निकालने में मदद करते हैं और ये नैदानिक स्‍वरूप के हैं।

युक्‍ताहार (सही भोजन एवं अन्‍य इनपुट) स्‍वस्‍थ जीवन के लिए उपयुक्‍त आहार एवं खान-पान की आदतों की वकालत करता है। तथापि, आत्‍मानुभूति, जिसे उत्‍कर्ष का मार्ग प्रशस्‍त होता है, में मदद करने वाली ध्‍यान की साधना को योग साधना के सार के रूप में माना जाता है।

योग साधना की मौलिक बातें :

योग हमारे शरीर, मन, भावना एवं ऊर्जा के स्‍तर पर काम करता है। इसकी वजह से मोटेतौर पर योग को चार भागों में बांटा गया है : कर्मयोग, जहां हम अपने शरीर का उपयोग करते हैं; भक्तियोग, जहां हम अपनी भावनाओं का उपयोग करते हैं; ज्ञानयोग, जहां हम मन एवं बुद्धि का प्रयोग करते हैं और क्रियायोग, जहां हम अपनी ऊर्जा का उपयोग करते हैं।

हम योग साधना की जिस किसी पद्धति का उपयोग करें, वे इन श्रेणियों में से किसी एक श्रेणी या अधिक श्रेणियों के तहत आती हैं। हर व्‍यक्ति इन चार कारकों का एक अनोखा संयोग होता है। ''योग पर सभी प्राचीन टीकाओं में इस बात पर जोर दिया गया है कि किसी गुरू के मार्गदर्शन में काम करना आवश्‍यक है।'' इसका कारण यह है कि गुरू चार मौलिक मार्गों का उपयुक्‍त संयोजन तैयार कर सकता है जो हर साधक के लिए आवश्‍यक होता है। योग शिक्षा : परंपरागत रूप से, परिवारों में ज्ञानी, अनुभवी एवं बुद्धिमान व्‍यक्तियों द्वारा (पश्चिम में कंवेंट में प्रदान की जानी वाली शिक्षा से इसकी तुलना की जा सकती है) और फिर आश्रमों में (जिसकी तुलना मठों से की जा सकती है) ऋषियों / मुनियों / आचार्यों द्वारा योग की शिक्षा प्रदान की जाती थी। दूसरी ओर, योग की शिक्षा का उद्देश्‍य व्‍यक्ति, अस्तित्‍व का ध्‍यान रखना है। ऐसा माना जाता है कि अच्‍छा, संतुलित, एकीकृत, सच पर चलने वाला, स्‍वच्‍छ, पारदर्शी व्‍यक्ति अपने लिए, परिवार, समाज, राष्‍ट्र, प्रकृति और पूरी मानवता के लिए अधिक उपयोगी होगा। योग की शिक्षा स्‍व की शिक्षा है। विभिन्‍न जीवंत परंपराओं तथा पाठों एवं विधियों में स्‍व के साथ काम करने के व्‍यौरों को रेखांकित किया गया है जो इस महत्‍वपूर्ण क्षेत्र में योगदान कर रहे हैं जिसे योग के नाम से जाना जाता है।

आजकल, योग की शिक्षा अनेक मशहूर योग संस्‍थाओं, योग विश्‍वविद्यालयों, योग कालेजों, विश्‍वविद्यालयों के योग विभागों, प्राकृतिक चिकित्‍सा कालेजों तथा निजी न्‍यासों एवं समितियों द्वारा प्रदान की जा रही है। अस्‍पतालों, औषधालयों, चिकित्‍सा संस्‍थाओं तथा रोगहर स्‍थापनाओं में अनेक योग क्‍लीनिक, योग थेरेपी और योग प्रशिक्षण केंद्र, योग की निवारक स्‍वास्‍थ्‍य देख-रेख यूनिटें, योग अनुसंधान केंद्र आदि स्‍थापित किए गए हैं।

योग की धरती भारत में विभिन्‍न सामाजिक रीति-रिवाज एवं अनुष्‍ठान पारिस्थितिकी संतुलन, दूसरों की चिंतन पद्धति के लिए सहिष्‍णुता तथा सभी प्राणियों के लिए सहानुभूति के लिए प्रेम प्रदर्शित करते हैं। सभी प्रकार की योग साधना को सार्थक जीवन एवं जीवन-यापन के लिए रामबाण माना जाता है। व्‍यापक स्‍वास्‍थ्‍य, सामाजिक एवं व्‍यक्तिगत दोनों, के लिए इसका प्रबोधन सभी धर्मों, नस्‍लों एवं राष्‍ट्रीयताओं के लोगों के लिए इसके अभ्‍यास को उपयोगी बनाता है।

योग का उद्भव एवं विकास


योग भारतीय संस्कृति का एक आधार स्तम्भ हैं । जो प्राचिन काल से आधुनिक काल तक हमारे काल से जुडा हुआ है । इस योग का महत्व प्राचिन काल से भी था तथा आधुनिक काल में भी इसका महत्व और अधिक बडा है। प्रिय पाठको योग एक ऐसी विद्या है जिसके द्वारा मन को अविद्या,अस्मिता आदि द्वेषो से बचाकर वृत्तियों से रहित कर परमात्मा में लीन करने का ज्ञान प्राप्त होता है एक सामान्य ज्ञान से लेकर उच्च कोटि के साधको के लिए योग के अलग-अलग मार्गो का निर्देश अलग-अलग भागो में किया गया है इन सभी मार्गो में साधना एवं साधन की विधि अलग-अलग हो सकती है किन्तु इन सभी का अन्तिम उद्देश्य परम तत्व को प्राप्त करना होता है। 
योग का उद्भव वेदों से होता है तथा इसके विकास की एक क्रमबद्ध श्रृखंला प्रारम्भ होती है वेद के उपरान्त उपनिषदो तथा भिन्न-भिन्न स्मृतियो में स्मृतियों के उपरान्त विभिन्न दर्शनो एंव यौगिक ग्रन्थों में तत्पश्चात गीता में तथा वर्तमान में आधुनिक काल तक इसके विकास की एक क्रमबध श्रृखंला हैं।

योग का उदभव 

योग के उदभव का अर्थ योग के प्रारम्भ अथवा उत्पन्न होने से लिया जा सकता है योग का प्रारम्भ आदी काल से ही है सृष्टि के आदि ग्रन्थ के रूप मे वेदो का वर्णन आता है। वेद वह ईश्वरी ज्ञान है। जिसमे मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष पर प्रकाश डाला गया है तथा जीवन को सुखमय बनाते हुए जीवन के चरम लक्ष्य मुक्ति के मार्ग को समझाया गया है। इस मुक्ति के मार्ग के साधन के रूप मे योग मार्ग का उल्लेख किया जाता हो सर्वपथम ऋग्वेंद में कहा गया है- यञजते मन उत यृञजते धियों विप्रा विप्रस्थ बृहतो विपश्रिचत:।। 

 

अर्थात जीव (मनुष्य) को परमेश्वर की उपासना नित्य करनी उचित है वह मनुष्य अपने मन को सब विद्याओं से युक्त परमेश्वर में स्थित करें। यहॉ पर मन को परमेश्वर में स्थिर करने का साधन योगाभ्यास का निर्देश दिया गया है 
अन्यत्र यजुर्वेद में पुन:कहा गया- योगे योगें तवस्तंर वाजे वाजे हवामहे। सखाय इन्द्रमूतये।। 

 

अर्थात बार-बार योगाभ्यास करते और बार-बार शारीरिक एंव मानसिक बल बढाते समय हम सब परस्पर मित्रभाव से युक्त होकर अपनी रक्षा के लिए अनन्त बलवान, ऐष्वर्यषाली ईश्वर का ध्यान करते है तथा उसका आवाहन करते है । योग के उदभव अथवा प्रथम वक्ता के याजवल्वय स्मृति में कहा गया है- हिरण्यगर्यो योगास्थ वक्ता नास्य:पुरातन:।  

अर्थात हिरण्यगर्म ही योग के सबसे पुरातन अथवा आदि प्रवक्ता है। महाभारत में भी हिरण्यगर्म को ही योग के आदि के रूप मे स्वीकार करते हुए कहा गया- सांख्यस्य वक्ता कपिल: परमर्शि:स उच्यते।  हिरण्यगर्यो योगस्य वक्ता नास्य:पुरातन:। 

अर्थात साख्य के वक्ता परम ऋषि मुनिवर कपिल है योग के आदि प्रवक्ता हिरण्य गर्भ है। हिरण्यगर्भ को वेदो में स्पष्ट करते हुये कहा गया है कि हिरण्यगर्भ परमात्मा का ही एक विश्लेषण है अर्थात परमात्मा को ही हिरण्यगर्म के नाम से पुकारा जाता है।

इससे स्पष्ट होता है कि योग के आदि वक्ता परमात्मा (हिरण्यगर्भ) है जहॉ से इस बात का ज्ञान का उदभव हुआ तथा वेदो के माध्यम से इस विद्या का प्रादुर्भाव संसार में हुआ। योग के प्रसिद्व ग्रन्थ हठ प्रदीपिका के प्रारम्भ में आदिनाथ शिव को योग के प्रर्वतक के रूप में नमन करते हुये कहा गया है- श्री आदिनाथ नमोस्तु तस्मै येनोपदिष्य

अर्थात उन भगवान आदिनाथ को नमस्कार है जिन्होने हठयोग विद्या की शिक्षा दी । कुछ विद्वान योग के उद्भव को सिन्धु घाटी सभ्यता के साथ भी जोडते है तथा इस सभ्यता के अवशेषो मे प्राप्त विभिन्न आसनों के चित्रों एंव ध्यान के चित्रों से यह अनुमान करते है कि योग का उद्गम इसी सभ्यता के साथ हुआ है।

योग का विकास क्रम 

जिज्ञासु पाठको पूर्व का अध्ययन इस तथ्य को स्पष्ट करते है कि योग विद्या का उद्देश्य हिरण्यगर्भ (परमात्मा) द्वारा किया गया तथा वेदो मे इसका वर्णन प्राप्त हुआ वेदो के उपरान्त इस विद्या का प्रचार प्रसार संसार मे हुआ तथा यह विकास अभी तक चलता आ रहा है अब हम इसी विकास क्रम पर दृष्टिगत करते है

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वेदो में योग का विकास क्रम - 

वेद ससार के आदि ग्रन्थ है सृष्टि के आरम्भ में अग्नि, वायु, आदित्य, एवं अंगीरा नामक ऋशियों ने परमात्मा से प्राप्त प्रेरणा के आधार पर वेदों की रचना की इसी कारण वेद को परमात्मा की वाणी की संज्ञा दी जाती है वेदो में योग विद्या का वर्णन भिन्न-भिन्न स्थानों पर किया गया जिनमें से कुछ का वर्णन इस प्रकार है।

 

योगे -योगे तवस्तरं वाजे वाजे हवामहे 

सखाय इन्द्र भूतयें।। 

 

अर्थात हम योग में तथा हर मुसीबत के परम ऐष्वर्यवान इन्द्र का आवाहन करते है ।

यजुर्वेद में कहा है -

 

यृञजान: प्रथमं मनस्तत्वाय सविता धियम्। 

अग्नेज्र्योतिर्निचास्य अध्याभरत्।। यजु 0 11/1 


अर्थात योग को करने वाले मनुष्य ब्रहमज्ञान के लिए जब अपने मन को परमेश्वर में युक्त करते है तब परमेश्वर उनकी वृद्वि को अपनी कृपा से अपने मे युक्त कर लेते है फिर वें परमात्मा के प्रकाश को धारण करते है।  

अथर्ववेद मे शरीस्थ च्रकों पर प्रकाश डालते हुए कहा गया- अष्टचक्र नवद्वारा देवातां पूरयोधया तस्ंया हिरण्यभय: कोश: स्वर्गो ज्योतिशावृत:।। अथर्ववेद 10/1/31 

 

अर्थात आठ च्रको एवं नौ द्वारों से युक्त यह शरीर एक अपराजेय देव नगरी है इसमें हिरण्यभय कोश है जो ज्योति एंव आनन्द से परिपूर्ण है ।

उपनिषदों में योग का विकास क्रम - 

उपनिषदो का शब्दिक अर्थ उप शद के रूप में किया जा सकता है उप का अर्थ समीप (ब्रहम अथवा परमात्मा के समीप) जबकि शद का अर्थ है निश्चित ज्ञान से आता है अर्थात परमात्मा के समीप बैठकर निश्चित ज्ञान की प्राप्ति की उपनिषद है।

उपनिषद साहित्य पर वेदों की विचारधारा का पूर्ण से प्रभाव परिलक्षित होता है तथा उपनिषद को वैदिक ज्ञान काण्ड की संज्ञा भी दी जाती है इन्हे ही वेदान्त भी कहा जाता है।


योग विद्या का उपनिषद साहित्य में भिन्न-भिन्न स्थानों पर वर्णन प्राप्त होता है उपनिषद में कुछ उपनिषद तो योग विषय पर ही करते है जबकि कुछ उपनिषद के स्थान के विषय मे समझाया गया है। योग के संदर्भ में उपनिषद में इस प्रकार वर्णन आता है।

योगशिखोउपनिषद में योग को परिभाषित करते हुए कहा गया है -  योगपान प्राणियोंर्ऐक्यं स्थरजो रेतसोस्तथा। सूर्य चन्द्रमसों योर्ं गादृृ जीवात्म परमात्मनो।। एंव तु इन्द्र जलास्य संयोगों योग उच्यतें।। 

अथार्त प्राण वायु का अपान वायु में मिलन स्वरज रूपी कुण्डलिनी शक्ति का रेत रूपी आत्मतत्व से मिलन, सूर्य स्वर का चन्द्रस्वर से मिलन तथा जीवात्मा का परमात्मा से मिलन होता है ।

अमृतनादोपनिषद में योग के अंगो पर प्रकाश डालते हुए कहा गया - प्रत्याहारस्तथा ध्यानं प्राणायार्मोश्थ धारणा तर्कश्चैव समाधिश्च शडंगोयोग उच्यते। 

त्रिषिखबाह्मणोंपनिषद में कहा गया है  ध्यानस्य विस्मृति: सम्यक् समाधिरभिधीयते।। 

 अर्थात ध्यान का पूर्ण रूपेण विस्मरण अर्थात ध्यान में पूर्ण रूप से डूब जाना ही समाधि की अवस्था है।  

“वेताष्वतर उपनिषद में कहा गया है -  न तस्य रोगो न जरा न मृत्यु,  प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् 

अर्थात वह शरीर जो योग की अग्नि में तप जाता है उसें कोई रोग नही होता,बुढापा नही आता तथा वह शरीर को मृत्यु को भी प्राप्त नही होता हैं इस प्रकार उपनिषद साहित्य में योग के स्वरूप को अलग-अलग ढग से समझाया गया है इस सदर्भ में अमृतादोपनिषद में योग के छह: अंगों का उल्लेख किया गया तो त्रिशिखबाह्मणोंपनिषद में यम और नियम की संख्या दस-दस बतलाई परन्तु इस सभी योग का मूल उदृदेष्य आत्मतत्व को शुद्व कर परमात्मा के साथ इसका संयोग करना ही रहा है।

 


स्मृतियों मे योग का विकास क्रम

स्मृतियों का वैदिक साहित्य के अपना विशिष्ट स्थान है मनु द्वारा रचित याजवल्लभ स्मृति का महत्च वर्तमान समय में भी है इन सभी स्मृतियों में योग के स्वरूप को इस प्रकार स्पष्ट किया गया -

 

सुक्ष्मतां चान्ववेक्षेत योगेन परमात्मन:। 

 देहेषु च समुत्पन्तिमुन्तष्वधमेषु च।। 


अर्थात योगाभ्यास से परमात्मा की सुक्ष्मता को जाना जाता है। मनुस्मृति में प्राणायाम द्वारा इन्द्रियों की शुद्वि का निर्देश भी इस प्रकार किया गया दहयन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मला:। तथेन्द्रियाणां दहायन्ते दोषा: प्राणास्य निग्रहातृ अर्थात जिस प्रकार अग्नि में तपाने से धातुओं के मल नष्ट हो जाते है उसी प्रकार प्राणायाम रूपी अग्नि में तपाने से इन्द्रियों के दोष समाप्त हो जाते है। अर्थात यहा पर प्राणायाम की महत्व को दर्शाया गया ह।ै याजवल्वन्य स्मृति में ‘‘संयागों योग इत्यक्तो जीवोत्मनो’’ कहकर जीवात्मा का परमात्मा से संयोग को योग कहा गया है।

दर्शनों मे योग का विकास क्रम -

वैदिक दशर्नो में छ: दशर्नो का वर्णन आता है इन छ: दशर्नो में योगदर्शन, साख्यदर्शन, न्याय दर्शन, वैशेषिक दर्शन, मीमांसा दर्शन, एवं वेदान्त दर्शन आता है इन शड दर्शनों को आस्तिक दर्शनों की सज्ञां दी जाती है इनके अतिरिक्त बौद्ध दर्शन, जैन दर्शन एंव चार्वाक दर्शन इन तीनो दर्शनो को नास्तिक दर्शन के अन्तर्गत रखा गया है इन सभी दर्शनों में योग को अलग-अलग रूपो में प्रस्तुत किया गया है इन सभी दर्शनों में पतंजलि कृत योग दर्शन में योग के स्वरूप की स्पष्ट एंव सुन्दर व्याख्ंया की गयी है। यह दर्शन समाधिपाद, साधनपाद विभूति पाद तथा कैवल्य पाद के नाम से चार अध्यायों में विभक्त है इन अध्यायों में क्रमश: 51, 55, 55, 34, =195 सूत्र हैं।इस दर्शन में प्रष्नोंत्तरात्मक शैली में योग के स्वरूप की व्यांख्या की गयी है यहॉ पर योग को परिभाषित करते हुए कहा गया है।

योगष्चित्त वृत्ति निरोध: पा0 योग सू0 1/2 


अर्थात चित्त वृत्तियॉ का निरोध ही योग है

चित्त वृत्तियों का निरोध के साधन के साथ-साथ अष्टांग योग का वर्णन करते हूए योग दर्शन में कहा गया है- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि ये योग के आठ अंग है।

सॉख्य दर्शन में मुनिवर कपिल ने 25 तत्वों की संख्या की गणना की। तथा इन तत्वों का ज्ञान कर परमात्मा को प्राप्त करने का उपदेश दिया।इन दर्शन में कार्य कारण सिद्वान्त तथा सत्कार्यवाद को भी समझाया गया है। न्याय दर्शन में गौतम ऋषि द्वारा किसी भी वस्तु अथवा का सही ज्ञान प्राप्त कर उसके ज्ञान का उपदेश दिया गया है। वैशेषिक दर्शन में कणाद मुनि द्वारा प्रकृति का विवेचन कर परमात्म को प्राप्त करने का उपदेश दिया गया है  


जैन दर्शन में वर्धमान महावीर ने सम्यक दर्शन सम्यक ज्ञान एंव सम्यक चरित्र के रूप में आत्म विकास का उपदेश दिया गया जबकि बौद्व दर्शन में महात्मा बुद्व द्वारा अष्टांग योंग के समान साधना के आठमागोर्ं का वर्णन किया गया इन मार्गो में सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक, सम्यक कर्म, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति एवं सम्यक समाधि का वर्णन किया गया है। इस प्रकार दर्शन काल में योग की अलग-अलग रूपों में प्रकाशित किया गया। 

हठ प्रदीपिका एवं घेरण्ड सेहिता में योग -

हठप्रदीपिका एंव घेरण्ड संहिता में योग के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा गया- प्रणम्य श्रीगुरू नाथ स्वात्मारामेण योगिना। केवलं राजयोगाय हठविद्योपदिष्यतें।। अर्थात श्रीनाथ गुरू कों प्रणाम करके योगी स्वात्माराम केवल राजयोग की प्राप्ति की प्राप्ति के लिए हठविद्या का उपदेश करते है। घेरण्ड संहिता में हठयोग के सप्त साधनों पर प्रकाश डालते हुए कहा गया-

 

 शोधनं ढृढता चैवं स्थैर्य धैर्य च लाद्यवम्। 

 प्रत्यक्षं च निर्लिप्तं च घटस्य सप्तसाधनम्। 


अर्थात शोधन, धैर्य, लाघव, प्रत्यक्ष, और निलिप्ता ये सात शरीर शुद्वि के साधन है जिन्हें सामान्यत: सप्तसाधन की संज्ञा दी जाती है इन सप्तसाधनों के लाभों पर प्रकाश डालते हुए घेरण्ड ऋर्षि कहते है-

 शट्कर्मणा शोधंन च आसनेन भवेद्ढृढम्। 

 मुद्रेया स्थिरता चैव प्रत्याहारेण धीरता। 

 प्राणायामाल्लाघवं च ध्यानात्प्रत्यक्षमात्मन:। 

 समाधिना निर्लिप्तं च मुक्तिरेव न संशय:।। 


अर्थात शट्रकर्मो से शरीर का शोधन आसनों से ढृढता, मुद्वाओं से स्थिरता प्रत्याहार से धैर्य, प्राणायाम से हल्कापन, ध्यान से आत्म साक्षात्कार एव समाधि से निर्लिप्तता के भाव उत्पन्न होते है इन साधनों का अभ्यास करने वाले साधन की मुक्ति में कोई संशय नही रहता है। इस प्रकार घेरण्ड संहिता एंव हठयोग प्रदीपिका में योग के स्वरूप को हठयोग के रूप में वर्णित किया गया।

गीता मे योग का विकास क्रम -

गीता अर्जुन को समझाते हुए में योग के सदंर्भ मे भगवान श्रीकृष्ण कहते है -

योगस्थ कुरूकर्मार्णि संगत्यक्यक्त्वा धनरजय ।  

सिदयसिद्वयोसमो भूत्वा समत्ंव योग उच्चते।। (गीता 2/48) 


अर्थात अर्जुन तुम कर्म फलों की आसक्ति को त्यागकर, सिद्धि और असिद्धि जय और पराजय, मान और अपमान में समभाव रखते हुए कार्य कर क्योकि यह समत्वं की भावना ही योग है।
पुन:भगवान श्रीकृष्ण कर्मयोग पर प्रकाश डालते हुए कहते है-

बुद्वियुक्तो जहातीह उमे सुकृत दृष्कृते। 

तस्माधोगाय युजस्व योग: कर्मसुु कोशलम्।। 


 अर्थात हे अर्जुन बुद्विमान पुरूष अच्छे एंव बुरे दोनो ही कर्मो को इसी लोक में त्याग देते है तथा आसक्तिरहित होकर कर्म करते है क्योकि कर्मो में कुशलता ही योग है। यद्यपि गीता को कर्मयोग का सर्वोतम शास्त्र माना गया है किन्तु कर्मयोग के साथ-साथ इस ग्रन्थ में भक्तियोग, ज्ञानयोग, सन्यासयोग, मंत्रयोग एवं ध्यानयोग आदि योग के अन्यमार्गो का उल्लेख भी प्राप्त होता है।

आधुनिक युग में योग का विकास क्रम -

आधुनिक युग के योगी महर्षि योग को सांसारिक जीवन एंव आध्यात्मिक जीवन के मध्य सामंजस्य स्थापित करने का साधन मानते है आधुनिक युग में योग को एक नई दिशा देने वाले स्वामी रामदेव योग को स्वास्थ मानसिक जोडते हुए शारीरिक मानसिक एंव आध्यात्मिक स्वास्थ प्राप्त करने का साधन होता है। शिक्षा के क्षेत्र में बच्चों पर बढ़ते तनाव को योगाभ्यास से कम किया जा रहा है। योगाभ्यास से बच्चों को शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी मजबूत बनाया जा रहा है। स्कूल व महाविद्यालयों में शारीरिक शिक्षा विषय में योग पढ़ाया जा रहा है। वहीं योग-ध्यान के अभ्यास द्वारा विद्यार्थियों में बढ़ते मानसिक तनाव को कम किया जा रहा है। साथ ही साथ इस अभ्यास से विद्यार्थियों की एकाग्रता व स्मृति शक्ति पर भी विशेष सकारात्मक प्रभाव देखे जा रहे हैं। आज कम्प्यूटर, मनोविज्ञान, प्रबन्धन विज्ञान के छात्र भी योग द्वारा तनाव पर नियन्त्रण करते हुए देखे जा सकते हैं।  

शिक्षा के क्षेत्र में योग के बढ़ते प्रचलन का अन्य कारण इसका नैतिक जीवन पर सकारात्मक प्रभाव है आजकल बच्चों में गिरते नैतिक मूल्यों को पुन: स्थापित करने के लिए योग का सहारा लिया जा रहा है। योग के अन्तर्गत आने वाले यम में दूसरों के साथ हमारे व्यवहार व कर्तव्य को सिखाया जाता है, वहीं नियम के अन्तर्गत बच्चों को स्वयं के अन्दर अनुशासन स्थापित करना सिखाया जा रहा है। विश्वभर के विद्वानों ने इस बात को माना है कि योग के अभ्यास से शारीरिक व मानसिक ही नहीं बल्कि नैतिक विकास होता है। इसी कारण आज सरकारी व गैरसरकारी स्तर पर स्कूलों में योग विषय को अनिवार्य कर दिया गया है।

 

 

 

C 102 मानव शरीर शरीर रचना विज्ञान ( Human Body Anatomy )

 

शरीर रचना विज्ञान (Anatomy)

मानव शरीर एक मानव जीव की संपूर्ण संरचना है, जिसमें एक सिर, गर्दन, धड़, दो हाथ और दो पैर होते हैं। किसी मानव के वयस्क होने तक उसका शरीर लगभग 50 ट्रिलियन कोशिकाओं, जो कि जीवन की आधारभूत इकाई हैं, से मिल कर बना होता है। इन कोशिकाओं के जीववैज्ञानिक संगठन से अंतत: पूरे शरीर की रचना होती है।

 

शरीररचना विज्ञान (Anatomy) अनैटोमि शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है किसी भी जीवित (चल या अचल) वस्तु को काटकर, उसके अंग प्रत्यंग की रचना का अध्ययन करना। अचल में वनस्पतिजगत्‌तथा चल में प्राणीजगत्‌का समावेश होता है। जब किसी प्राणी या वनस्पति विशेष की शरीररचना का अध्ययन किया जाता है, तब उसे विशेष शरीररचना (Special Anatomy) अध्ययन कहते हैं। जब एक प्राणी, या वनस्पति, के शरीर की रचना का दूसरे प्राणी या वनस्पति के शरीर की रचना से तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है, तब उसे तुलनात्मक शरीररचना (Comparative Anatomy) कहते हैं। जब किसी प्राणी के अंग की रचना का अध्ययन किया जाता है, तब उसे आंगिक शरीररचना (Regional Anatomy) कहते हैं।

व्यावहारिक या लौकिक दृष्टि से मानव शरीररचना का अध्ययन अत्यंत ही महत्वपूर्ण है। एक चिकित्सक को शरीररचना का अध्ययन कई दृष्टि से करना होता है, जैसे रूप, स्थिति, आकार एवं अन्य रचनाओं से संबंध।

आकारिकीय शरीररचना विज्ञान (Morphological Anatomy) की दृष्टि से मानवशरीर के भीतर अंगों की उत्पत्ति के कारणों का ज्ञान, अन्वेषण का विषय बन गया है। इस ज्ञान की वृद्धि के लिए भ्रूणविज्ञान (Embryology), जीवविकास विज्ञान, जातिविकास विज्ञान एवं ऊतक विज्ञान (Histo-anatomy) का अध्ययन आवश्यक है।

मानव शरीर

 

मानव शरीर

मानव शरीर एक मानव जीव की संपूर्ण संरचना है, जिसमें एक सिरगर्दनधड़, दो हाथ और दो पैर होते हैं। किसी मानव के वयस्क होने तक उसका शरीर लगभग 50 ट्रिलियन कोशिकाओं, जो कि जीवन की आधारभूत इकाई हैं, से मिल कर बना होता है। इन कोशिकाओं के जीववैज्ञानिक संगठन से अंतत: पूरे शरीर की रचना होती है।

 

शरीर के अंग

अकलदाढ (Wisdom Teeth)

अग्रबाहु (Forearm)

अंगूठा (Thumb)

अँगूठा (Great Toe)

अंड/वृषण (Testicle)

अण्डकोश, बैज़ा, मुषक (Scrotum)

अनैच्छिक पेशी (Involuntary Muscles)

अलबुमिन (Albumin)

अवटू, गलग्रन्थि (Thyroid)

अशू (Tear Glands)

अस्थि/हड्डी (Bone)

अस्थिमज्जा (Bone Marrow)

आँख/नेत्र (Eye)

आँत (Intestine)

उँगली (Finger)

उदर/पेट (Abdomen)

उपास्थि, चबनी हड्डी (Cartilage)

उरोस्थि (Sternum)

एड़ी (Heel)

एपेंडिक्स (Appendix)

ऐच्छिक पेशी (Voluntary Muscles)

ऑवल (Placenta)

ऑवल/नाल (Afterbirth)

कंकाल, ठठरी (Skeleton)

कटी (Pelvis)

कंठकणी नली (Eustacean Tube)

कणर गूथ (Ear Wax)

कणर पटल (Ear Drum)

कणर लौर (Ear Lobe)

कंधा (Shoulder)

कनपटी (Temple)

कनीनिका, (Cornea)

कमर (Waist)

कलाई (Wrist)

कलोम (Pancreas)

कशेरुका (Vertebra)

कान (Ear)

कुदांत, छोटी आँत (Small Intestine)

कृपिका, वायुकोश (Alveoli)

कृमि, कीड़े (Worms)

कृषणा (Iris)

केशवाहिका (Capillary)

कोकला (Cochlea)

कोशिका (Cells)

कोहनी (Elbow)

खून/रक्त/रुधिर/लहू (Blood)

खोपड़ी (Skull)

खोपड़ी की खाल (Scalp)

गटा (Ankle Bone)

ग्रन्थि (Gland)

गर्दन (Neck)

गर्भाशय ग्रीवा (Uterine Cervix)

गर्भाशय बचादानी (Uterus)

गला (Throat)

ग्रसनी (Food Pipe)

गाल (Cheeks)

गुदा (Anus)

गुदार/वृक (Kidney)

घुटना (Knee)

चमड़ी/त्वचा (Skin)

चुचुक (Nipple)

कूल्हे (Buttocks)

चेहरा (Face)

छाती (Chest)

जघन (Pubic)

जंघान-वंकण (Groin)

जबड़ा (Jaw)

जबड़ा (Mandibles)

जोंक (Leech)

जाँघ (Thigh)

जाँघ की हड्डी (Femur)

यकृत/जिगर (Liver)

जीभ (Tongue)

जीवाणु/किटाणु (Bacteria)

जीवविष (Toxin)

जूँ (Louse)

जोड़ (Joints)

झिल्ली (Membrane)

टखना (Ankle)

टाँग (Leg)

टानसल (Tonsil)

टेटुआ (Trachea)

डिंब (Ovum)

डिंब ग्रन्थि (Ovary)

डिंब वाहिनी (Fallopian Tube)

तर्जनी (Index Finger)

तंत्रिका (Nerves)

तरंग (Sound Wave)

तारा लाल (Lens)

ताल (Lens)

तिल्ली (Spleen)

दाढ़ (Molars)

हदय/दिल (Heart)

दृष्टि तंत्रिका (Optical Nerve)

दृषी पटल, अंतपटल (Retina)

दॉत (Teeth)

धमनी, रकवाहिनी (Artery)

धमिनका, रोहिणिका (Arteriole)

नथून (Nostril)

नस शिरा (Tendon)

नाक (Nose)

नाखून (Nails)

नाग (Cobra)

नाभि (Navel)

नाल (Umbilical Cord)

निलय (Ventricle)

नेत शेषमला (Conjunctiva)

नेतगुहा (Orbit)

पकाशय (Duodenum)

पलक, पपोटा (Eyelid)

पसली (Ribs)

पसव (Childbirth)

पाँव का अंगुठा / खूर (Toes)

पिडुली (Calf)

पित (Bile)

पिताशय (Gall Bladder)

पीठ (Back)

पुतली (Pupil)

पूरसथ ग्रन्थि (Prostate)

आमाशय/पेट/जठर (Stomach)

पेशी (Muscles)

पाँव (Foot)

फेफड़े/फुफ्फुस (Lungs)

बगल/काँख (Axilla)

बड़ी आँत (Large Intestine)

बडी आँत/वृहदांत्र (Colon)

बरे (Wasp)

बाल केश (Hair)

बालक बचा (Child)

बाँह की हड्डी (Humerus)

बाँह, भुजा, बाजू (Arm)

भग-शिश/भगशेफ (Clitoris)

भगोष (Labia Majora)

भूण (Embryo)

भौह (Brow)

मख्खी (Fly)

मध्य कणर (Middle Ear)

मलाशय, गुदा (Rectum)

महाधमनी (Aorta)

महाशिरा (Vena Cava)

माथा/ललाट (Forehead)

माहवारी (Menses)

मस्तिष्क/दिमाग, भेजा (Brain)

मुगदर (Malleus)

मुट्ठी (Fists)

मुँह (Mouth)

मूत्रनलिका (Urethra)

मूत्रवाहिनी (Ureter)

मूत्राशय (Urinary Bladder)

वसा/मेदा (Fat)

मेरुरज्जु, मेरुदण्ड (Spinal Cord)

योनि (Vagina)

यौन संबंध (Copulation)

रककोशिका (Blood Cell)

रक्तवाही (Plasma)

रकाब (Stapes)

रदनक (Canines)

रीढ (Vertebral Column)

लघुमस्तिष्क (Cerebellum)

लार (Saliva)

लाल रक्त कोशिका (Red Blood Cell)

लसिका (Lymph)

विषाणु (Virus)

वीर्य/शुक्र (Semen)

श्रवण नलिका (Auditory Meatus)

शषकुली (Pinna)

श्वासनली (Bronchi)

शिरा (Vein)

शिरोबिंदु (Crown)

शिश्न की अगली त्वचा (Glans Penis)

शिश्न/लिग (Penis)

शिशु (Infant)

शिशु (Neonate)

शुकला श्वेत पटल (Sclera)

शुक्राणु (Sperm)

श्वेत रक्त कोशिका (White Blood Cell)

स्तन/चिचुक, थन (Breast)

सतरी (Fascia)

स्पंदन/नाडी/नाडी स्पंदन (Pulse)

समयपूर्व (Premature)

स्वर (Notes)

स्वर यंत्र (Larynx)

निकाय/प्रणाली (System)

साइनस (Sinus)

सिर (Head)

सुजाक (Granules)

सूजन (Swelling)

हथेली, चंगुल (Palms)

हंसली (Clavicle)

हाथ (Hands)

हिचकी (Hiccough)

हैजा (Cholera)

होठ/ओष्ठ (Lips)

 

स्वस्थ मानव शरीर की रचना का अध्ययन निम्न भागों में किया जाता है :


  1. चिकित्साशास्त्रीय शरीररचना विज्ञान,
  2. शल्यचिकित्सा शरीररचना विज्ञान (Surgical Anatomy),
  3. स्त्री शरीर विशेष रचना विज्ञान,
  4. धरातलीय शरीररचना विज्ञान (surface Anatomy),
  5. सूक्ष्मदर्शीय शरीररचना विज्ञान (Microscopic Anatomy) तथा
  6. भ्रूण शरीररचना विज्ञान (Embryology)। श्विकृत अंगों की रचना के ज्ञान को विकृत शरीररचनाविज्ञान (Pathological Anatomy) कहते हैं।

    मानव की विभिन्न प्रजातियों की शरीररचना का जब तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है, तब मानवविज्ञान (Anthropology) का सहारा लिया जाता है। आजकल शरीररचना का अध्ययन सर्वांगी (systemic) विधि से किया जाता है।

    शरीररचना विज्ञान को पढ़ने के लिए एक विशेष प्रकार की शब्दावली तथा इन शब्दों की परिभाषाओं को विशेष रूप से पढ़ना होता है।

    ईसा से 1,000 वर्ष पूर्व महर्षि सुश्रुत ने शवच्छेद कर शरीररचना का पर्याप्त वर्णन किया था। धीरे धीरे यह ज्ञान अरब और यूनान होता हुआ यूरोप में पहुँचा और वहाँ पर इसका बहुत विस्तार एवं उन्नति हुई। शव की संरक्षा के साधन, सूक्ष्मदर्शी, ऐक्सरे आदि के उपलब्ध होने पर शरीररचना विज्ञान का अध्ययन अधिक सूक्ष्म एवं विस्तृत हो गया है। शरीर का निर्माण करनेवाले जीवित एकक को कोशिका कहते हैं। यह सूक्ष्मदर्शी से देखी जा सकती है। कोशिका एक स्वच्छ लसलसे रस से, जिसे जीवद्रव्य कहते हैं, भरी रहती है। कोशिका को चारों ओर से घेरनेवाली कला को कोशिका भित्ति कहते हैं। कोशिका के केंद्र में न्यूक्लियस रहता है, जो कोशिका पर नियंत्रण करता है। कोशिका के जीवित होने का लक्षण यही है कि उसमें अभिक्रिया, शक्ति, एकीकरण शक्ति, वृद्धि, विसर्जन शक्ति तथा उत्पादन शक्ति, उपस्थित रहे। शरीर का स्वास्थ्य कोशिकाओं के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। कार्यनुसार कोशिकाएँ अपना आकार इत्यादि परिवर्तित कर, भिन्न भिन्न वर्गों में विभाजित होती हैं, जैसे तंत्रिका कोशिका, अस्थि कोशिका, पेशी कोशिका आदि। एक प्रकार की आकृति एवं कार्य करनेवाली कोशिकाएँ मिलकर, एक विशेष प्रकार के ऊतक का निर्माण करती हैं।

ऊतक


ऊतक (Tissues) मुख्यत: पाँच प्रकार के होते हैं : (1) उपकला, (2) संयोजी ऊतक, (3) स्केलेरस ऊतक, (4) पेशी ऊतक तथा (5) तंत्रिका ऊतक।

(1) उपकला (Epitheliai tissue)- यह ऊतक शरीर को बाहर से ढँकता है तथा समस्त खोखले अंगों को भीतर से भी ढँकता है। रुधिरवाहिनियों के भीतर ऐसा ही ऊतक, जिसे अंत:स्तर (Endothelium) कहते हैं, रहता है। उपकला के भेद ये हैं : (क) साधारण, (ख) स्तंभाकार, (ग) रोमश, (घ) स्तरित, (च) परिवर्तनशील तथा (छ) रंजककणकित।

(2) संयोजी ऊतक (Connective tissue)- यह ऊतक एक अंग को दूसरे अंग से जोड़ने का काम करता है। यह प्रत्येक अंग में पाया जाता है। इसके अंतर्गत (क) रुधिर ऊतक, (ख) अस्थि ऊतक, (ग) लस ऊतक तथा (घ) वसा ऊतक आते हैं। (क) रुधिर ऊतक के, लाल रुधिरकणिका तथा श्वेत रुधिरकणिका, दो भाग होते हैं। लाल रुधिरकणिका ऑक्सीजन का आदान प्रदान करती है तथा श्वेत रुधिरकणिका रोगों से शरीर की रक्षा करती है। मानव की लाल रुधिरकोशिका में न्यूक्लियस नहीं रहता है। (ख) अस्थि ऊतक का निर्माण अस्थिकोशिका से, जो चूना एवं फ़ॉस्फ़ोरस से पूरित रहती है, होता है। इसकी गणना हम स्केलेरस ऊतक में करेंगे, (ग) लस ऊतक लसकोशिकाओं से निर्मित है। इसी से लसपर्व तथा टॉन्सिल आदि निर्मित हैं। यह ऊतक शरीर का रक्षक है। आघात तथा उपसर्ग के तुरंत बाद लसपर्व शोथयुक्त हो जाते हैं। (घ) वसा ऊतक दो प्रकार के होते हैं : (अ) एरिओलर तथा (आ) एडिपोस।

इनके अतिरिक्त (1) पीत इलैस्टिक ऊतक, (2) म्युकाइड ऊतक, (3) रंजक कणकित संयोजी ऊतक, (4) न्युराग्लिया आदि भी संयोजी ऊतक के कार्य, आकार, स्थान के अनुसार भेद हैं।

(3) स्केलेरस ऊतक- यह संयोजी तंतु के समान होता है तथा शरीर का ढाँचा बनाता है। इसके अंतर्गत अस्थि तथा कार्टिलेज आते हैं। कार्टिलेज भी तीन प्रकार के होते हैं : (अ) हाइलाइन, (आ) फाइब्रो-कार्टिलेज तथा (इ) इलैस्टिक फाइब्रो-कार्टिलेज या पीत कार्टिलेज।

(4) पेशी ऊतक- इसमें लाल पेशी तंतु रहते हैं, जो संकुचित होने की शक्ति रखते हैं। (अ) रेखांकित या ऐच्छिक पेशी ऊतक वह है जो शरीर को नाना प्रकार की गतियां कराता है, (आ) अनैच्छिक या अरेखांकित पेशी ऊतक वह है जो आशयों की दीवार बनाता है तथा (इ) हृत्‌पेशी ऊतक रेखांकित तो है, परंतु ऐच्छिक नहीं है।

(5) तंत्रिका ऊतक- इसमें संवेदनाग्रहण, चालन आदि के गुण होते हैं। इसमें तंत्रिका कोशिका तथा न्यूराग्लिया रहता है। मस्तिष्क के धूसर भाग में ये कोशिकाएँ रहती हैं तथा श्वेत भाग में न्यूराग्लिया रहता है। कोशिकाओं से ऐक्सोन तथा डेंड्रॉन नाक प्रर्वध निकलते हैं। नाना प्रकार के ऊतक मिलकर शरीर के विभिन्न अंगों (organs) का निर्माण करते हैं। एक प्रकार के कार्य करनेवाले विभिन्न अंग मिलकर एक तंत्र (system) का निर्माण करते हैं।

तंत्र

शरीर का निर्माण निम्नलिखित तंत्रों द्वारा होता है : (1) अस्थि तंत्र, (2) संधि तंत्र, (3) पेशी तंत्र, (4) रुधिर परिवहन तंत्र, (5) आशय तंत्र : (क) श्वसन तंत्र, (ख) पाचन तंत्र, (ग) मूल एवं जनन तंत्र, (6) तंत्रिका तंत्र तथा (7) ज्ञानेंद्रिय तंत्र।
(1) अस्थि तंत्र- मानव अस्थिपंजर के ज्ञान जैसे अस्थि की उत्पत्ति, वृद्धि, अस्थिप्रसु कोशिका, अस्थि भंजक कोशिका आदि, के संबंध में काफी उन्नति हुई है। अस्थियों द्वारा मानव एवं पशु की भिन्नता का ज्ञान होता है तथा लिंग एवं वय का निश्चय किया जा सकता है। अस्थियों एवं कार्टिलेज के द्वारा शरीर के ढाँचे का निर्माण होता है। अस्थियाँ आकार एवं कार्य के अनुसार चार प्रकार की होती हैं : (क) दीर्घ, (ख) ्ह्रस्व, (ग) सपाट तथा (घ) अऋजु। अस्थि के निम्न कार्य होते हैं : (अ) शरीर को आकार प्रदान करता, (आ) शरीर को सहारा एवं दृढ़ता प्रदान करना, (इ) शरीर की रक्षा करना, (ई) कार्य के लिए लीवर तथा संधियाँ प्रदान करना और (उ) पेशियों को संलग्न तथा शरीर को गति प्रदान करना। अस्थि कोशिकाओं से निर्मित ऊतक से अस्थियाँ बनती हैं। अस्थियों द्वारा रुधिरकणों का निर्माण भी होता है। हमारे शरीर में कुल मिलाकर 206 अस्थियाँ होती हैं, जो इस प्रकार हैं : खोपड़ी में 22 अस्थियाँ, रीढ़ में 26 अस्थियाँ - 33 कशेरुक, इनमें से क्रम 5 कशेरुक से मिलकर तथा काकिसक्स 4 कशेरुक से मिलकर बनता है। यदि इन्हें 1-1 माना जाए, तो कुल अस्थियाँ 26 ही होंगी, वक्ष तथा पर्शुकाओं, में 25 अस्थियाँ, (ऊर्ध्व शाखा) बाहु आदि में 64, अध: शाखा (जाँघ आदि) में 62 अस्थियाँ, हालोइड अस्थि 1 तथा श्रोत अस्थिका 6। लंबी नलिकाकार अस्थियों में मज्जा होती है, जो रुधिर कण बनाती है। ऐक्सकिरण से देखने पर अस्थियाँ अपारदर्शक होती हैं।
(2) संधि तंत्र- दो या अधिक अस्थियों के जोड़ को संधि कहते हैं। इसमें स्नायु (ligaments) सहायक होते हैं। संधियाँ कई प्रकार की होती हैं। गीत के अनुसार इनके भेद निम्नलिखित हैं : 

(क) चल संधियाँ, जैसे स्कंध संधि (Shoulder joint)। चल संधियों के प्रभेदों में हैं (अ) फिसलनेवाली संधियाँ, जैसे रीढ़ की संधियाँ, (आ) खूँटीदार संधियाँ, जैसे प्रथम, द्वितीय कशेरुक तथा पश्च कपालास्थि संधि, (इ) कब्जेनुमा संधि, जैसे कूर्पर संधि तथा (ई) गेंद गड्ढा संधि, जैसे वंक्षण संधि।

(ख) अचल संधियाँ, जैसे करोटि और काल संधि (cranial suture)। 

(ग) अल्प गतिशील संधियाँ-भगास्थि संधि।

आकृति के अनुसार संधियों का वर्गीकरण निम्नलिखित है : (क) तांतव संधि (fibrous joint), (ख) उपास्थि संधि (cartilaginous joint) तथा (ग) स्नेहक संधि (synovial joints)। 

(क) तांतव संधि-  इसके उदाहरण कपाल संधियाँ, दाँत के उलूखल तथा जंघिकांतर संधि (tibiofibular joint)। 

(ख) उपस्थि संधि- यह दो प्रकार की होती है। इसमें अल्पगति होती है, जैसे भगास्थि संधि।

(ग) स्नेहक संधि- इसके अंतर्गत प्राय: शरीर की समस्त संधियाँ आती हैं। इस प्रकार की संधियाँ विभिन्न गतियों के अनुसार अनेक वर्गों में विभाजित की जा सकती हैं।

संधियों के ऊपर से पेशियाँ गुजरती हैं तथा उन्हें गति प्रदान करती हैं। संधियों की अपनी रुधिर वाहिकाएँ होती हैं। संधियों का विलगना चोट लगने से होता है। इसे संधिभ्रंश कहते हैं। संधियों की स्नायु पर आघात होने को मोच कहते हैं।

(3) पेशी तंत्र- पेशियों का निर्माण कई पेशी तंतुओं के मिलने से होता है। ये पेशीतंतु पेशीऊतक से बनते हैं। पेशियाँ रचना एवं कार्य के अनुसार तीन प्रकार की होती हैं : (क) रेखित (striated) या ऐच्छिक, (ख) अरेखित या अनैच्छिक तथा (ग) हृदयपेशी (cardiac)। ऐच्छिक पेशियाँ, अस्थियों पर संलग्न होती हैं तथा संधियों पर गति प्रदान करती है। पेशियाँ नाना प्रकार की होती हैं तथा कंडरा (tendon) या वितान (aponeurosis) बनाती हैं। तंत्रिका तंत्र के द्वारा ये कार्य के लिए प्रेरित की जाती हैं। पेशियों का पोषण रुधिरवाहिकाओं के द्वारा होता है। शरीर में प्राय: 500 पेशियाँ होती हैं। ये शरीर को सुंदर, सुडौल, कार्यशील बनाती हैं। इनका गुण संकुचन एवं प्रसार करना है। कार्यों के अनुसार इनके नामकरण किए गए हैं। शरीर के विभिन्न कार्य पेशियों द्वारा होते हैं। कुछ पेशी समूह एक दूसरे के विरुद्ध भी कार्य करते हैं जैसे एक पेशी समूह हाथ को ऊपर उठाता है, तो दूसरा पेशी समूह हाथ को नीचे करता है, अर्थात्‌एक समूह संकुचित होता है, तो दूसरा विस्तृत होता है।

पेशियाँ सदैव स्फूर्तिमय (toned) रहती हैं। मृत व्यक्ति में पेशी रस के जमने से पेशियाँ कड़ी हो जाती हैं। मांसवर्धक पदार्थ खाने से, उचित व्यायाम से, ये शक्तिशाली होती हैं। कार्यरत होने पर इनमें थकावट आती है तथा आराम एवं पोषण से पुन: सामान्य हो जाती हैं।

(4) रुधिर परिसंचरण तंत्र- इस तंत्र में हृदय, इसके दो अलिंद, दो निलय, उनका कार्य, फुप्फुस में रुधिर शोधन तथा प्रत्येक अंगों को शुद्ध रुधिर ले जानेवाली धमनियाँ एवं हृदय में अशुद्ध रुधिर को वापस लानेवाली शिराएँ रहती हैं।

रुधिर परिसंचरण तीन चक्रों में विभक्त किया जा सकता है : (1) फुप्फुसीय, (2) संस्थानिक तथा (3) पोर्टल। फुप्फुस एवं वृक्क में जानेवाली धमनियाँ अशुद्ध रुधिर ले जाती हैं तथा वहाँ से शुद्ध किया हुआ रुधिर वापस शिराओं से हृदय को वापस आता है। शरीर में धमनियों का जाल होता है तथा उनकी शाखाएँ एवं प्रशाखाएँ एक दूसरे से मिल जाती हैं, जिससे एक के कटने पर दूसरों से अंग को रुधिर पहुँचाया जाता है। मस्तिष्क की तथा हृदय की धमनियाँ अंत धमनियाँ कहलाती हैं, क्योंकि इनकी शाखाएँ आपस में संगम नहीं करतीं।

गर्भ के रुधिर परिवहन तथा गर्भावस्था के पश्चात्‌के रुधिर परिवहन में अंतर होता है। गर्भ में रुधिर का शोधन फुप्फुस द्वारा नहीं होता। इसी तंत्र में लस वाहिनियों का वर्णन भी किया जाता है। लसपर्व शरीर के रक्षक होते हैं। शोथ, उपसर्ग तथा आघात होने पर ये फूल जाते हैं।

रुधिर में प्लाज़्मा, लाल रुधिर कोशिकाएँ, श्वेत रुधिर कोशिकाएँ आदि रहती हैं। मानव के एक घन मिमि. रुधिर में 50,00,000 लाल रुधिर कोशिकाएँ तथा 6,000 से 9,000 तक श्वेत रुधिर कोशिकाएँ रहती हैं। शरीर में रुधिर नहीं जमता, पर शरीर से बाहर निकलते ही रुधिर जमने लगता है। (देखें रुधिर)। 

ऊर्ध्व एवं अध: महाशिराएँ समस्त शरीर के रुधिर को हृदय के दक्षिण में अलिंद में लाती हैं, जहाँ से रुधिर दक्षिणी निलय में जाता है। निलय से रुधिर हृदय के स्पंदन के कारण फुप्फुसीय धमनी द्वारा फुप्फुस में शोधन के लिए जाता है तथा शुद्ध होने के बाद वह फुप्फुसीय शिराओं द्वारा बाएँ अलिंद में आता है। बाएँ अलिंद के संकुचन के कारण रुधिर बाएँ निलय में जाता है, जहाँ से महाधमनी एवं उसकी शाखाओं द्वारा समस्त शरीर में जाता है। शिराओं में अशुद्ध रुधिर और धमनियों में शुद्ध रुधिर रहता है, पर फुप्फुसीय धमनी एवं वृक्क धमनी इसका अपवाद है। हृदय का स्पंदन एक मिनट में 72 बार होता है। हृदय हृदयावरण से आवृत रहता है। अलिंद तथा निलय के मध्य कपाट रहते हैं, जो रुधिर को विपरीत दिशा में जाने से रोकते हैं (देखें हृदय)। 

(5) आशय तंत्र- इसके अंतर्गत निम्नलिखित आशय आते हैं : 

(क) श्वसन तंत्र- इस तंत्र में श्वासोच्छ्‌वास क्रिया में काम करनेवाले समस्त अंगों की रचना का वर्णन आता है। इसमें नासा, कंठ, स्वरयंत्र, श्वासनली, श्वसनिका फुप्फुस, फुप्फुसावरण तथा उन पेशियों का, जो श्वासोच्छ्‌वास क्रिया कराती हैं, वर्णन मिलता है। इस तंत्र द्वारा रुधिर का शोधन होता है। मनुष्य एक मिनट में 16-20 बार श्वास लेता है (देखे श्वसनतंत्र)। 

(ख) पाचन तंत्र- इस तंत्र में वे सब अंग सम्मिलित हैं, जो भोजन के पाचन, अवशोषण, चयोपचय से संबंधित हैं, जैसे ओष्ठ, दाँत, जिह्वा, कंठ, अन्ननलिका, आमाशय, पक्वाशय, लघु, आंत्र, बृहत्‌, आंत्र, मलाशय, यकृत अग्न्याशय (pancreas) तथा लालाग्रंथियाँ। अन्न नलिका 10 इंच लंबी होती है तथा विशेषत: वक्ष गुहा में रहती है। आंत्र की लंबाई 20 फुट होती है। पक्वाशय अंग्रेजी के सी (C) के आकार का, अग्न्याशय के चारों ओर, 10 इंच लंबा होता है। यकृत (देखें यकृत) उदर गुहा में ऊपरी तथा दाहिनी ओर रहता है। इसका भार श्किलोग्राम है तथा यह खंडों में विभाजित रहता है। इसके पास में पित्ताशय होता है। यकृत में पित्त का निर्माण होता है। उदर गुहा के ये सब अंग पेरिटोयिम कला से आवृत रहते हैं। इस कला के दो भाग होते हैं : एक वह जो गुहाभित्ति पर लगा रहता है, दूसरा आशयों पर संलग्न रहता है। यह कला फुप्फुसावरण तथा मस्तिष्कावरण के समान ही है। पेरिटोनियम कला की गुहा, इसके दो स्तरों के मध्य में होती है, जिसमें जल का पतला स्तर होता है, परंतु स्त्रियों में डिंबवाहिनी गुहा, गर्भाशय गुहा तथा योनि-गुहा द्वारा यह बाह्य वातावरण में खुलती है। इस पेरिटोनियम कला की परतों के द्वारा आशय उदर गुहा में लटके रहते हैं।

(ग) मूत्र तथा जनन तंत्र- इन तंत्रों का वर्णन निम्नलिखित है : 

(1) मूलतंत्र- मूत्राशय, मूत्रनली, प्रॉस्टेटग्रंथि तथा इनकी रुधिर वाहिनियाँ आदि इस तंत्र के अंतर्गत हैं। वृक्क के दो गोले कटि कशेरुक के दोनों ओर रहते हैं। ये रुधिर से मूत्र को पृथक्‌करते हैं। यह मूत्र, गविनियों द्वारा मूत्रालय में एकत्रित होता है तथा वहाँ से मानव के इच्छानुसार से बाहर निकलता है। गवनियों की लंबाई 10 इंच होती है। मूत्राशय भगास्थि के पीछे श्रोणि गुहा में रहता है तथा मूत्र के मात्रानुसार आकार में फैलता जाता है। पुरुषों में मूत्र नली की लंबाई 7 इंच तथा स्त्रियों में मूत्र नली की लंबाई 1 इंच होती हैं (देखें मूलतंत्र)। 

(2) जनन तंत्र- पुरुषों एवं स्त्रिय में जनन तंत्र के भिन्न भिन्न अंग है। पुरुष के अंडकोष में दो अंड ग्रंथियाँ रहती हैं। यहाँ पर शुक्राणु का निर्माण होता है। ये शुक्राणु शुक्रवाहिनियों द्वारा श्रोणिगुहा स्थित शुक्राशयों में ले जाए जाते हैं। वहाँ शुक्राशय द्रव इनमें मिल जाता है। दोनों शुक्राशय मूत्रनली के पुरस्थ भाग में खुलते हैं। मैथुन द्वारा पुरुष अपने शुक्र का त्याग मूत्रनली द्वारा करता है। स्त्रियों में भगास्थि तथा मूत्राशय के पीछे स्थित ऊर्ध्व, लंबा गर्भाशय स्थित है। श्रोणि गुहा में दोनों ओर बादाम के समान दो ग्रंथियाँ रहती हैं, जिन्हें डिंब ग्रंथियाँ कहते हैं। इनमें ग्राफियन पुटिका (Graafian follicle) से डिंब का निर्माण होता है। डिंब प्रति मास डिंब वाहिनियों द्वारा ग्रहण किया जाता है और वहाँ शुक्राणु द्वारा प्रफलित होने पर गर्भाशय में अवस्थित होकर, वृद्धि प्राप्त करता है, अथवा प्रति मास गर्भाशय अंतकंला के टूटकर निकलने से होनेवाले मासिक रुधिरस्राव के साथ, यह अप्रफलित डिंब बाहर फेंक दिया जाता है। (देखं जननतंत्र)। 

(6) तंत्रिका तंत्र- इसको दो वर्गों में विभाजित कर सकते हैं : (अ) केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तथा (आ) स्वतंत्र तंत्रिका तंत्र। 

(अ) केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को मस्तिष्क मेरु तंत्रिका तंत्र भी कहते हैं। इसके अंतर्गत अग्र मस्तिष्क, मध्यमस्तिष्क, पश्च मस्तिष्क, अनुमस्तिष्क, पौंस, चेतक, मेरुशीर्ष, मेरु एवं मस्तिष्कीय तंत्रिकाओं के 12 जोड़े तथा मेरु तंत्रिकाओं के 31 जोड़े होते हैं (देखें तंत्रिकातंत्र और मस्तिष्क)। 

मस्तिष्क करोटि गुहा में रहता है तथा तीन कलाओं से, जिन्हें तानिकाएँ कहते हैं (देखें तंत्रिकाएँ), आवृत रहता है। भीतरी दो कलाओं के मध्य में एक तरल रहता है, जो मेरुद्रव कहलाता है। यह तरल मस्तिष्क के भीतर पाई जानेवाली गुहाओं में तथा मेरु की नालिका में भी रहता है। मेरु कशेरुक नलिका में स्थित रहता है तथा मस्तिष्कावरणों से आवृत रहता है। यह तरल इन अंगों को पोषण देता है, इनकी रक्षा करता है तथा मलों का विसर्जन करता है।

मस्तिष्क में बाहर की ओर धूसर भाग तथा अंदर की ओर श्वेत भाग रहता है तथा ठीक इससे उल्टा मेरु में रहता है। मस्तिष्क का धूसर भाग सीताओं के द्वारा कई सिलवटों से युक्त रहता है। इस धूसर भाग में ही तंत्रिका कोशिकाएँ रहती हैं तथा श्वेत भाग संयोजक ऊतक का होता है। तंत्रिकाएँ दो प्रकार की होती हैं : (1) प्रेरक (Motor) तथा (2) संवेदी (Sensory)। 

मस्तिष्क के बारह तंत्रिका जोड़ों के नाम निम्नलिखित हैं (देखें तंत्रिका) : (1) ्घ्रााण तंत्रिका, (2) दृष्टि तंत्रिका, (3) अक्षिप्रेरक तंत्रिका, (4) चक्रक (Trochlear) तंत्रिका, (5) त्रिक तंत्रिका, (6) उद्विवर्तनी तंत्रिका (Abducens), (7) आनन तंत्रिका, (8) श्रवण तंत्रिका, (9) जिह्वा कंठिका तंत्रिका, (10) वेगस तंत्रिका (Vagus), (11) मेरु सहायिका तंत्रिका तथा (12) अधोजिह्वक (Hypoglossal) तंत्रिका। मस्तिष्क एवं मेरु के धूसर भाग में ही संज्ञा केंद्र एवं नियंत्रण केंद्र रहते हैं। मेरु में संवेदी (पश्च) तथा चेष्टावह (अग्र) तंत्रिका मूल रहते हैं।

अग्र मस्तिष्क दो गोलार्धों में विभाजित रहता है तथा इसके भीतर दो गुहाएँ रहती हैं जिन्हें पार्श्वीय निलय कहते हैं। संवेदी तंत्रिकाएँ शरीर की समस्त संवेदनाओं को मस्तिष्क में पहुँचाकर अनुभूति देती हैं तथा चेष्टावह तंत्रिकाएँ वहाँ से आज्ञा लेकर अंगों से कार्य कराती हैं। केंद्रीय तंत्रिकाएँ विशेष कार्यों के लिए होती हैं। इन सब तंत्रिकाओं के अध: तथा ऊर्ध्व केंद्र रहते हैं। जब कुछ क्रियाएँ अध: केंद्र कर देते हैं तथा पश्च ऊर्ध्व केंद्रों को ज्ञान प्राप्त होता है, तब ऐसी क्रियाओं को प्रतिवर्ती क्रियाएँ (Reflex action) कहते हैं। ये कियाएँ मेरु से निकलनेवाली तंत्रिकाओं तथा मेरु केंद्रों से होती हैं। मस्तिष्क का भार 40 औंस होता है। मस्तिष्क की घमनियाँ अंत: घमनियाँ होती हैं, अत: इनमें अवरोध होने पर, या इनके फट जाने पर संबंधित भाग को पोषण मिलना बंद हो जाता है, जिसके कारण वह केंद्र कार्य नहीं करता, अत: उस केंद्र से नियंत्रित क्रियाएँ अवरुद्ध हो जाती हैं। इसे ही पक्षाघात (Paralysis) कहते हैं (देखें पक्षघात)। 

(आ) स्वतंत्र तंत्रिका तंत्र- यह स्वेच्छा से कार्य करता हैं। इसमें एक दूसरे के विरुद्ध कार्य करनेवाली अनुकंपी (sympathetic) तथा सहानुकंपी (parasympathetic), दो प्रकार की तंत्रिकाएँ रहती हैं। शरीर के अनेक कार्य, जैसे रुधिरपरिसंचरण पर नियंत्रण, हृदयगति पर नियंत्रण आदि स्वतंत्र तंत्रिका से होते हैं। अनुकंपी शृंखला करोटि गुहा से श्रोणि गुहा तक कशेरुक दंड के दोनों ओर रहती है तथा इसमें कई गुच्छिकाएँ (ganglions) रहती हैं।

(7) ज्ञानेंद्रिय तंत्र- इनका वर्णन निम्नलिखित है : 

(क) घ्राणेंद्रिय- इसका अंग नासा है। इसके द्वारा गंध का ज्ञान होता है। नासा छत से घ्राण तंत्रिका गंध के ज्ञान को मस्तिष्क में ले जाती है।

(ख) स्वादेंद्रिय- जिह्वा पर के स्वादांकुर इसका अंग होते हैं, जो विभिन्न प्रकार के स्वादों को भिन्न भिन्न स्थानों से ग्रहण करते हैं।

(ग) दृष्टींद्रिय- इसका मुख्य अंग नेत्र है। नेत्र गोलक फोटो कैमरा के समान है। यह श्वेत पटल, मध्य पटल, तथा अंत पटल (रेटिना) से निर्मित है। इसमें रेटिना ही दृष्टींद्रिय का काम करता है। नेत्रगोलक छिद्र, या तारा (pupil), से प्रकाश भीतर जाता है। तारा पर आइरिस (iris) रहता है, जो तारे का संकोच और प्रसार कराता है। यह प्रकाश अग्र कक्ष के तरल, लेंस तथा पश्च कक्ष के तरल से होकर रेटिना पर पड़ता है, जहाँ से दृष्टि नाड़ियाँ इस ज्ञान को अग्र मस्तिष्क की अनुकपाल पालि (occipital lobe) को ले जाती हैं। रेटिना तंत्रिका तंत्र का ही भाग है। सबसे बाहर नेत्र में कॉर्निया (cornea) तथा उसपर एक कला रहती है। नेत्र के पास ही अक्षिगुहा में अश्रुग्रंथि एवं अश्रुथैली रहती है। नेत्र के पास ही अक्षिगुहा में अश्रुग्रंथि एवं अश्रुथैली रहती हैं। अश्रु अश्रुथैली में इकट्ठा रहता है (देखें नेत्र)। 

(घ) श्रवणेंद्रिय - इसका अंग कर्ण है। कर्ण तीन विभागों में विभक्त है : बाह्य, मध्य एवं अंत। बाह्यकर्ण के आंतरिक छोर पर स्थित श्रवण पटल पर शब्द के कंपन, ध्वनि लहरियों के रूप में होते हैं, जिन्हें मध्य कर्ण की तीन अस्थियाँ, मैलियस (Malleus), इंकस (Incus) तथा स्टेपीज (Stapes) ग्रहण करती हैं तथा अंतकर्ण के कर्णावर्त (cochlea) की ओर भेजती हैं। कर्णांवर्त में तरल रहता है तथा श्रवण तंत्रिकाओं द्वारा ध्वनि का ग्रहण कर अग्र मस्तिष्क की शंखपालि (temporal lobe) में श्रवण का कार्य होता है। कर्ण शंखास्थि में स्थित है। अंतकर्ण में स्थित अर्धवृत्ताकार नलिकाएँ संतुलन का काम करती हैं (देखें कान)। 

(घ) स्पर्शोंद्रिय- इसके अंतर्गत त्वचा आती है। त्वचा से ही गरमी ठंढक, मृदुता, कठोरता, पीड़ा, स्पर्श आदि का ज्ञान होता है। त्वचा के दो भाग होते हैं : (1) बाह्य त्वचा तथा (2) अंतस्त्वचा। तलुए और हथेली में त्वचा की मोटाई मुख की त्वचा की मोटाई से 10 गुनी होती है। त्वचा शरीर को बाहर से आवृत्त कर रक्षा एवं मलविसर्जन भी करती है। त्वचा में एक स्तर रंजक कणों का भी होता है। त्वचा में रोमकूप तथा स्वेद ग्रंथियाँ भी होती हैं। त्वचा ताप का नियंत्रण भी करती है। इसी तरह त्वचा में अवशोषण का कार्य भी होता है। त्वचा में नख शय्या भी होती है (देखें त्वचा)। 

भ्रूण विज्ञान


इसके अंतर्गत शुक्राणु, डिंब उनका निर्माण, सम्मिलन, गर्भाशय में स्थिति, पोषण, जरायु, अपरा का निर्माण, भ्रूण की साप्ताहिक एवं मासिक वृद्धि, भ्रूण के भिन्न भिन्न अंगों प्रत्यंगों, संस्थानों का निर्माण तथा यमल के निर्माण का संपूर्ण विषय आता है। आजकल इस संबंध में ज्ञान की अभिवृद्धि बहुत हो गई है, अत: यह अब एक भिन्न शास्त्र ही माना जाने लगा है। इसके अध्ययन के अंतर्गत आनुवंशिकी, प्रायोगिक भ्रूण विज्ञान तथा रासायनिक भ्रूण विज्ञान भी आता है। जन्मजात विकृतियों का अध्ययन भी इसके अंतर्गत आता है। शरीर के मुख्य अंग हैं : शिर, ग्रीवा, वक्ष, उदर, हाथ और पैर होते हैं। शरीर की गुहाएँ हैं : (अ) शिरो गुहा, (आ) वक्षगुहा तथा (इ) उदर गुहा। वक्षगुहा और उदरगुहा महाप्राचीरा पेशी द्वारा विलग की जाती हैं। उदर गुहा में वास्तविक उदरगुहा तथा श्रोणि गुहा दोनों का समावेश होता है।

वाहिनीहीन ग्रंथियाँ


इनके अंतर्गत पीयूष ग्रंथि, थाइरॉइड (thyroid), पैराथाइरॉइड, थायमस, अधिवृक्क, पैंक्रिअस (pancreas), अंड ग्रंथि, अथवा डिंब ग्रंथि, तथा पीनिअल (penial) ग्रंथि आती हैं। पीयूष ग्रंथि इन सबकी निदेशक और संचालक है। यह शिरोगुहा में अपने खात में मस्तिष्क के अध रहती है। इसके कई स्राव हैं, जो भिन्न भिन्न कार्य करते हैं। थाइरॉइड, पैराथाइरॉइड ग्रीवा में सामने की ओर स्थित हैं। थायमस हृदय के सामने युवावस्था तक रहती है। अधिवृक्क ग्रंथि वृक्क के ऊपर रहती है। पैंक्रिअस में स्थित लेंगरहैम के द्वीप वस्तुत: अंत:स्रावी ग्रंथियाँ हैं। यह ग्रहणी (duodenum) के घेरे में उदर गुहा के पश्चभाग में रहते हैं। पुरुष में अंड ग्रंथि अंडकोष में तथा स्त्रियों में डिंब ग्रंथि श्रोणि गुहा में रहती है। पीनियल ग्रंथि मस्तिष्क में रहती है।

धरातलीय शरीररचना विज्ञान


शरीर शास्त्र की यह महत्वपूर्ण शाखा है और शल्य चिकित्सा तथा रोग निदान में अत्यंत सहायक होती है। इसी से ज्ञात होता है कि दाहिनी दसवी पर्शुका के कार्टिलेज के नीचे पित्ताशय रहता है, या हृदय का शीर्ष (apex) 5वीं अंतरपर्शुका से सटा, शरीर की मध्य रेखा से 9 सेमी. बाईं ओर होता है, अथवा भगास्थि, ट्यूबरकल से 1 सेमी. ऊपर होती है तथा 1 सेमी. पार्श्व में बाह्य उदरी मुद्रिका छिद्र रहता है। शरीर में स्थित जहाँ बिंदु त्वचा पर पहचाने जा सकते हैं, वहाँ से त्वचा के अंत: स्थित अंगों को त्वचा पर खींचकर,, उस स्थान पर काटने पर वही अंग हमें मिलना चाहिए।

इसी प्रकार इस शास्त्र को अध्ययन करने की एक और विधि है जिसमें एक्सरे से सहायता लेते हैं। इसे रेडियोलीजिकल अनैटोमी कहते हैं। अस्थियों के अतिरिक्त अब धमनियों, वृक्क, मूत्राशय आदि अनेक अंगों की रचना तथा स्थिति का अध्ययन इससे करते हैं। इससे अंगों की वास्तविक रचना तथा विकृत रचना दोनों का ज्ञान प्राप्त होता है। (लक्ष्मी शंकर विश्वनाथ गुरु तथा अत्रो तिवारी) 

 

 

 

 

सी 103- ह्यूमन बॉडी फिजियोलॉजी( Human Body Physiology)

 

शरीर क्रिया विज्ञान

शरीरक्रियाविज्ञान या कार्यिकी (Physiology/फ़िज़ियॉलोजी) के अंतर्गत प्राणियों से संबंधित प्राकृतिक घटनाओं का अध्ययन और उनका वर्गीकरण किया जाता है, साथ ही घटनाओं का अनुक्रम और सापेक्षिक महत्व के साथ प्रत्येक कार्य के उपयुक्त अंगनिर्धारण और उन अवस्थाओं का अध्ययन किया जाता है जिनसे प्रत्येक क्रिया निर्धारित होती है। शरीरक्रियाविज्ञान चिकित्सा विज्ञान की वह शाखा है जिसमें शरीर में सम्पन्न होने वाली क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। इसके अन्तर्गत मनुष्य या किसी अन्य प्राणी/पादप के शरीर में मौजूद भिन्न-भिन्न अंगों एवं तन्त्रों (Systems) के कार्यों और उन कार्यों के होने के कारणों के साथ-साथ उनसे सम्बन्धित चिकित्सा विज्ञान के नियमों का भी ज्ञान दिया जाता है। उदाहरण के लिए कान सुनने का कार्य करते है और आंखें देखने का कार्य करती हैं लेकिन शरीर-क्रिया विज्ञान सुनने और देखने के सम्बन्ध में यह ज्ञान कराती है कि ध्वनि कान के पर्दे पर किस प्रकार पहुँचती है और प्रकाश की किरणें आंखों के लेंसों पर पड़ते हुए किस प्रकार वस्तु की छवि मस्तिष्क तक पहुँचती है। इसी प्रकार, मनुष्य जो भोजन करता है, उसका पाचन किस प्रकार होता है, पाचन के अन्त में उसका आंतों की भित्तियों से अवशोषण किस प्रकार होता है, आदि। .

 

 

शरीरक्रियाविज्ञान या कार्यिकी (Physiology/फ़िज़ियॉलोजी) के अंतर्गत प्राणियों से संबंधित प्राकृतिक घटनाओं का अध्ययन और उनका वर्गीकरण किया जाता है, साथ ही घटनाओं का अनुक्रम और सापेक्षिक महत्व के साथ प्रत्येक कार्य के उपयुक्त अंगनिर्धारण और उन अवस्थाओं का अध्ययन किया जाता है जिनसे प्रत्येक क्रिया निर्धारित होती है।


शरीरक्रियाविज्ञान चिकित्सा विज्ञान की वह शाखा है जिसमें शरीर में सम्पन्न होने वाली क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। इसके अन्तर्गत मनुष्य या किसी अन्य प्राणी/पादप के शरीर में मौजूद भिन्न-भिन्न अंगों एवं तन्त्रों (Systems) के कार्यों और उन कार्यों के होने के कारणों के साथ-साथ उनसे सम्बन्धित चिकित्सा विज्ञान के नियमों का भी ज्ञान दिया जाता है। उदाहरण के लिए कान सुनने का कार्य करते है और आंखें देखने का कार्य करती हैं लेकिन शरीर-क्रिया विज्ञान सुनने और देखने के सम्बन्ध में यह ज्ञान कराती है कि ध्वनि कान के पर्दे पर किस प्रकार पहुँचती है और प्रकाश की किरणें आंखों के लेंसों पर पड़ते हुए किस प्रकार वस्तु की छवि मस्तिष्क तक पहुँचती है। इसी प्रकार, मनुष्य जो भोजन करता है, उसका पाचन किस प्रकार होता है, पाचन के अन्त में उसका आंतों की भित्तियों से अवशोषण किस प्रकार होता है, आदि।

शरीर क्रिया विज्ञान अथवा कार्यिकी जो अंग्रेज़ी में फ़िज़ियॉलोजी (Physiology) कहलाता है, शरीरक्रियाविज्ञान के अंतर्गत जीवित प्राणियों से संबंधित प्राकृतिक घटनाओं का अध्ययन और उनका वर्गीकरण किया जाता है, 

मूल प्राकृतिक घटनाएँ

सभी जीवित जीवों के जीवन की मूल प्राकृतिक घटनाएँ एक सी है। अत्यंत असमान जीवों में क्रियाविज्ञान अपनी समस्याएँ अत्यंत स्पष्ट रूप में उपस्थित करता है। उच्चस्तरीय प्राणियों में शरीर के प्रधान अंगों की क्रियाएँ अत्यंत विशिष्ट होती है, जिससे क्रियाओं के सूक्ष्म विवरण पर ध्यान देने से उन्हें समझना संभव होता है।1) निम्नलिखित मूल प्राकृतिक घटनाएँ हैं, जिनसे जीव पहचाने जाते हैं:

(क) संगठन - यह उच्चस्तरीय प्राणियों में अधिक स्पष्ट है। संरचना और क्रिया के विकास में समांतरता होती है, जिससे शरीरक्रियाविदों का यह कथन सिद्ध होता है कि संरचना ही क्रिया का निर्धारक उपादान है। व्यक्ति के विभिन्न भागों में सूक्ष्म सहयोग होता है, जिससे प्राणी की आसपास के वातावरण के अनुकूल बनने की शक्ति बढ़ती है।

(ख) ऊर्जा की खपत - जीव ऊर्जा को विसर्जित करते हैं। मनुष्य का जीवन उन शारीरिक क्रियाकलापों (movements) से, जो उसे पर्यावरण के साथ संबंधित करते हैं निर्मित हैं। इन शारीरिक क्रियाकलापों के लिए ऊर्जा का सतत व्यय आवश्यक है। भोजन अथवा ऑक्सीजन के अभाव में शरीर के क्रियाकलापों का अंत हो जाता है। शरीर में अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होने पर उसकी पूर्ति भोजन एवं ऑक्सीजन की अधिक मात्रा से होती है। अत: जीवन के लिए श्वसन एवं स्वांगीकरण क्रियाएँ आवश्यक हैं। जिन वस्तुओं से हमारे खाद्य पदार्थ बनते हैं, वे ऑक्सीकरण में सक्षम होती हैं। इस ऑक्सीकरण की क्रिया से ऊष्मा उत्पन्न होती है। शरीर में होनेवाली ऑक्सीकरण की क्रिया से ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो जीवित प्राणी की क्रियाशीलता के लिए उपलब्ध रहती है।


(ग) वृद्धि और जनन - यदि उपचयी (anabolic) प्रक्रम प्रधान है, तो वृद्धि होती है, जिसके साथ क्षतिपूर्ति की शक्ति जुड़ी हुई है। वृद्धि का प्रक्रम एक निश्चित समय तक चलता है, जिसके बाद प्रत्येक जीव विभक्त होता है और उसका एक अंश अलग होकर एक या अनेक नए व्यक्तियों का निर्माण करता है। इनमें प्रत्येक उन सभी गुणों से युक्त होता है जो मूल जीव में होते हैं। सभी उच्च कोटि के जीवों में मूल जीव क्षयशील होने लगता है और अंतत: मृत्यु को प्राप्त होता है।


(घ) अनुकूलन (Adaptation) - सभी जीवित जीवों में एक सामान्य लक्षण होता है, वह है अनुकूलन का सामथ्र्य। आंतर संबंध तथा बाह्य संबंधों के सतत समन्वय का नाम अनुकूलन है। जीवित कोशिकाओं का वास्तविक वातावरण वह ऊतक तरल (tissue fluid) है, जिसमें वे रहती हैं। यह आंतर वातावरण, प्राणी के सामान्य वातावरण में होनेवाले परिवर्तनों से प्रभावित होता है। जीव की उत्तरजीविता (survival) के लिए वातावरण के परिवर्तनों को प्रभावहीन करना आवश्यक है, जिससे सामान्य वातावरण चाहे जैसा हो, आंतर वातावरण जीने योग्य सीमाओं में रहे। यही अनुकूलन है।

 

शरीरक्रियाविज्ञान या कार्यिकी (Physiology/फ़िज़ियॉलोजी) के अंतर्गत प्राणियों से संबंधित प्राकृतिक घटनाओं का अध्ययन और उनका वर्गीकरण किया जाता है, साथ ही घटनाओं का अनुक्रम और सापेक्षिक महत्व के साथ प्रत्येक कार्य के उपयुक्त अंगनिर्धारण और उन अवस्थाओं का अध्ययन किया जाता है जिनसे प्रत्येक क्रिया निर्धारित होती है।

शरीरक्रियाविज्ञान चिकित्सा विज्ञान की वह शाखा है जिसमें शरीर में सम्पन्न होने वाली क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। इसके अन्तर्गत मनुष्य या किसी अन्य प्राणी/पादप के शरीर में मौजूद भिन्न-भिन्न अंगों एवं तन्त्रों (Systems) के कार्यों और उन कार्यों के होने के कारणों के साथ-साथ उनसे सम्बन्धित चिकित्सा विज्ञान के नियमों का भी ज्ञान दिया जाता है। उदाहरण के लिए कान सुनने का कार्य करते है और आंखें देखने का कार्य करती हैं लेकिन शरीर-क्रिया विज्ञान सुनने और देखने के सम्बन्ध में यह ज्ञान कराती है कि ध्वनि कान के पर्दे पर किस प्रकार पहुँचती है और प्रकाश की किरणें आंखों के लेंसों पर पड़ते हुए किस प्रकार वस्तु की छवि मस्तिष्क तक पहुँचती है। इसी प्रकार, मनुष्य जो भोजन करता है, उसका पाचन किस प्रकार होता है, पाचन के अन्त में उसका आंतों की भित्तियों से अवशोषण किस प्रकार होता है, आदि।

 

 

मूल प्राकृतिक घटनाएँ

सभी जीवित जीवों के जीवन की मूल प्राकृतिक घटनाएँ एक सी है। अत्यंत असमान जीवों में क्रियाविज्ञान अपनी समस्याएँ अत्यंत स्पष्ट रूप में उपस्थित करता है। उच्चस्तरीय प्राणियों में शरीर के प्रधान अंगों की क्रियाएँ अत्यंत विशिष्ट होती है, जिससे क्रियाओं के सूक्ष्म विवरण पर ध्यान देने से उन्हें समझना संभव होता है।1) निम्नलिखित मूल प्राकृतिक घटनाएँ हैं, जिनसे जीव पहचाने जाते हैं:

(क) संगठन - यह उच्चस्तरीय प्राणियों में अधिक स्पष्ट है। संरचना और क्रिया के विकास में समांतरता होती है, जिससे शरीरक्रियाविदों का यह कथन सिद्ध होता है कि संरचना ही क्रिया का निर्धारक उपादान है। व्यक्ति के विभिन्न भागों में सूक्ष्म सहयोग होता है, जिससे प्राणी की आसपास के वातावरण के अनुकूल बनने की शक्ति बढ़ती है।

(ख) ऊर्जा की खपत - जीव ऊर्जा को विसर्जित करते हैं। मनुष्य का जीवन उन शारीरिक क्रियाकलापों (movements) से, जो उसे पर्यावरण के साथ संबंधित करते हैं निर्मित हैं। इन शारीरिक क्रियाकलापों के लिए ऊर्जा का सतत व्यय आवश्यक है। भोजन अथवा ऑक्सीजन के अभाव में शरीर के क्रियाकलापों का अंत हो जाता है। शरीर में अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होने पर उसकी पूर्ति भोजन एवं ऑक्सीजन की अधिक मात्रा से होती है। अत: जीवन के लिए श्वसन एवं स्वांगीकरण क्रियाएँ आवश्यक हैं। जिन वस्तुओं से हमारे खाद्य पदार्थ बनते हैं, वे ऑक्सीकरण में सक्षम होती हैं। इस ऑक्सीकरण की क्रिया से ऊष्मा उत्पन्न होती है। शरीर में होनेवाली ऑक्सीकरण की क्रिया से ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो जीवित प्राणी की क्रियाशीलता के लिए उपलब्ध रहती है।

(ग) वृद्धि और जनन - यदि उपचयी (anabolic) प्रक्रम प्रधान है, तो वृद्धि होती है, जिसके साथ क्षतिपूर्ति की शक्ति जुड़ी हुई है। वृद्धि का प्रक्रम एक निश्चित समय तक चलता है, जिसके बाद प्रत्येक जीव विभक्त होता है और उसका एक अंश अलग होकर एक या अनेक नए व्यक्तियों का निर्माण करता है। इनमें प्रत्येक उन सभी गुणों से युक्त होता है जो मूल जीव में होते हैं। सभी उच्च कोटि के जीवों में मूल जीव क्षयशील होने लगता है और अंतत: मृत्यु को प्राप्त होता है।

(घ) अनुकूलन (Adaptation) - सभी जीवित जीवों में एक सामान्य लक्षण होता है, वह है अनुकूलन का सामथ्र्य। आंतर संबंध तथा बाह्य संबंधों के सतत समन्वय का नाम अनुकूलन है। जीवित कोशिकाओं का वास्तविक वातावरण वह ऊतक तरल (tissue fluid) है, जिसमें वे रहती हैं। यह आंतर वातावरण, प्राणी के सामान्य वातावरण में होनेवाले परिवर्तनों से प्रभावित होता है। जीव की उत्तरजीविता (survival) के लिए वातावरण के परिवर्तनों को प्रभावहीन करना आवश्यक है, जिससे सामान्य वातावरण चाहे जैसा हो, आंतर वातावरण जीने योग्य सीमाओं में रहे। यही अनुकूलन है।

 

शरीरक्रियाविज्ञान की विधि

फ़िज़ियॉलोजी का अधिकांश ज्ञान दैनिक जीवन और रोगियों के अध्ययन से उपलब्ध हुआ है, परंतु कुछ ज्ञान प्राणियों पर किए गए प्रयोगों से भी उपलब्ध हुआ है। रसायनभौतिकीशरीररचना विज्ञान (anatomy) और ऊतकविज्ञान से इसका अत्यंत निकट का संबंध है।

इस प्रकार विश्लेषिक फ़िज़ियॉलोजी, जीवित प्राणियों पर, अथवा उनसे पृथक्कृत भागों पर, जो अनुकूल अवस्था में कुछ समय जीवित रह जाते हैं, किए गए प्रयोगों से प्राप्त ज्ञान से निर्मित है। प्रयोगों से विभिन्न संरचनात्मक भागों के गुण और क्रियाएँ ज्ञात होती हैं। संश्लेषिक फ़िज़ियॉलोजी में हम यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि किस प्रकार संघटनशील प्रक्रमों से शरीर की क्रियाएँ संश्लेषित होकर, विभिन्न भागों की सहकारी प्रक्रियाओं का निर्माण करती हैं और किस प्रकार जीव समष्टि रूप में अपने भिन्न भिन्न अंगों को सम्यक् रूप से समंजित करके, बाह्य परिस्थिति के परिवर्तन पर प्रतिक्रिया करता है।

प्रतिमान (Normal) - संरचना और शरीरक्रियात्मक गुणों में एक ही जाति के प्राणी आपस में बहुत मिलते जुलते हैं और जैव लक्षणों के मानक प्ररूप की ओर उन्मुख यह प्रवृत्ति जीव और उसके वातवरण के बीच सन्निकट सामंजस्य की अभिव्यक्ति है। एक ही जनक से, एक ही समय में, उत्पन्न प्राणियों में यह समानता सर्वाधिक होती है। ज्यों ज्यों हम अन्य जातियों के प्राणियों की समानताओं के संबंध में विचार करते हैं, उनमें भेद बढ़ता जाता है और प्राणियों के वर्गीकरण में जंतुजगत् के छोरों पर स्थित प्राणियों का अंतर इतना अधिक होता है कि उनकी तुलना अस्पष्ट होती है।

फिर भी, व्यष्टि प्राणियों में जहाँ बहुत निकट का संबंध होता है, जैसे मनुष्य जाति में, वहीं इनमें अंतर भी स्पष्ट होता है। सामान्य मानव व्यष्टि का अध्ययन करना, मानव फ़िज़ियॉलोजी का कर्तव्य है, क्योंकि इससे रोग के अध्ययन की महत्वपूर्ण आधारभूमि तैयार होती है, परंतु यह कहना कि किसी प्रस्तुत लक्षण (character) का प्राकृतिक स्वरूप क्या है, कठिन है। इसके अतिरिक्त सभी शरीरक्रियात्मक प्रयोगों के परिणामों में पर्याप्त स्पष्ट अंतर प्रदर्शित होता है, जो प्रयोज्य प्राणियों की व्यत्तिगत प्रकृति पर निर्भर करता है। इसीलिए महत्वपूर्ण समुचित नियंत्रणों का और महत्वपूर्ण परिणाम का अधिमूल्यन नहीं होना चाहिए। प्राय: परिणाम के निश्चय के लिए आदर्श परिणामों का विचार किया जाता है। प्रयोगों की पुनरावृत्तियाँ आवश्यक हैं। प्रेक्षण की त्रुटि, जो यथार्थ विज्ञानों में प्राय: अल्प होती है, जैविकी में बहुत अधिक होती है, क्योंकि परिवर्ती व्यष्टि के कारण प्रेक्षण में परिवर्तनशीलता आ जाती है। जिस प्रकार अन्य विज्ञानों में परिणामों को सांख्यिकी द्वारा विवेचित किया जाता है, वैसे ही फ़िज़ियॉलोजी को परिणामों की संभाविता के नियम की प्रयुक्ति से विवेचित किया जाता है। सीमित संख्या में किए प्रयोगों से निर्णय लेने में बहुत सावधानी इस दृष्टि से अपेक्षित है कि प्राप्त परिणाम नियंत्रित श्रेणियों से भिन्न हैं अथवा नहीं।

कठिनाइयों को दूर करने की एक विधि के रूप में औसतों, अर्थात् समांतर माध्य (arithmetic mean), का आश्रय लिया जाता है, जैसे हम कहते हैं, मानव के किसी समुदाय विशेष में प्रति घन मिलिमीटर रक्त में लाल सेलों की औसत संख्या 5 करोड़ 20 लाख है। यह विधि यद्यपि सबसे तरल और अति व्यवहृत है, परंतु यह इसलिए असंतोषजनक है कि इससे यह ज्ञात नहीं होता कि माध्य से विचलन किस परिमाण में और आपेक्षिक रूप से कितने अधिक बार (relatively frequent) होता है। हमारे पास यह ज्ञात करने का कोई साधन नहीं रह जाता कि उपर्युक्त उदाहरण में 4 करोड़ 50 लाख सामान्य परास के अंदर है या नहीं। परिणामत:, सांख्यिकी के परिणामों की अभिव्यक्ति के लिए अधिक यथार्थ साधन के उपयोग का व्यवहार बढ़ता जा रहा है।

शरीरक्रियाविज्ञान का विकास

विसेलियस द्वारा निर्मित शरीरक्रिया सम्बन्धी चार्ट

चूँकि किसी विज्ञान की वर्तमान अवस्था को समझने के लिए उसके विकास का इतिहास ज्ञात होना आवश्यक है, इसलिए फिज़ियॉलोजी से रुचि रखनेवाले व्यक्ति के लिए उसके इतिहास की रूपरेखा से परिचित होना आवश्यक है। जहाँ तक समग्र विषय के विकास का प्रश्न है, यह ध्यान रखने की बात है कि विज्ञान का कोई अंग अलग से विकसित नहीं हो सकता, सभी भाग एक दूसरे पर निर्भर करते हैं। उदाहरणार्थ, एक निश्चित सीमा तक शारीर (Anatomy) के ज्ञान के बिना फ़िज़ियॉलोजी की कल्पना असंभव थी और इसी प्रकार भौतिकी और रसायन की एक सीमा तक विकसित अवस्था के बिना भी इसकी प्रगति असंभव थी।

आँद्रेस विसेलियस (Andreas Veasilius) द्वारा 1543 ई. में 'फ़ेब्रिका ह्यूमनी कार्पोरीज़' (Fabrica Humani Corpories) के प्रकाशन को आधुनिक शारीर का सूत्रपात मानकर, नीचे हम उन महत्वपूर्ण नामों की सूची प्रस्तुत कर रहे हैं जिन्होंने समय समय पर विषय को युगांतरकारी मोड़ दिया है :

नाम

जीवनकाल

वर्ष

महत्व

विसेलियस

1514-64 ई.

1543 ई.

आधुनिक शारीर का प्रारंभ

हार्वि

1578-1667 ई.

1628 ई.

जीवविज्ञान में प्रायोगिक विधि

मालपीगि

1628-1694 ई.

1661 ई.

जीवविज्ञान में सूक्ष्मदर्शी के प्रयोग का आरंभ

न्यूटन

1642-1727 ई.

1687 ई.

आधुनिक भौतिकी का विकास

हालर

1708-1777 ई.

1760 ई.

फ़िज़ियॉलोजी का पाठ्यग्रंथ

लाव्वाज़्ये

1743-1794 ई.

1775 ई.

दहन और श्वसन का संबंध स्थापित हुआ

मूलर जोहैनीज़

1801-1858 ई.

1834 ई.

महत्वपूर्ण पाठ्यग्रंथ

श्वान

1810-1882 ई.

1839 ई.

कोशिका सिद्धांत की स्थापना

बेर्नार (Bernard)

1813-1878 ई.

1840-1870 ई.

महान प्रयोगवादी

लूटविख (Ludwig)

1816-1895 ई.

1850-1890 ई.

महान प्रयोगवादी आरेखविधि का आविष्कारक

हेल्महोल्ट्स

1821-1894 ई.

1850-1890 ई.

भौतिकी की प्रयुक्ति

1795 ई. में फ़िज़ियॉलोज़ी की पहली पत्रिका निकली। 1878 ई. में इंग्लिश जर्नल ऑव फ़िज़ियॉलोज़ी तथा 1898 ई. में अमरीक जर्नल आव फ़िज़ियॉलोज़ी प्रकाशित हुई। 1874 ई. में लंदन में युनिवर्सिटी कालेजे और अमरीका के हार्वर्ड में 1876 ई. में फ़िज़ियॉलोज़ी के इंग्लिश चेयर की स्थापना हुई। इस प्रकार हम देखते हैं कि फ़िज़ियॉलोज़ी एक नया विषय है, जिसका प्रारंभ मुश्किल से एक सदी पूर्व हुआ। जीवरसायन और भी नया विषय है तथा फ़िज़ियॉलोज़ी की एक प्रशाखा के रूप में विकसित हुआ है।

विभिन्न रोग और उनसे प्रभावित अंग

जीवाणु (बैक्टीरिया) से होने वाले रोग

रोग का नाम

प्रभावित अंग

रोगाणु का नाम

लक्षण

हैजा

पाचन तंत्र

बिबियो कोलेरी

उल्टी व दस्त, शरीर में ऐंठन एवं निर्जलीकरण (डीहाइड्रेशन)

टी. बी.

फेफड़े

माइक्रोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस

खांसी, बुखार, छाती में दर्द, मुँह से रक्त आना

कुकुरखांसी

फेफड़ा

वैसिलम परटूसिस

बार-बार खांसी का आना

न्यूमोनिया

फेफड़े

डिप्लोकोकस न्यूमोनियाई

छाती में दर्द, सांस लेने में परेशानी

ब्रोंकाइटिस

श्वसन तंत्र

जीवाणु

छाती में दर्द, सांस लेने में परेशानी

प्लूरिसी

फेफड़े

जीवाणु

छाती में दर्द, बुखार, सांस लेने में परेशानी

प्लेग

लिम्फ गंथियां

पास्चुरेला पेस्टिस

शरीर में दर्द एवं तेज बुखार, आँखों का लाल होना तथा गिल्टी का निकलना

डिप्थीरिया

गला

कोर्नी वैक्ट्रियम

गलशोथ, श्वांस लेने में दिक्कत

कोढ़

तंत्रिका तंत्र

माइक्रोबैक्टीरियम लेप्र

अंगुलियों का कट-कट कर गिरना, शरीर पर दाग

टाइफायड

आंत

टाइफी सालमोनेल

बुखार का तीव्र गति से चढऩा, पेट में दिक्कत और बदहजमी

टिटेनस

मेरुरज्जु

क्लोस्टेडियम टिटोनाई

मांसपेशियों में संकुचन एवं शरीर का बेडौल होना

सुजाक

प्रजनन अंग

नाइजेरिया गोनोरी

जेनिटल ट्रैक्ट में शोथ एवं घाव, मूत्र त्याग में परेशानी

सिफलिस

प्रजनन अंग

ट्रिपोनेमा पैडेडम

जेनिटल ट्रैक्ट में शोथ एवं घाव, मूत्र त्याग में परेशानी

मेनिनजाइटिस

मस्तिष्क

ट्रिपोनेमा पैडेडम

सरदर्द, बुखार, उल्टी एवं बेहोशी

इंफ्लूएंजा

श्वसन तंत्र

फिफर्स वैसिलस

नाक से पानी आना, सिरदर्द, आँखों में दर्द

ट्रैकोमा

आँख

बैक्टीरिया

सरदर्द, आँख दर्द

राइनाटिस

नाक

एलजेनटस

नाक का बंद होना, सरदर्द

स्कारलेट ज्वर

श्वसन तंत्र

बैक्टीरिया

बुखार

विषाणु (वायरस) से होने वाले रोग

रोग का नाम

प्रभावित अंग

लक्षण

गलसुआ

पेरोटिड लार ग्रन्थियां

लार ग्रन्थियों में सूजन, अग्न्याशय, अण्डाशय और वृषण में सूजन, बुखार, सिरदर्द। इस रोग से बांझपन होने का खतरा रहता है।

फ्लू या एंफ्लूएंजा

श्वसन तंत्र

बुखार, शरीर में पीड़ा, सिरदर्द, जुकाम, खांसी

रेबीज या हाइड्रोफोबिया

तंत्रिका तंत्र

बुखार, शरीर में पीड़ा, पानी से भय, मांसपेशियों तथा श्वसन तंत्र में लकवा, बेहोशी, बेचैनी। यह एक घातक रोग है।

खसरा

पूरा शरीर

बुखार, पीड़ा, पूरे शरीर में खुजली, आँखों में जलन, आँख और नाक से द्रव का बहना

चेचक

पूरा शरीर विशेष रूप से चेहरा व हाथ-पैर

बुखार, पीड़ा, जलन व बेचैनी, पूरे शरीर में फफोले

पोलियो

तंत्रिका तंत्र

मांसपेशियों के संकुचन में अवरोध तथा हाथ-पैर में लकवा

हार्पीज

त्वचा, श्लष्मकला

त्वचा में जलन, बेचैनी, शरीर पर फोड़े

इन्सेफलाइटिस

तंत्रिका तंत्र

बुखार, बेचैनी, दृष्टि दोष, अनिद्रा, बेहोशी। यह एक घातक रोग है

 

विटामिन की कमी से होने वाले रोग

विटामिन

रोग

स्रोत

विटामिन ए

रतौंधी, सांस की नली में परत पड़ऩा

पपीता, मक्खन, घी, अण्डा एवं गाजर

विटामिन बी1

बेरी-बेरी

दाल खाद्यान्न, अण्डा व खमीर

विटामिन बी2

डर्मेटाइटिस, आँत का अल्सर,जीभ में छाले पडऩा

पत्तीदार सब्जियाँ, माँस, दूध, अण्डा

विटामिन बी3

चर्म रोग व मुँह में छाले पड़ जाना

खमीर, अण्डा, मांस, बीजवाली सब्जियाँ, हरी सब्जियाँ आदि

विटामिन बी6

चर्म रोग

दूध, अंडे की जर्दी, मटन आदि

 

 

 

 

 

 

 

C104- प्राकृतिक चिकित्सा व् यौगिक उपचार

(Naturopathy and Yoga Treatment )

प्राकृतिक चिकित्सा की परिभाषा

प्राकृतिक चिकित्सा, यह एक ऐसी अनूठी प्रणाली है जिसमें जीवन के शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक तलों के रचनात्मक सिद्धांतों के साथ व्यक्ति के सद्भाव का निर्माण होता है। इसमें स्वास्थ्य के प्रोत्साहन, रोग निवारक और उपचारात्मक के साथ-साथ फिर से मज़बूती प्रदान करने की भी अपार संभावनाएं हैं।

ब्रिटिश नेचरोपैथिक एसोसिएशन के घोषणापत्र के अनुसार, "प्राकृतिक चिकित्सा उपचार की एक ऐसी प्रणाली है जो शरीर के भीतर महत्वपूर्ण उपचारात्मक शक्ति के अस्तित्व को मान्यता देती है।" अतः यह मानव प्रणाली से रोगों के कारण दूर करने के लिए अर्थात रोग ठीक करने के लिए मानव शरीर से अवांछित और अप्रयुक्त मामलों को बाहर निकालकर विषाक्त पदार्थों को निकालकर मानव प्रणाली की सहायता की वकालत करती है।

प्राकृतिक चिकित्सा की मुख्य विशेषताएं

प्राकृतिक चिकित्सा की मुख्य विशेषताएं हैं

  1. सभी रोगों, उनके कारण और उपचार एक हैं। दर्दनाक और पर्यावरणीय स्थिति को छोड़कर, सभी रोगों का कारण एक है यानी शरीर में रुग्णता कारक पदार्थ का संचय होना। सभी रोगों का उपचार शरीर से रुग्णता कारक पदार्थ का उन्मूलन है।
  2. रोग का प्राथमिक कारण रुग्णता कारक पदार्थ का संचय है। बैक्टीरिया और वायरस शरीर में प्रवेश कर तभी जीवित रहते हैं जब रुग्णता कारक पदार्थ का संचय हो और उनके विकास के लिए एक अनुकूल वातावरण शरीर में स्थापित हुआ हो। अतः रोग का मूल कारण रुग्णता कारक पदार्थ है और बैक्टीरिया द्वितीयक कारण बनते हैं।
  3. गंभीर बीमारियां शरीर द्वारा आत्म चिकित्सा का प्रयास होती हैं। अतः वे हमारी मित्र हैं, शत्रु नहीं। पुराने रोग, गंभीर बीमारियों के गलत उपचार और दमन का परिणाम हैं।
  4. प्रकृति सबसे बड़ा मरहम लगाने वाली है। मानव शरीर में स्वयं ही रोगों से खुद को बचाने की शक्ति है तथा अस्वस्थ होने पर स्वास्थ्य पुनः प्राप्त कर लेती है।
  5. प्राकृतिक चिकित्सा में केवल रोग ही नहीं बल्कि रोगी के पूरे शरीर पर असर होकर वह नवीकृत होता है।
  6. प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा पुरानी बीमारियों से पीड़ित मरीजों को भी अपेक्षाकृत कम समय में सफलतापूर्वक उपचारित किया जाता है।
  7. प्रकृति के उपचार में दबे हुए रोगों को सतह पर लाया जाता है और स्थायी रूप से हटा दिया जाता है।
  8. प्राकृतिक चिकित्सा एक ही समय में सभी तरह के पहलुओं जैसे शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक, का उपचार करती है।
  9. प्राकृतिक चिकित्सा शरीर का सम्पूर्ण रूप से उपचार करती है।
  10. प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार, "केवल भोजन ही चिकित्सा है”, कोई बाहरी दवाओं का इस्तेमाल नहीं किया जाता है।
  11. स्वयं के आध्यात्मिक विश्वास के अनुसार प्रार्थना करना उपचार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

खुराक चिकित्सा

इस थेरेपी के अनुसार, भोजन प्राकृतिक रूप में लिया जाना चाहिए। ताज़े मौसमी फल, ताज़ी हरी पत्तेदार सब्जियां और अंकुरित भोजन बहुत ही लाभकारी हैं। ये आहार मोटे तौर पर तीन प्रकार में विभाजित हैं जो इस प्रकार हैं:

  1. एलिमिनेटिव (निष्कासन हेतु) आहार: तरल-नींबू, साइट्रिक रस, नर्म नारियल का पानी, वनस्पति सूप, छाछ, गेहूं की घास का रस आदि।
  2. सुखदायक आहार: फल, सलाद, उबली हुई/ वाष्पीकृत सब्जियां, अंकुर, सब्ज़ी की चटनी आदि
  3. रचनात्मक आहार: पौष्टिक आटा, अप्रसंस्कृत चावल, थोड़ी सी दालें, अंकुर, दही आदि

क्षारीय होने के नाते, ये आहार स्वास्थ्य में सुधार करने में, शरीर की सफ़ाई और बीमारी के लिए प्रतिरक्षा के प्रतिपादन में मदद करते हैं। इस लिहाज़ से भोजन का उचित संयोजन आवश्यक है। स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए हमारा भोजन 20% अम्लीय और 80% क्षारीय होना चाहिए। अच्छा स्वास्थ्य चाहने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए संतुलित भोजन नितान आवश्यक है। प्राकृतिक चिकित्सा में भोजन को दवा के रूप में माना जाता है.

उपवास चिकित्सा

उपवास (फास्ट) मुख्य रूप से स्वेच्छा से कुछ समयावधि के लिए कुछ या सभी भोजन, पेय, या दोनों से परहेज़ करना है। यह शब्द पुरानी अंग्रेजी से व्युत्पन्न फीस्टनसे निकला है जिसका मतलब है, उपवास करना, देखना और सख्त होना। संस्कृत में 'व्रतका अर्थ है 'दृढ़ संकल्प' और 'उपवासका अर्थ है 'ईश्वर के पास'। उपवास संपूर्ण हो सकता है, आंशिक और लंबे समय तक का हो सकता अथवा यह कुछ अवधि में रुक-रुक कर हो सकता है। स्वास्थ्य संरक्षण के लिए एक उपवास उपचार का महत्वपूर्ण साधन है। उपवास में, मानसिक तैयारी एक आवश्यक पूर्व शर्त है। लंबे समय का उपवास केवल एक सक्षम प्राकृतिक चिकित्सक के पर्यवेक्षण के अधीन किया जाना चाहिए।

उपवास की अवधि रोगी की उम्र, बीमारी की प्रकृति और पहले से इस्तेमाल की गई दवाओं के प्रकार पर निर्भर करती है। कभी-कभी कुछ समय दो या तीन दिन के उपवास की एक श्रृंखला शुरू करने और धीरे-धीरे एक या दो दिन से प्रत्येक उपवास की अवधि बढ़ाने की सलाह दी जाती है। उपवास कर रहे रोगी को कोई नुकसान नहीं होगा बशर्ते कि वो आराम करना और देखभाल किसी उचित पेशेवर के तहत कर रहा हो।

उपवास पानी, रस, या कच्ची सब्जियों के रस के साथ हो सकता है। सबसे अच्छी, सुरक्षित और सबसे प्रभावी विधि नीबू के रस से उपवास है। उपवास के दौरान शरीर जमा अपशिष्ट की भारी मात्रा को जलाकर निकालता है। हम क्षारीय रस पीकर इस सफाई की प्रक्रिया में मदद कर सकते हैं। रसों में शर्करा ह्रदय को मजबूत करती है, इसलिए रस द्वारा उपवास, उसका सबसे अच्छा तरीका है। सभी रस, पीने से तुरंत पहले ताजा फल से तैयार किए जाने चाहिए। डिब्बाबंद या जमे हुए रस का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। एक एहतियाती उपाय है, जो उपवास के सभी मामलों में किया जाना चाहिए, एनीमा द्वारा उपवास की शुरुआत में आंत को पूरी तरह खाली करना ताकि मरीज को गैस या घटक शरीर में शेष अपशिष्ट से उत्पन्न अपघटित पदार्थ से परेशानी नहीं हो। उपवास की अवधि के दौरान एनिमा कम से कम हर दूसरे दिन लिया जाना चाहिए। कुल तरल पदार्थ सेवन लगभग छह से आठ गिलास होना चाहिए। उपवास के दौरान शरीर में संचित जहर और विषाक्त अपशिष्ट पदार्थों को नष्ट करने की प्रक्रिया में बहुत ऊर्जा खर्च होती है। इसलिए यह अत्यंत महत्व का है कि उपवास के दौरान रोगी को ज़्यादा से ज़्यादा सम्भव शारीरिक और मानसिक विश्राम प्राप्त हो।

उपवास की सफलता काफी हद तक इस पर निर्भर करती है कि उसे कैसे तोड़ा जाता है ? उपवास तोड़ने के मुख्य नियम हैं: आवश्यकता से अधिक न खाएं, भोजन को धीरे-धीरे चबा कर खाएं और सामान्य आहार के लिए क्रमिक बदलाव के लिए कई दिन लगाएं।

उपवास के शारीरिक लाभ और प्रभाव

इतिहास में अधिकतर संस्कृतियों के चिकित्सकों ने प्राचीन से आधुनिक काल तक विभिन्न स्थितियों के लिए चिकित्सा के रूप में उपवास की सिफारिश की है। हालांकि पहले के अवलोकन का अध्ययन बिना वैज्ञानिक पद्धति या समझ के किया गया था, वे फिर भी उपवास को एक चिकित्सीय साधन के रूप में प्रयुक्त करने के बारे में कहते हैं। पहले के अवलोकन पशु के व्यवहार पर आधारित थे लेकिन आज वे पशु के शरीर क्रिया विज्ञान पर आधारित हैं। इस लेख में हम यह विचार करने की कोशिश करेंगे कि शारीरिक और चयापचय लाभ का वर्णन करने वाले साहित्य की समीक्षा के माध्यम से उपवास लोगों के स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में कैसे अच्छी तरह उपयोगी हो सकता है। उपवास (कैलोरी पर नियंत्रण और रुक-रुक कर उपवास) द्वारा प्राप्त शारीरिक प्रभावों में सबसे प्रमुख निम्नलिखित हैं: इंसुलिन संवेदनशीलता में वृद्धि जिसके परिणामस्वरूप प्लाज्मा ग्लूकोज व इंसुलिन सांद्रता के स्तर में कमी होती है और ग्लूकोज सहनशीलता में सुधार होता है, ऑक्सिडेटिव तनाव के स्तर में कमी जो प्रोटींस, लिपिड्स व डीएनए को घटे हुए ऑक्सिडेटिव नुकसान द्वारा दर्शाई जाती है, गर्मी, ऑक्सीडेटिव और चयापचय तनाव सहित विभिन्न तनावों के प्रतिरोध में वृद्धि और प्रतिरक्षा कार्य में बढ़ौत्री।

सकल और कोशिकीय शरीर क्रिया दोनों कैलोरी के प्रतिबंध (सीआर) या रुक-रुक कर उपवास अभ्यासों (आइआर) से बहुत प्रभावित होती हैं। सकल शरीर क्रिया विज्ञान के लिहाज़ से बेशक शरीर के वसा और द्रव्यमान में महत्वपूर्ण कमी होती है, जो एक स्वस्थ हृदय प्रणाली को सहयोग देती है और रोधगलन की घटनाओं को कम कर देती है। ह्रदय के बचाव के अलावा जिगर में तनाव के प्रति अधिक सहिष्णुता प्रेरित होती जो होमो सैपिअंस की पोषक कोर है। कीटोन बॉडी (जैसे β-हाइड्रॉक्सिब्यूटाइरेट) की तरह के वैकल्पिक ऊर्जा भंडार होमो सैपिअंस को जीवन के अतिरिक्त बर्दाश्त करने में सक्षम बनाते हैं। (इन्स) इंसुलिन और ग्लूकोज के प्रति बढ़ी हुई संवेदनशीलता से अत्यधिक और हानिकारक रक्त ग्लूकोज में कटौती होती है और एक ऊर्जा स्रोत के रूप में इसका उपयोग होता है।

मृदा (मिट्टी) से उपचार

मृदा उपचार बहुत सरल और प्रभावी उपचार साधन है। इसके लिए प्रयोग की जाने वाली मिट्टी साफ होनी चाहिए और जमीन की सतह से 3 से 4 फीट की गहराई से ली जानी चाहिए। मिट्टी में पत्थर के टुकड़े या रासायनिक खाद आदि का कोई संदूषण नहीं होना चाहिए।

मिट्टी प्रकृति के पांच तत्वों में से एक है जिसका शरीर के स्वास्थ्य और बीमारी दोनों पर बहुत प्रभाव होता है। मिट्टी के उपयोग के लाभ:

  1. इसका काला रंग सूर्य की धूप के सभी रंग अवशोषित कर उन्हें शरीर को प्रदान करता है।
  2. मिट्टी एक लंबे तक नमी को बरकरार रखती है, शरीर पर लेप करने पर यह ठंडक प्रदान करती है।
  3. इसके आकार और एकरूपता को पानी मिलाकर आसानी से बदला जा सकता है।
  4. यह सस्ती और आसानी से उपलब्ध होती है।

उपयोग करने से पहले पत्थर, घास कणों और अन्य अशुद्धियों को अलग करने के लिए मिट्टी को सुखाना, चूरा बनाना और छानना चाहिए।

स्थानीय अनुप्रयोग हेतु मिट्टी का पैक

एक पतले, गीले मलमल के कपड़े को मिट्टी में लथपथ कर और रोगी के पेट के आकार के आधार पर एक पतली ईंट के आकार में उसे बनाकर, रखें। मिट्टी के पैक के आवेदन की अवधि 20 से 30 मिनट है। ठंड के मौसम में आवेदन करने पर, मिट्टी के पैक पर एक कंबल डाल दें और शरीर को भी अच्छी तरह से ढक दें।

मिट्टी के पैक के लाभ

  1. पेट पर लगाने पर यह सभी प्रकार के अपच को दूर कर देती है। यह आंतों की गर्मी कम करने और पेरिस्टालसिस को उत्तेजित करने में प्रभावी है।
  2. कंजेस्टिव सिरदर्द में सिर एक मिट्टी के मोटे पैक का आवेदन करने पर दर्द से तुरंत राहत मिलती है। इसलिए जब एक लंबे समय तक ठंडे आवेदन की आवश्यकता हो, इसकी सिफारिश की जाती है।
  3. आंखों पर पैक का आवेदन नेत्रश्लेष्मलाशोथ, नेत्रगोलक के हैमरेज, खुजली, एलर्जी, अपवर्तन के कम होने के दोष जैसे निकट दृष्टि और दूरदृष्टि की तरह त्रुटियों के मामलों में उपयोगी है, और विशेष रूप से मोतियाबिंद में, जिसमें यह नेत्रगोलक के तनाव को कम करने में मदद करता है।

चेहरे के लिए मिट्टी का पैक

गीली मिट्टी चेहरे पर लगाकर 30 मिनट तक सूखने दी जाती है। यह त्वचा के रंग में सुधार लाने और मुंहासों को हटाने तथा त्वचा के छिद्र खोलने में मददगार होती है जो मुंहासों के उन्मूलन में सहायक है। यह आंखों के आसपास के काले घेरे को दूर करने में भी सहायक है। 30 मिनट के बाद चेहरा ठंडे पानी से अच्छी तरह से धोया जाना चाहिए।

मिट्टी से स्नान

मिट्टी मरीज़ को बैठने या लेटने की स्थिति में लगाई जा सकती है। यह परिसंचरण बढ़ाकर व त्वचा के ऊतकों को सक्रिय कर त्वचा की स्थिति में सुधार करने में मदद करती है। स्नान के दौरान ठंड पकड़ने से बचने के लिए सावधानी बरती जानी चाहिए। बाद में, रोगी को ठंडे पानी की धार से अच्छी तरह धोया जाना चाहिए। यदि मरीज ठंड महसूस करता है तो गर्म पानी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। उसके बाद रोगी को तुरंत सुखाकर एक गर्म बिस्तर पर स्थानांतरित कर दिया जाता है। मिट्टी से स्नान की अवधि 45 से 60 मिनट हो सकती है।

मिट्टी से स्नान के लाभ

  1. मिट्टी के प्रभाव नवीनता प्रदान करने, स्फूर्ति और सक्रियता देने वाले होते हैं।
  2. घावों और त्वचा रोगों के लिए, मिट्टी का आवेदन ही सही प्रकार की पट्टी है।
  3. मिट्टी से उपचार का प्रयोग शरीर को ठंडक देने के लिए किया जाता है।
  4. यह शरीर के विषाक्त पदार्थों को तरलीकृत कर अवशोषित करती है और अंततः उन्हें शरीर से निकाल देती है।
  5. कब्ज, तनाव के कारण सिर दर्द, उच्च रक्तचाप, त्वचा आदि जैसे विभिन्न रोगों में मिट्टी का सफलतापूर्वक प्रयोग किया जाता है।
  6. गांधीजी कब्ज से छुटकारा पाने के लिए मिट्टी के पैक का इस्तेमाल करते थे।

जलोपचार

जलोपचार प्राकृतिक चिकित्सा की एक शाखा है। यह पानी के विभिन्न रूपों का उपयोग कर विकारों का उपचार है। पानी के अनुप्रयोग के ये रूप बहुत पुराने समय से अभ्यास में हैं। जलतापीय चिकित्सा अतिरिक्त रूप से तापमान के प्रभाव का उपयोग, गर्म और ठंडे स्नान, सौना, आवरण आदि में और उसके सभी रूपों ठोस, तरल, भाप, बर्फ और भाप, आंतरिक और बाह्य रूप से, में उपयोग करती है। जल नि:सन्देह रोग के लिए सभी उपचारात्मक एजेंटों में सबसे प्राचीन है। अब इस महान चिकित्सा माध्यम को व्यवस्थित कर एक विज्ञान के रूप में बनाया गया है। हाइड्रिएटिक अनुप्रयोग आम तौर पर विभिन्न तापमानों पर दिया जाता है, अनुप्रयोग के तापमान नीचे तालिका में दिए गए हैं:

क्र.सं.

तापमान

oफेरनहाइट

oसेल्सियस

1.

बहुत ठंडा (बर्फ का अनुप्रयोग)

30-55

-1-13

2.

ठंडा

55-65

13-18

3.

ठंडा

65-80

18-27

4.

गुनगुना

80-92

27-33

5.

गर्म(तटस्थ)

92-98
(92-95)

33-37
(33-35)

6.

गर्म

98-104

37-40

7.

बहुत गर्म

104 से अधिक

40 से अधिक

जल का प्रभाव और उपयोग

  1. साफ ठंडे पानी से ठीक तरीके से स्नान करना जलोपचार का एक उत्कृष्ट रूप है। इस तरह के स्नान त्वचा के सभी रोम खोलकर शरीर को हल्का व ताज़ा बना देते हैं। ठंडे स्नान में शरीर की सभी प्रणालियों और मांसपेशियों को सक्रियता मिलती है और स्नान के बाद रक्त परिसंचरण में सुधार होता है। नदियों, तालाबों, या झरने में विशेष अवसरों पर स्नान करने की पुरानी परंपरा एक तरह से जलोपचार का प्राकृतिक रूप ही है।
  2. यह इच्छित तापीय और यांत्रिक प्रभाव उत्पन्न करने के लिए सबसे अधिक लचीला माध्यम है और एक सीमित क्षेत्र या पूरे शरीर की सतह पर लागू किया जा सकता है।
  3. यह गर्मी को अवशोषित करने में सक्षम है और बड़ी तत्परता के साथ गर्मी बाहर भी फेंक देता है। इसलिए, यह शरीर से अतिरिक्त गर्मी बाहर करने या उसमें गर्मी प्रविष्ट करने के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। हालांकि ठंडा पानी के इस्तेमाक का मुख्य उद्देश्य शारीरिक गर्मी को निकाल या कम करना नहीं है, बल्कि खो दी गई गर्मी की तुलना में अधिक गर्मी उत्पन्न करने की महत्वपूर्ण शक्ति बढ़ाने का है।
  4. . एक सार्वभौमिक विलायक होने के नाते, इसका उपयोग आंतरिक, एनीमा या कोलोनिक सिंचाई या पानी पीने के रूप में, यूरिक एसिड, यूरिया, नमक, अत्यधिक चीनी, और कई अन्य रक्त और खाद्य रसायन जो कि अपशिष्ट उत्पाद हैं, के उन्मूलन में अत्यधिक सहायता करता है।

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि इन तरीकों के सफल उपयोग के लिए महत्वपूर्ण शक्ति का एक निश्चित ज़रूरी होता है। जहां शक्ति बहुत कम है, ये निरर्थक हैं। गंभीर स्थितियों की तरह महत्वपूर्ण शक्ति अधिक होती है और इसलिए महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया में एक निश्चितता होती है। पुराने मामलों में, जहां महत्वपूर्ण शक्ति कम हो, ये स्नान कम उपयोगी होते हैं, लेकिन ऐसे मामलों में पैक उपयोगी होते हैं क्योंकि वे अपने अनुप्रयोग में तुलनात्मक रूप से हल्के होते हैं।

उपचार में जल का कई रूपों में प्रयोग किया जाता है. उपचार के विभिन्न प्रकार हैं:

  1. गीली पट्टी और पुल्टिस
    • ठंडी सेक: पेट की ठंडी सिकाई
    • तापीय सिकाई: सीने का पैक, पेट का पैक, गीला करधनी पैक, गले का पैक, घुटने का पैक, और पूरी गीली चादर का पैक
    • गर्म और ठंडी सिकाई: सिर, फेफड़े, गुर्दे, गैस्ट्रो यकृत, श्रोणि और पेट की गर्म और ठंडी सिकाई
  • स्नान
    • हिप स्नान - ठंडा, तटस्थ, गर्म, Stiz स्नान और वैकल्पिक हिप स्नान
    • मेरुदंड का स्नान और मेरुदंड में स्प्रे: ठंडा, तटस्थ, गर्म
    • पैर और भुजा स्नान: पैर का ठंडा, गर्म स्नान, भुजा स्नान, संयुक्त रूप से गर्म पैर और भुजा, कंट्रास्ट भुजा स्नान और कंट्रास्ट पैर स्नान।
    • साँस द्वारा भाप लेना और भाप स्नान
    • सौना बाथ
    • स्पंज स्नान
  • जेटस्प्रे मालिश
    • ठंडी, तटस्थ, गर्म, वैकल्पिक, चक्रीय जेट स्प्रे मालिश
    • अभिसिंचन स्नान: ठंडा अभिसिंचन, तटस्थ अभिसिंचन, गर्म अभिसिंचन, गर्म एवं ठंडे अभिसिंचन
    • ठंडा स्नान
    • ट्रॉमा जेटस्प्रे
  • डूब स्नान:ठंडा डूब स्नान, घर्षण के साथ ठंडा डूब, तटस्थ डूब स्नान, गर्म डूब, तटस्थ अर्ध स्नान, एप्सोम नमक के साथ ग्रेजुएटेड डूब स्नान, अस्थमा स्नान, भँवर स्नान, पानी के अन्दर मालिश
  • एनीमा:ग्रेजुएटेड एनीमा, योनि की धुलाई, ठंडी धुलाई, तटस्थ धुलाई, गर्म धुलाई
  • हाइड्रो उपचार के तौर तरीकों में से एक कोलोन (बड़ी आंत) की थेरेपी है।

कोलोन (मलाशय) का जलोपचार

यह कोलोन या बड़ी आंत की सफाई या फ्लशिंग की प्रक्रिया है। यह उपचार एक एनीमा के समान है, लेकिन अधिक व्यापक है। यह रुके हुए मल को कोलोन से निकालने या उसकी गन्दगी दूर करने के लिए सौम्य दबाव (दर्द के बिना) के तहत साफ फ़िल्टर्ड पानी का उपयोग करती है। सत्रों की संख्या व्यक्ति पर निर्भर करेगी। बड़ी आंत की पूरी तरह से सफाई के लिए अधिकांश लोगों को 3-6 उपचारों की एक श्रृंखला की आवश्यकता होती है।

जलोपचार के लाभ और शारीरिक प्रभाव

जलोपचार के स्वास्थ्यवर्धक और चिकित्सकीय गुण उसके यांत्रिक और/या तापीय प्रभावों पर आधारित हैं। यह गर्म और ठंडे उत्तेजन के प्रति, गर्मी के दीर्घ आवेदन, पानी से उत्पन्न दबाव और उसके द्वारा प्रदत्त अनुभूति के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया का लाभ लेती है। नसें, त्वचा पर महसूस किए आवेग को शरीर में गहराई पर ले जाती हैं, जहाँ वे प्रतिरक्षा प्रणाली के उत्तेजक, तनाव हार्मोन के उत्पादन को प्रभावित करने, परिसंचरण और पाचन को उत्तेजित करने, रक्त के प्रवाह को प्रोत्साहित करने और दर्द के प्रति संवेदनशीलता कम करने में सहायक होती हैं। आम तौर पर गर्मी आंतरिक अंगों की गतिविधि को धीमा शरीर को शांत करती है। इसके विपरीत ठंड, उत्तेजित करती है, और आंतरिक गतिविधियों में वृद्धि करती है।

इसका यांत्रिक क्रिया स्नान के दौरान होती है जब एक कुण्ड, एक पूल, या एक भँवर में डूबे हुए शरीर के वजन में 50% से 90% कमी हो जाती है और एक तरह की भारहीनता का अनुभव होता है। शरीर को गुरुत्वाकर्षण के निरंतर खिंचाव से राहत मिलती है। पानी का भी हाइड्रोस्टेटिक प्रभाव है। यह मालिश की तरह अनुभव देता है चूंकि पानी धीरे-धीरे आपके शरीर को गूंथता है। गति में, पानी त्वचा के स्पर्श ग्राह्य हिस्से को उत्तेजित करता है, और रक्त परिसंचरण को बढ़ाने तथा खिंची हुई मांसपेशियों को ढीला करता है।

मालिश थेरेपी

मालिश निष्क्रिय व्यायाम का एक उत्कृष्ट रूप है। यह शब्द ग्रीक शब्द 'मस्सिअरजिसका अर्थ है गूंथना, फ्रेंच गूंथने का घर्षणया अरबी मस्स जिसका अर्थ स्पर्श करना, महसूस करना या संभाल" है या लेटिन मस्सा से जिसका अर्थ "भार, आटासे व्युत्पन्न है। मालिश भौतिक (शारीरिक), कार्यात्मक (शारीरिक), और कुछ मामलों में मनोवैज्ञानिक उद्देश्यों और लक्ष्यों के साथ कोमल ऊतक के हेरफेर का अभ्यास है। यदि सही ढंग से एक नंगे शरीर पर की जाए, तो यह अत्यधिक उत्तेजक और स्फूर्तिदायक हो सकती है।

मालिश भी प्राकृतिक चिकित्सा का और काफी अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए एक आवश्यक साधन है। मालिश में शरीर पर दबाव के साथ संरचित, असंरचित, स्थिर, या गतिमान-तनाव, गति, या कंपन, के साथ हाथों से या यांत्रिक जरिए से छेड़छाड़ शामिल है। लक्षित ऊतकों में मांसपेशियां, टेंडंस, लिगामेंट, त्वचा, जोड़, या अन्य संयोजी ऊतकों से साथ-साथ लसीका वाहिकाएं शामिल हो सकते हैं। मालिश हाथ, उंगलियों, कोहनी, घुटनों, बांह की कलाई और पैर के साथ की जा सकती है। लगभग अस्सी से अधिक विभिन्न मान्यता प्राप्त मालिश के साधन हैं। यह रक्त परिसंचरण में सुधार और शारीरिक अंगों को मजबूत बनाने का काम करती है। सर्दियों के मौसम में, पूरे शरीर की मालिश के बाद सूर्य स्नान अच्छी तरह से स्वास्थ्य और शक्ति के संरक्षण के अभ्यास के रूप में जाना जाता है। यह सभी के लिए फायदेमंद है। यह मालिश और सूरज की किरणों की चिकित्सा के संयुक्त लाभ प्रदान करता है। बीमारी की स्थिति में, आवश्यक उपचारात्मक प्रभाव मालिश की विशिष्ट तकनीक के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। मालिश उनके लिए एक विकल्प है जो व्यायाम नहीं कर सकते हैं। व्यायाम के प्रभाव मालिश से प्राप्त किए जा सकते हैं। सरसों तेल, तिल का तेल, नारियल तेल, जैतून का तेल, खुशबूदार तेल आदि जैसे विभिन्न तेलों का स्नेहक के रूप में उपयोग किया जाता है, जो उपचारात्मक प्रभाव देते हैं।

मालिश के सात बुनियादी तरीके हैं और ये हैं: स्पर्श, मालिश करते समय थपथपाना (पथपाकर), घर्षण (रगड़ना), पेट्रिसाज (सानना), टैपोटमेंट (ठोकना) कंपन (हिलाना या कंपकंपाना) और जोड़ों को हिलाना। हरकत रोग की स्थिति और मालिश किए गए भागों के अनुसार भिन्न होती है।

ज्यादातर बीमारियों में उपयोगी मालिश का दूसरा रूप कम्पनयुक्त मालिश, पाउडर मालिश, जल मालिश, सूखी मालिश है। नीम के पत्तों का पाउडर, गुलाब की पंखुड़ियों का भी मालिश के लिए स्नेहक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

मालिश के शारीरिक प्रभाव

रिफ्लेक्स प्रभाव (तंत्रिका तंत्र द्वारा मध्यस्थता की गई प्रतिक्रियाएं)

  1. धमनियों का वेसोडाइलेशन (व्यास में वृद्धि)
  2. क्रमाकुंचन की उत्तेजना (पाचन में मदद करती है)
  3. मांसपेशियों की टोन में वृद्धि या कमी
  4. उदर गुहा में अंगों की गतिविधि बढ़ जाती है
  5. ढीलेपन की प्रतिक्रिया आरम्भ होती है
  6. मांसपेशियों पर सुखदायक या उत्तेजक प्रभाव
  7. ह्रदय को उत्तेजित करती है, शक्ति और संकुचन की दर को बढ़ावा देती है
  8. प्रतिरक्षा प्रणाली की क्षमता बढ़ाती है

यांत्रिक प्रभाव (हाथ द्वारा सीधे लागू दबाव से उत्पन्न की प्रतिक्रियाएं)

  1. शिरापरक वापसी में वृद्धि
  2. लसीका प्रवाह, लसीका जल निकासी में वृद्धि
  3. संचार दक्षता
  4. श्लेष्म ढीला होना (श्वसन प्रणाली)
  5. तंतुमयता/संलग्नता टूटना
  6. छोटी मांसपेशियों के लिए खिंचाव/ मांसपेशियों के रेशे ढीले होना
  7. मांसपेशियों के तापमान में वृद्धि
  8. स्थानीय स्तर पर चयापचय दर में वृद्धि और गैसीय विनिमय
  9. निशान के ऊतक खींचता है
  10. मांसपेशियों के टोन में कमी/मांसपेशियों के टोन में वृद्धि
  11. गति की सीमा में वृद्धि
  12. जोड़ों की उचित यांत्रिकी/बायोमैकेनिक्स की बहाली
  13. मांसपेशियों के असंतुलन का उन्मूलन
  14. कमजोर मांसपेशियों को मजबूत बनाना

मालिश के लाभ

शरीर के सभी भागों पर की जाने वाली सामान्य मालिश कई मायनों में बेहद फायदेमंद है। यह तंत्रिका तंत्र को टोन करती है, श्वसन को प्रभावित करती है और फेफड़े, त्वचा, गुर्दे और आंत के रूप में विभिन्न निकास अंगों के माध्यम से जहर और शरीर से अपशिष्ट पदार्थ के उन्मूलन को तेज़ करती है। यह रक्त परिसंचरण और चयापचय की प्रक्रिया को भी बढ़ा देती है। मालिश चेहरे की झुर्रियों को हटाती है, खोखले गाल और गर्दन को भरने में मदद करती है और अकड़ी हुई, दर्द करती तथा सुन्न मांसपेशियों को आराम देती है।

सहकर्मियों द्वारा समीक्षा किए गए चिकित्सा अनुसंधान से दर्द से राहत, चिंता और अवसाद के लक्षण कम होना, रक्तचाप, हृदय की दर, और चिंता में अस्थायी रूप से कमी होने जैसे लाभ शामिल होने के बारे में पता चला है। मालिश क्या कर सकती है, इसके पीछे के सिद्धांतों में शामिल है नोसिसेप्शन अवरुद्ध करना (गेट नियंत्रण सिद्धांत), पैरासिम्पैथेटिक तंत्रिका तंत्र को सक्रिय करना जिससे एंडोर्फिन और सेरोटोनिन की रिहाई प्रोत्साहित हो, तंतुमयता या निशान ऊतक को रोकना, लसीका का प्रवाह बढ़ना, और नींद में सुधार शामिल हैं, लेकिन अभी इस तरह के प्रभाव अच्छी तरह से डिजाइन किए गए नैदानिक अध्ययन द्वारा पुष्ट किए जाने बाकी हैं।

एक्युप्रेशर

एक्यूप्रेशर उपचार की एक प्राचीन चिकित्सा कला है जिसमें शरीर की प्राकृतिक आत्म उपचारात्मक क्षमताओं को प्रोत्साहित करने के लिए उंगलियों या किसी भी गैर-नोकदार वस्तु से त्वचा की सतह पर लयदार तरीके से विशेष बिन्दुओं, जिन्हें एक्यु बिन्दु’ (ऊर्जा संग्राहक बिन्दु) कहा जाता है, पर दबाव दिया जाता है। जब इन बिन्दुओं को दबाया जाता है, वे मांसपेशियों का खिंचाव कम करते हैं और ठीक होने में सहायता के लिए रक्त संचार व शरीर शक्ति को बढ़ावा देते हैं।

एक्यूपंक्चर और एक्यूप्रेशर में एकसमान बिन्दुओं का उपयोग होता है’ जबकि एक्यूप्रेशर में हाथ या किसी भी गैर-नोकदार वस्तु के कोमल, लेकिन मज़बूत दबाव का उपयोग होता है, एक्यूपंक्चर में सुई का उपयोग होता है। एक्यूप्रेशर का कम से कम 5000 साल से एक चिकित्सा कला के रूप इस्तेमाल किया गया है। इस पूरी स्वास्थ्य प्रणाली को 3000 स्थितियों के उपचार में उपयोग के लिए प्रलेखित किया गया है। अब एक्यु बिन्दु सामान्यतः ट्रांस्क्युटेनस विद्युत तंत्रिका उत्तेजना (अर्थात टीईएनएस) और विशिष्ट तरंग दैर्ध्य में एलईडी डायोड से लेजर प्रकाश के उपयोग द्वारा उपचारित किए जाते हैं जिसके तेज़ और स्थायी प्रभाव दिखाई दिए हैं।

एक्यूप्रेशर दर्शन और एक्यु बिन्दु उत्तेजना एक्यूपंक्चर की तरह ही समान सिद्धांतों पर आधारित है। दबाव, बिजली द्वारा उत्तेजना या सुई के बजाय प्रकाश लेजर का उपयोग करके यह शिरोबिंदु कही जाने वाली, सम्पूर्ण शरीर में दौड़ने वाली ऊर्जा की रेखा के विशिष्ट रिफ्लेक्स बिन्दुओं को उत्तेजित करने का काम करती है। कुल 14 मुख्य शिरोबिंदु रेखाएं होती हैं जिनमें से प्रत्येक, व्यक्ति के शरीर के विशेष अंग से सम्बद्ध होती है। जब महत्वपूर्ण ऊर्जा शिरोबिंदु से एक संतुलित और समान तरीके से प्रवाहित होने में सक्षम होती है, तो परिणाम स्वरूप स्वास्थ्य बेहतर होता है। जब आप दर्द या बीमारी का अनुभव करते हैं तो यह एक संकेत होता है कि आपके शरीर के भीतर ऊर्जा के प्रवाह में अवरोध या रिसाव है।

उपयुक्त बिंदु को खोजने के लिए, धीरे से क्षेत्र की तब तक जांच करें जब तक वह बिंदु न मिल जाए जो फनी बोनका आभास न दे या जो संवेदनशील, नर्म या दर्द करने वाला न हो। उसके बाद उस बिन्दु को इतने ज़ोर से दबाएं कि उसमें दर्द हो। उत्तेजना घूर्णन दबाव द्वारा दी जाती है जिसमें पाँच सेकंड तक स्थिर दबाव और पाँच सेकंड तक दबाव हटाया जाता है। आमतौर पर प्रत्येक उपचार सत्र के लिए एक मिनट पर्याप्त है।

एक्यूप्रेशर सिर दर्द, आंखों के तनाव, साइनस की समस्या, गर्दन के दर्द, पीठ के दर्द, गठिया, मांसपेशियों में दर्द, अल्सर के दर्द, मासिक धर्म ऐंठन, पीठ के निचले हिस्से में दर्द, कब्ज और अपच, चिंता, अनिद्रा आदि में राहत देने में मदद करने में प्रभावी हो सकता है।

शरीर के संतुलन और अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने में एक्युप्रेशर के उपयोग के बड़े लाभ हैं। एक्यूप्रेशर का राह्त देने वाला स्पर्श तनाव कम कर देता है, परिसंचरण बढ़ाता है, और शरीर को गहरे आराम के लिए सक्षम बनाता है। तनाव से राहत प्रदान कर, एक्यूप्रेशर रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है और अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है।

एक्यूपंक्चर

एक्यूपंक्चर शरीर के विशिष्ट बिन्दु पर बारीक सुइयां चुभोकर एवं हिलाकर दर्द से राहत देने की प्रक्रिया या उपचारात्मक उद्देश्यों की एक प्रक्रिया है। शब्द एक्यूपंक्चर लैटिन एकस, "सुई", और पंगेरे "चुभोना" से बना है।

परंपरागत चीनी चिकित्सा सिद्धांत के अनुसार, एक्यूपंक्चर बिंदु शिरोबिंदुओं पर स्थित हैं जिसके सहारे क्यूई, महत्वपूर्ण ऊर्जा, बहती है। एक्यूपंक्चर बिन्दुओं या शिरोबिंदुओं के अस्तित्व के लिए कोई ज्ञात संरचनात्मक या ऐतिहासिक आधार नहीं है।

चीन में, एक्यूपंक्चर का उपयोग सबसे पहले प्रमाण पाषाण युग से प्राप्त होता है, जहां इसके लिए बियान शी या तेज पत्थर का इस्तेमाल किया जाता था। चीन में एक्यूपंक्चर का मूल अनिश्चित हैं। सबसे पहला चीनी चिकित्सा लेख जो एक्यूपंक्चर का वर्णन करता है, पीले सम्राट का आंतरिक चिकित्सा का क्लासिक (एक्यूपंक्चर इतिहास) हुआंग्डी नैजिंग है, जो 305-204 ई.पू. के आसपास संकलित किया गया था। कुछ हाइरोग्लाइफिक्स 1000 ई.पू. में पाए गए हैं जो एक्युपंक्चर के प्रारंभिक उपयोग का संकेत हो सकते हैं एक पौराणिक कथा के अनुसार एक्यूपंक्चर की शुरुआत चीन में तब हुई जब कुछ सैनिकों को जो युद्ध में तीर से घायल हो गए थे, शरीर के अन्य भागों में दर्द से राहत का अनुभव हुआ, और फलस्वरूप लोगों ने उपचार के लिए तीर के साथ (और बाद में सुइयों से) प्रयोग शुरू कर दिया। एक्युपंक्चर का प्रसार चीन से कोरिया, जापान और वियतनाम और पूर्वी एशिया में अन्य स्थानों पर हुआ। 16 वीं सदी में पुर्तगाली मिशनरी पश्चिम के बीच को एक्यूपंक्चर की रिपोर्ट लाने वालों में सबसे पहले थे।

एक्यूपंक्चर के परंपरागत सिद्धांत

पारंपरिक चीनी दवा में, शरीर के भीतर यिन और यांग के संतुलन की शर्त को "स्वास्थ्य" माना जाता है। कुछ ने यिन और यांग की सहानुभूतिपूर्ण और परा-सहानुभूतिपूर्ण तंत्रिका प्रणाली से तुलना की है। एक्यूपंक्चर में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्यूई का मुक्त प्रवाह, अनुवाद करने के लिए कठिन अवधारणा जो चीनी दर्शन में व्याप्त है और आमतौर पर "महत्वपूर्ण ऊर्जा" के रूप में अनुवादित है। क्यूई सारहीन है और इसलिए यांग; उसका यिन, सामग्री समकक्ष रक्त है (यह शारीरिक रक्त से अलग है, और बहुत मोटे तौर पर यह उसके समकक्ष है) एक्यूपंक्चर उपचार क्यूई और रक्त के प्रवाह को नियंत्रित करता है, जहां उसकी कमी हो वहां टोनिफाय करता है; जहां अतिरिक्त हो वहां से निकास करता है और जहां ठहराव है वहां मुक्त प्रवाह को बढ़ावा देता है। एक्यूपंक्चर की चिकित्सा साहित्य की एक स्वयंसिद्ध कहावत है "कोई दर्द नहीं, कोई रुकावट नहीं, कोई रुकावट नहीं, कोई दर्द नहीं

पारम्परिक चीनी दर्शन मानव शरीर को सम्पूर्ण रूप में देखता है जिसमें कई “कार्य प्रणालियांहैं जिन्हें सामान्य तौर पर शारीरिक अंगों पर नाम दिया जाता है लेकिन जो उनसे सीधे सम्बन्धित नहीं हैं। इन पद्धतियों के लिए चीनी शब्द झांग फू है, जहां झांग "आंत" या ठोस अंग और फू "आंत" या खोखले अंगों के रूप में अनुवादित किया गया है। रोग को यिन, यांग क्यूई और रक्त के संतुलन की हानि के रूप में समझा जाता है (जो होमिओस्टेसिस के कुछ सादृश्य है)। रोग के उपचार का प्रयास परंपरागत रूप से अंग्रेजी में एक्यूपंक्चर बिंदुओं", या चीनी में ग्ज़ूकहे जाने वाले छोटी मात्रा के शरीर के संवेदनशील हिस्से पर सुइयों, दबाव, गर्मी आदि की गतिविधि के माध्यम से एक या अधिक कार्य प्रणालियों की गतिविधि को संशोधित कर किया जाता है। इसे TCM में "बेसुरेपन के पैटर्न" के इलाज के रूप में संदर्भित किया जाता है।

मुख्य एक्यूपंक्चर बिंदुओं में से अधिकांश “बारह मुख्य शिरोबिंदुओं" और दो "आठ अतिरिक्त शिरोबिंदुओं (डु माई और रेन माई) - कुल चौदह चैनलोंपर पाए जाते हैं, जो शास्त्रीय और पारंपरिक चीनी चिकित्सा ग्रंथों में उस मार्ग के रूप में वर्णित हैं जिनसे क्यूई और रक्तका प्रवाह होता है। अन्य नर्म बिन्दु (आशि बिन्दुके रूप में जाने जाते हैं) पर भी सुई लगाई जा सकती है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि वहां ठहराव इकट्ठा होता है।

रोगोंलक्षणों या स्थितियों की श्रृंखला जिनके लिए एक्यूपंक्चर को एक प्रभावी उपचार के रूप में प्रदर्शित किया गया है।

  • एलर्जिक र्हिनाइटिस
  • अवसाद
  • सिरदर्द
  • सुबह की बीमारी सहित मतली और उल्टी
  • अधिजठर, चेहरे, गर्दन, टेनिस कोहनी, पीठ के निचले हिस्से, घुटने में दंत चिकित्सा के दौरान और आपरेशन के बाद में दर्द
  • प्राथमिक डिस्मेनोरिया
  • रुमेटी गठिया
  • कटिस्नायुशूल
  • ग्रीवा और काठ का स्पॉंसिलोसिस
  • दमा
  • अनिद्रा

रंग चिकित्सा

सूरज की किरणों के सात रंगों में विभिन्न उपचारात्मक प्रभाव हैं। ये रंग हैं, बैंगनी, इंडिगो, नीला, हरा, पीला, नारंगी और लाल। स्वस्थ रहने और विभिन्न रोगों के उपचार में ये रंग प्रभावी ढंग से काम करते हैं। निर्दिष्ट समय के लिए रंगीन बोतलों और रंगीन ग्लासों में, धूप में रखे पानी और तेल को रंग थेरेपी द्वारा विभिन्न विकारों के इलाज के लिए उपकरणों के रूप में उपयोग किया जाता है। रंग थेरेपी के सरल तरीके स्वस्थ होने की प्रक्रिया में बहुत प्रभावी ढंग से मदद करते हैं।

वायु उपचार

ताजा हवा अच्छे स्वास्थ्य के लिए सबसे जरूरी है। वायु स्नान के माध्यम से वायु चिकित्सा का लाभ प्राप्त किया जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति को दैनिक 20 मिनट या यदि संभव हो तो उससे अधिक समय के लिए वायु स्नान करना चाहिए। यह अधिक फायदेमंद है जब सुबह ठंडी रगड़ और व्यायाम के साथ संयुक्त रूप से किया जाए। इस प्रक्रिया में, व्यक्ति को रोज़ाना कपड़े उतारकर या हल्के कपड़े पहनकर एकांतयुक्त साफ स्थान पर चलना चाहिए, जहां पर्याप्त ताजा हवा उपलब्ध हो। एक अन्य वैकल्पिक विधि है छतविहीन लेकिन दीवारों की तरह शटर से घिरे कमरे में ताकि वायु प्रवाह उन्मुक्त रूप से हो लेकिन अन्दरूनी दृश्य किसी को दिखाई न दे।

तंत्र

ठंडी हवा या पानी के द्रुतशीतन प्रभाव के खिलाफ प्रतिक्रिया करने के लिए, वे तंत्रिका केन्द्र, जो परिसंचरण नियंत्रण करते हैं, बड़ी मात्रा में सतह पर रक्त भेजते हैं और त्वचा को गर्म, लाल, धमनीय रक्त द्वारा फ्लश करते हैं। रक्त धारा का प्रवाह बहुत बढ़ जाता है और शरीर की सतह से रुग्ण स्र्ग्ण पदार्थ के उन्मूलन में भी तदनुसार वृद्धि होती है।

क्रियाविधि

वायु स्नान शरीर की सतह पर समाप्त हो रही लाखों तंत्रिकाओं पर सुखदायक और टॉनिक प्रभाव डालता है। यह घबराहट, नसों की दुर्बलता, गठिया, त्वचा, मानसिक और विभिन्न अन्य पुरानी बीमारियों के मामलों में अच्छा परिणाम देता है।

चुंबक चिकित्सा

चुंबक चिकित्सा एक नैदानिक प्रणाली है जिसमें रोगियों के शरीर पर चुम्बक के अनुप्रयोग के माध्यम से रोगों का इलाज किया जाता है। यह सबसे सरल, सबसे सस्ती और पूरी तरह दर्दरहित प्रणाली है जिसमें उपचार के बाद लगभग कोई भी दुष्प्रभाव नहीं होते हैं। केवल इस्तेमाल किया जाने वाला उपकरण केवल चुंबक होता है।

चुंबकीय उपचार विभिन्न शक्तियों में उपलब्ध चिकित्सीय मैग्नेट द्वारा शरीर के अंगों पर सीधे या शरीर के लिए सामान्य उपचार के रूप में लागू किया जाता है। इसके अलावा विभिन्न भागों जैसे पेट, घुटने, कलाई, आदि के लिए चुंबकीय बेल्ट उपलब्ध हैं। चुंबकीय हार, चश्मे और कंगन का भी इलाज के लिए उपयोग किया जाता है।

लाभ: ऊर्जा संतुलन में मदद करता है; लागू क्षेत्र के लिए परिसंचरण में सुधार करता है; शरीर में गर्माहट में वृद्धि करता है।

प्राकृतिक चिकित्सा में शिक्षा

योग्य जनशक्ति की भारी कमी के कारण योग और प्राकृतिक चिकित्सा के विकास को आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी के समान स्तर पर विकास और बढ़ावा नहीं मिल सका । हालांकि, हाल के वर्षों में, कई गैर सरकारी संगठन और स्वयंसेवी संगठन योग और प्राकृतिक चिकित्सा गृहों के साथ-साथ डिग्री कालेजों की स्थापना के लिए भी आगे आए हैं।

 

योग के चिकित्सीय प्रभाव

हाल के वर्षों में, योग ने दुनिया भर में जवान और बूढ़े लोगों के बीच समान रूप से बहुत लोकप्रियता हासिल की है। मनोचिकित्सकों और मनोवैज्ञानिक ने इसकी क्षमताओं को स्वीकार किया है और इसका उपयोग मानसिक विकारों के उपचार और पुनर्वास के हिस्से के रूप में कर रहे हैं। निमहांस में व्यवहार विज्ञान के डीन डॉ. बीएन गंगाधर ने व्हाइट स्वान फाउंडेशन के पेट्रिसिया प्रीतमसे बात की, कि शोध से अब तक क्या पता चल सका लगाया है।

 

 

मानसिक स्वास्थ्य पर योग के उपचारात्मक प्रभाव क्या हैं?

योग को अवसाद और चिंता विकार वाले लोगों के लिए काफी प्रभावशाली पाया गया है। सिज़ोफ्रेनिया के इलाज के रूप में भी इसका काफी अच्छा इस्तेमाल और परीक्षण किया गया है। निस्संदेह स्किज़ोफ़्रेनिया के उपचार में यह प्रथम पंक्ति में प्रयोग नहीं किया जाता, लेकिन जब रोगी बेहतर होता है (एंटी-साइकोटिक दवाओं का उपयोग करने के बाद), लेकिन उसमें कुछ समस्या बाकी रहती है, तब हम योग से उन्हें होने वाले लाभ के बारे में बताते हैं। वास्तव में, स्किज़ोफ़्रेनिया रोग से ग्रस्त लोगों के लिए योग से होने वाले लाभ को पहचाना गया है, इसलिए अंतर्राष्ट्रीय दिशानिर्देशों में से एक में स्कित्ज़ोफ्रेनिया के उपचार में योग की सिफारिश की गई है।

योग का उपयोग अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) और ऑटिज्म जैसी कई अन्य मानसिक बीमारियों में सुधार करने के लिए किया जाता है। लोगों ने ज्ञान संबंधी विफलता वाले बुजुर्गों के लिए योग का उपयोग किया है, जिसे हम मिनिमल कॉग्नीटिव इंपेयरमेंट कहते हैं। इसके अलावा, नींद और अन्य मनोकायिक स्थितियों, जैसे अशारीरिक बीमारियों के कारण शरीर में होने वाले दर्द में भी योग को सहायक पाया गया है। इस प्रकार, विभिन्न परिस्थितियों में हमने योग का प्रयोग किया है।

क्या आप बता सकते हैं कि किस तरह मस्तिष्क पर योग का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है?

यह पाया गया है कि, जिन लोगों ने कई वर्षों तक ध्यान किया है, उनके कुछ मस्तिष्क क्षेत्र उन लोगों की तुलना में अधिक संरक्षित हैं, जिन्होंने इसे नहीं किया। हमने बुजुर्ग लोगों के बीच एक अध्ययन भी किया, छह महीने तक योग का अभ्यास करने वाले बुजुर्ग, अन्य के मुकाबले शारीरिक रूप से बेहतर थे। योग के नियमित अभ्यास से छह महीने पहले और छह महीने बाद में एक स्कैन किया गया। मस्तिष्क के कुछ संवेदनशील क्षेत्र हैं, जो बुजुर्गों में सिकुड़ने लगते हैं। इसके विपरीत,  इन लोगों में, स्मृति के लिए काम करने वाले इन संवेदनशील क्षेत्रों में वृद्धि पाई गई। इससे यह पता चलता है कि योग ने मस्तिष्क को बचाने और इसकी संरचना के विकास में मदद की है।

अब, इस पर कई अन्य तर्क-वितर्क हैं कि योग से मस्तिष्क के कार्य में सुधार क्यों होता है। योग करने से कोर्टिसोल का स्तर कम हो जाता है, और अगर मस्तिष्क में कोर्टिसोल का स्तर ज्यादा है तो यह इसके सामान्य रूप से कार्य न करने का कारण बनता है। उदाहरण के लिए, जब अवसाद के लोग योगाभ्यास करते हैं, तो यह रक्त में एक प्रोटीन बढ़ता है, जिसे मस्तिष्क द्वारा उत्पन्न न्यूरोट्रॉफिक अवयव कहा जाता है। यह मस्तिष्क पर होने वाले दुष्प्रभावों की मरम्मत और सुरक्षा कर सकता है।

क्रियात्मक आधार पर, मस्तिष्क के ईईजी एवं घटना संबंधी क्षमताएं जैसे कई इलेक्ट्रो-फिजियोलॉजी अध्ययन किए गए, और हमने देखा है कि मस्तिष्क के कार्यों में सुधार हुआ है।

योग की कुछ प्रक्रियाएं, उदाहरण के लिए, 'ओम' का जप करना, पता चला है कि इसे करने से मस्तिष्क के कुछ क्षेत्र वास्तव में 'शांत' होते हैं; उनकी गतिविधियां कम हो जाती हैं। मस्तिष्क की गतिविधि कम क्यों होनी चाहिए? मस्तिष्क के कुछ क्षेत्र हैं, जो भावनात्मक उत्तेजना की स्थितियों में अधिक कार्य करते हैं। इसलिए, ऐसा लगता है कि कम भावनात्मकता का एक न्यूरो-शारीरिक संबंध है, जो बदले में मस्तिष्क-मरम्मत की प्रक्रिया को बेहतर बनाता है। इन उदाहरणों से पता चलता है कि क्यों योग, मस्तिष्क की क्रियाशीलता बेहतर करने में मदद करेगा और इसे अन्य संभावित हानिकारक प्रभावों से बचाएगा।

योग के कई प्रकार हैं, जैसे कर्म योग,भक्ति योग और राज योग। मानसिक विकारों के इलाज में मुख्य रूप से कौनसे योग का प्रयोग होता है?

यदि आप मुझसे पूछें, तो हर मनोचिकित्सक योग के एक या अन्य रूपों का प्रयोग कर रहा है। मैं आपको कुछ उदाहरण देता हूं

  • ज्ञान योग – इसमें हम मनो-शिक्षा देते हैं। हम बीमारी के बारे में उस व्यक्ति की समझ में सुधार करते हैं,  उसे क्या करना चाहिए और परिवार को क्याकरना चाहिए- ज्ञान। बेशक,  मैं वास्तव में इसे 'ज्ञान योग'  नहीं कहता, लेकिन एक अलग रूप में हम इसका इस्तेमाल करते हैं।
  • भक्ति योग - हम जानते हैं कि जब रोगियों को उनके डॉक्टर पर विश्वास होता है, तो वे बेहतर लाभ प्राप्त करते हैं। वास्तव में, विश्वास जुड़ने से बेहतर तालमेल स्थापित हो जाता है। मनोचिकित्सा में, यह महत्वपूर्ण शर्तों में से एक है। जब आप तालमेल में सुधार करते हैं, तो व्यक्ति में चिकित्सक के उपचार पर अधिक भरोसा पैदा हो जाता है और दोनों मिलकर बेहतर काम कर सकते हैं। तो, यह भक्ति योग है।
  • कर्म योग कुछ ऐसा है जिसे आप मनोरोग पुनर्वास केंद्र में देख रहे हैं। मनोविकारों वाले मरीजों, जिन्होंने अपनी प्रेरणा खो दी है, वे उपयोगी और रचनात्मक गतिविधियों में संलग्न होने के लिए खुद को प्रेरित और प्रशिक्षित करते हैं। यह उनके लिए बहुत मददगार है तो हम प्रत्येक दिन कर्म योग का प्रयोग कर रहे हैं।
  • राजा योग कई अन्य चीजों का एक रूप है, जिसमें योगासन,  ध्यान आदि शामिल हैं। रोगी स्वयं को सुधारने में खुद मदद करता है। हम योगासन और प्राणायाम का प्रयोग करते हैं, जो बहुत अच्छी तरह से राज योग के हिस्से के रूप में शामिल हैं। और, निस्संदेह रूप से हमारे पास ध्यान है, जिसका हम चुनिंदा रूप से उपयोग करते हैं। हम इसे सभी रोगियों के साथ प्रयोग नहीं करते हैं वास्तव में,  राजा योग के प्रमुख तत्वों में से ध्यान एक है। लेकिन, हम जानते हैं कि मनश्चिकित्सीय रोगियों को ध्यान की कोशिश करने में कठिनाई हो सकती है। इसलिए,  संभवतया हम अपने हस्तक्षेप को योगासन और प्राणायाम तक सीमित करते हैं, और चुनिंदा स्थितियों में हम ध्यान को प्रोत्साहित करते हैं क्योंकि इससे उन्हें बेहतर होने में सहायता मिलती है।

मानसिक स्वास्थ्य और भलाई के लिए हम योगाभ्यास के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को कैसे प्रोत्साहित कर सकते हैं?आप योग और इसके महत्व और लाभ के बारे में दर्शकों को क्या कहना चाहेंगे?

आप योगासन करने के लिए लोगों को प्रेरित कैसे करते हैं?  योगासन के लिए करने भर से काम नहीं बनेगा। उन्हें एक साथ करने के लिए - हम बात करते हैं,  हम उनके साथ योगासन करते हैं, और हम उन्हें योगासन के लाभों का अनुभव कराते हैं और उम्मीद करते हैं कि योग करने के लिए उन्हें प्रेरित करना जारी रहेगा। उदाहरण के लिए, निमहांस में,  एक तरीका जो हमने सोचा, वह यह था कि हमें अपने सभी सहयोगियों को योग करने का सुझाव देने पर काम करना चाहिए। कर्मचारी और छात्र योग पर एक महीने के प्रशंसा पाठ्यक्रम में हिस्सा लें, यह  उम्मीद करते हुए कि वे इसके लाभों की सराहना करेंगे। जो लोग करते हैं,  वे घर पर योग का अभ्यास जारी रख सकते हैं। अंदर के मरीजों के लिए, यह थोड़ा ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। यहां तक ​​कि अगर उनके पास योग केंद्र तक पहुंचने के लिए सभी सुविधाएं हैं,  तो भी घर पर गुरु या योग शिक्षक की सुविधा ले सकते हैं, आदि। उनकी स्थिति के कारण उन्हें अपने खुद के प्रेरक स्तर से समझौता करना होता है। इसलिए,  इसे कुछ सरल आसनों के साथ थोड़ा और सुविधाजनक बनाने की जरूरत है।

मेरी व्यक्तिगत राय में,  अकेले योग के लाभों के बारे में उपदेश, लोगों को आकर्षित नहीं करते हैं। इसमें ऐसा कुछ नहीं है जो उन्हें व्यावहारिक अनुभव करा सके। और, मुझे यकीन है कि ज्यादातर योग स्कूल और योग शिक्षक इस तकनीक के बारे में जानते हैं। योग कक्षाएं चलने के दौरान,  वे तथाकथित 'योग के लाभों की ग्रहणशक्ति'  के बारे में समझाते हैं, ताकि उन्हें योग का अभ्यास करने के लिए प्रेरित रहें।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का क्या महत्व है?यह पूरे विश्व में क्यों मनाया जाता है?

हजारों सालों से योग हमारे देश में प्रसिद्ध था। योग के लिए एक दिन घोषित किए जाने के विचार की पहल कई समूहों ने की, जिनमें भारत और अन्य देशों के समूह शामिल थे। अमेरिका सहित कई यूरोपीय देशों ने संयुक्त राष्ट्र से योग के लिए किसी एक दिन को मान्यता देने को कहा। लगभग तीन साल पहले,  बैंगलोर में एक अंतर्राष्ट्रीय बैठक हुई थी, और मैंने उस बैठक में भाग लिया था। कई भारतीय योग अग्रदूतों के अलावा, यूरोप के लोगों का एक समूह, जो योग गुरु हैं और योग स्कूलों का प्रबंधन करते हैं और जो इस विचार को फैला रहे हैं, उन्होंने निश्चय किया कि 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में घोषित किया जाएगा। 21 जून ग्रीष्म संक्रांति है, वर्ष का सबसे लंबा दिन। उत्तरी गोलार्द्ध में रह रही लगभग 80 प्रतिशत आबादी हर साल इस घटना का अनुभव करती है। इसलिए यह ज्योतिमान होने का प्रतीक है, 'तमसो मा ज्योतिर्गमय'

हम मानते हैं कि योग, वह है जो हमें प्रबोध की ओर ले जाएगा। और हम जिस योग की बात कर रहे हैं वह योगासन, प्राणायाम और ध्यान तक ही सीमित हैं। किन्तु, योग अपने सच्चे आध्यात्मिक अर्थ में कुछ ऐसा है जो हमें मुक्ति की ओर ले जाता है। और योग का आध्यात्मिक संदर्भ में निरूपण है कि 'मेरी चेतना को ब्रह्मांडीय चेतना के साथ मिश्रित होना है'। इस रास्ते में, हम योग के बहुत अच्छे प्रभावों का अनुभव करते हैं और यही है जिसका हम उपयोग कर रहे हैं। हल्के तौर पर,  एक व्यक्ति ने कहा कि यह योग का ही अतिरिक्त प्रभाव है, कि अपने रोगियों को लाभ दिलाने हम खुद इसे व्यवहार में ला रहे हैं।

योग क्या है?

योग को मानसिक, आध्यात्मिक और शारीरिक विषयों या प्रथाओं के संग्रह के रूप मे परिभाषित किया गया है और यह प्राचीन भारत मे उत्पन्न हुआ है। हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म मे विभिन्न प्रकार के योग स्कूल, लक्ष्य और प्रथाएं है। विभिन्न प्रकार के योगो मे हठ योग और राजा योग सबसे प्रसिद्ध है। हालांकि, योग के आविष्कारक के बारे मे कोई लिखित रिकॉर्ड नही है। योग के किसी भी लिखित खाते से पहले अस्तित्व मे आया, योग अभ्यासकर्ता इन शारीरिक व्यायामों का अभ्यास करते थे। सालों मे ये प्रथाओं को योगियों ने अपने छात्रों को पास कर दिया था, और योग के कई स्कूल विकसित किए गए क्योंकि इस अनुशासन ने विश्व स्तर पर चौड़ा किया और लोकप्रियता हासिल की।

कई प्राचीन भारतीय धार्मिक ग्रंथ संस्कृत मे लिखे गए है, जो वेदों की इंडो-यूरोपियन भाषा है, इसमें योग की विभिन्न तकनीकों के रिकॉर्ड शामिल है। 'योग सूत्र', जो कि भारतीय ऋषि पतंजलि द्वारा दिए गए योग दर्शन पर २००० साल का एक ग्रंथ है, एक प्रकार का गाइडबुक है जो तकनीक को प्रदान करता है कि कैसे मन और भावनाओं और आध्यात्मिक विकास पर सलाह प्राप्त करने के लिए तकनीकें प्रदान करता है जिस पर आज का अभ्यास किया गया सभी योग आधारित है। योग सूत्र सबसे पहले योग के लिखित रिकॉर्ड और अस्तित्व मे सबसे पुराना ग्रंथों मे से एक है।

इस प्रकार का व्यायाम शरीर की संतुलन और मुख्य शक्ति को बढ़ाता है जहां विभिन्न आसनें गहरी साँस लेने के साथ हाथ मे जाती है। इनके संयोजन से रक्तचाप कम हो जाता है, हृदय स्वास्थ्य मे सुधार, श्वसन दर बढ़ जाती है और शरीर के स्तर को कोर्टिसोल पर नियंत्रण होता है, एक हार्मोन जो तनाव से निपटने के लिए उत्पन्न होता है। इन पदों, जो अब पूरे शब्दों मे कई योग केंद्रों मे स्वास्थ्य और फिटनेस का अभिन्न हिस्सा बन गए है, मूल रूप से भारत मे योग परंपराओं का एक प्रमुख घटक नही थे। योग के कुछ सामान्य प्रथाओ मे प्राणायाम, धरणा और नाडा शामिल है।

योग कैसे किया जाता है ?

योग करने का सबसे अच्छा समय सुबह मे एक नाश्ते के बारे मे एक घंटे पहले होता है। सुबह उठने के बाद, स्नान करने के बाद आंत को खाली करना, दिन की शुरुआत करने के लिए योग अभ्यास किया जा सकता है। योग का अभ्यास करने के लिए सबसे उपयुक्त समय सूर्यास्त के ठीक पहले शाम है। हालांकि, इस तरह की प्रथाओं को उस समय में बेहतर करना है, जो किसी व्यक्ति के दैनिक अनुसूची के लिए उपयुक्त है, बल्कि इसे रूटीय या आदर्शवादी होने से गुमराह करने के बजाय। यह याद रखना चाहिए कि अभिन्न योग हमेशा एक संतुलित अभ्यास होता है। सर्वोत्तम परिणामों के लिए, किसी भी व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास और जागरूकता मे सुधार लाने और उसे बढ़ाने के लिए आवश्यक होने के दौरान आवश्यक अभ्यास के तरीकों को मिलाया जाना चाहिए।

योग की स्थिति को दिन के किसी भी समय अभ्यास किया जा सकता है, हालांकि भोजन लेने के दो से तीन घंटे के भीतर। जब भी शरीर थका हुआ, तनावग्रस्त, कठोर या फैला हुआ महसूस कर लेता है, ऐसे मे कोई भी ऐसा मसला कर सकता है। हालांकि, बिस्तर पर जाने से पहले बहुत उत्तेजक आसनों का अभ्यास टालना चाहिए। किसी व्यक्ति की योग के दौरान पहले आसन का अभ्यास करना सबसे अच्छा है, प्राणायाम का पालन किया गया है (या फिर सांस लेने और फिर ध्यान दे।

प्राणायाम का अभ्यास दिन के किसी भी समय किया जा सकता है, जबकि खाने के दो से तीन घंटे के भीतर। यह तब किया जा सकता है जब तनाव या थका हुआ हो या जब स्थान मे आसन के लिए कमरे की अनुमति नही होती है। योग का अभ्यास करने के बाद सीधे प्राणायाम अभ्यास करना सबसे अच्छा है ध्यान की एक सफल और पूरी प्रक्रिया के लिए प्राणायाम की यह प्रथा बहुत आवश्यक है।उस दिन के किसी भी समय ध्यान का अभ्यास किया जा सकता है जब कोई व्यक्ति आरामदायक और आराम से महसूस करता है अच्छे परिणाम के लिए भोजन खाने के दो से तीन घंटे के भीतर ध्यान देने से बचना चाहिए, जबकि नींद आ रही है, या मानसिक रूप से 'ह्यपद-उप'।

योग के लिए कौन उपयुक्त है ? (ट्रीटमेंट कब होना चाहिए ?)

योग हर किसी के द्वारा व्यावहारिक रूप से किया जा सकता है, उनके लिंग, आयु या भौतिक सीमाओं की परवाह किए बिना। यह एक गहरी व्यक्तिगत अभ्यास है और मूल रूप से 'वर्तमान क्षण में होने' की अवधारणा पर आधारित है। यह किसी प्रकार के बिना और यहां तक ​​कि प्रतियोगिता के बिना भी किया जा सकता है प्रत्येक मुद्रा को अपनी विशेष आवश्यकताओं, चोट या बीमारियों के अनुरूप संशोधित किया जा सकता है। योग का अभ्यास अधिक शक्ति, संतुलन और लचीलापन हासिल करने में मदद करता है और साथ ही एकाग्रता और ध्यान में सुधार करने में सहायता करता है। इसके अलावा, यह एक व्यक्ति को रात में सोने के लिए सक्षम बनाता है और पूरे दिन ताजा और ऊर्जावान महसूस करता है।

योग के लिए कौन उपयुक्त नहीं है ?

इसमे कोई प्रतिबंध नही है जैसे कि जब योग का अभ्यास करने के बारे मे आता है किसी भी उम्र, लिंग या शरीर का योग योग का अभ्यास कर सकता है। हालांकि, यदि कोई स्थिति उत्पन्न होती है तो एक व्यक्ति अस्थायी रूप से योग से बच सकता है जिससे वह ऐसा करने से रोकता है इन स्थितियो मे दमा, नेत्र शल्य चिकित्सा, पीठ की चोट, कार्पल टनल सिंड्रोम, सिरदर्द, दस्त, हृदय की समस्याएं, घुटने की चोट, माहवारी, अनिद्रा, कम या उच्च रक्तचाप, गर्दन की चोट, गर्भावस्था या कंधे की चोट शामिल हो सकते है।

क्या इसके कुछ दुष्प्रभाव है?

यद्यपि योग के लाभ कई है, इसके कुछ नुकसान भी है। योग के गंभीर दुष्प्रभाव आम तौर पर दुर्लभ होते है योग के कुछ सामान्य साइड इफेक्ट्स मे मस्कुलोकैक्टल की चोट, ग्लूकोमा के साथ जटिलता, सशक्त श्वास के कारण रक्तचाप मे असामान्य वृद्धि, पीठ की चोट, मांसपेशियो मे तनाव और अन्य शामिल है।अगर एक व्यक्ति शरीर की चेतावनी के संकेतों की उपेक्षा करता है और अपनी सीमाओं से परे जाने की कोशश करता है तो एक अधिक विस्तार हो सकता है खींचने को सीमा तक किया जाना चाहिए जो किसी के साथ सहज है या हल्के पुल को महसूस कर सकता है।हेडस्टैंड और कंडरस्टैंड सहित व्युत्क्रम जैसे कुछ योग पदों का अभ्यास, नेत्रीय दबाव बढ़ता है और ग्लूकोमा जैसी आंख की स्थिति वाले लोगों में जटिलताओं का कारण बन सकता है।बहुत आक्रामक तरीके से अभ्यास करना और सावधान नही होना चाहिए क्योंकि आसन मे एक कदम से चोट लग सकती है इसलिए, प्रशिक्षित शिक्षक के मार्गदर्शन मे अभ्यास करना उचित है।

ट्रीटमेंट के बाद दिशानिर्देश क्या है?

शायद सबसे पहले एक व्यक्ति को योग की कक्षा के बाद ऐसा लग रहा है कि, बहुत पानी पीना हालांकि, योग कक्षा को तुरंत बाद पीने से बचा जाना चाहिए। सिर्फ एक योग कक्षा के बाद, सलाह दी जाती है कि सवासना (आराम से और सामान्य साँस लेने के साथ) मे कम से कम १० मिनट के लिए विश्राम करें। यह हमेशा अनुशंसा की जाती है कि योग अभ्यास करने के बाद, एक व्यक्ति को १५ मिनट के बाद कम से कम पानी पीना चाहिए और योग सत्र समाप्त होने के बाद कम से कम आधे घंटे का खाना खा लेना चाहिए।किसी मे कुछ स्वाभाविक रूप से हाइड्रेटिंग पीना जैसे फलों का रस या नारियल पानी भी हो सकता है। योग सत्र के बाद तरबूज या ककड़ी जैसे खाद्य पदार्थों को हाइडिंग भी अच्छा है।एक योग सत्र के बाद प्रोटीन युक्त समृद्ध भोजन की सलाह दी जाती है इसमें कम वसा वाले दूध, दही खाने, ब्रूइड चिकन पर स्नैकिंग, कठोर तेलयुक्त अंडे, कटा हुआ पनीर या कुछ फल शामिल हो सकते है।

स्वास्थ होने में कितना समय लगेगा?

लोग योग कक्षाओं में भाग लेने के लिए कई कारण हैं। कुछ लोगों के लिए, यह शरीर के दर्द में मदद करने के लिए स्वास्थ्य देखभाल प्रदाता की सलाह पर है। दूसरों को तनाव और चिंता से राहत के लिए ऐसी कक्षाएं शामिल हो सकती हैं योग का एक छोटा दैनिक अभ्यास, कुछ मंत्रों को पढ़ने के साथ मानसिक शांति और शांति की तलाश मे मदद करता है।जो लोग खेल और अन्य अभ्यासों के साथ सक्रिय हैं, एक हफ्ते में एक या दो बार योग का अभ्यास करना पर्याप्त है। हालांकि, जो लोग जटिल आसन करना चाहते हैं, उन्हें अधिक समर्पण और प्रतिबद्धता के साथ अभ्यास करना चाहिए।

भारत में ट्रीटमेंट की प्राइस कितनी है?

भारत में योग कक्षाओं की कीमत अलग-अलग जगहों पर भिन्न होती है। हालांकि औसत मूल्य सीमा ५०० रुपये प्रति वर्ग है। यह एक दिन के असीमित वर्ग के लिए लगभग १२०० रुपये है। दूसरे हफ्ते और एक महीने के लिए असीमित कक्षाएं क्रमशः लगभग ५००० रुपये और १२००० रुपये है। महानगरीय शहरों मे योग कक्षाओं की कीमतें आमतौर पर छोटे शहरों और शहरों की तुलना मे अधिक है।

क्या ट्रीटमेंट के परिणाम स्थाई है ?

योग शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक प्रथाओं का एक संयोजन है नियमित समय पर दैनिक अभ्यास करते समय योग की प्रभावशीलता फल देती है। सुबह की शुरुआत और शाम की शुरुआत योग के अभ्यास के लिए दो सर्वोत्तम समय होते है। नियमित आधार पर योग का अभ्यास करने से शरीर के वजन को कम करने, जागरूकता बढ़ाना, एक व्यक्ति को तनाव मुक्त करने में मदद मिलती है, अवरुद्ध भावनाओं को छोड़ने मे मदद करता है, शरीर का विच्छेदन करता है और बुरी आदतों को खत्म करने मे मदद करता है। योग के लिए ये सभी लाभ नियमित रूप से अभ्यास करते है और एक प्रशिक्षित शिक्षक के उचित मार्गदर्शन के दौरान अच्छे परिणाम दिखाते है।

ट्रीटमेंट के लिए विकल्प क्या है?

जिन लोगों ने योग का अभ्यास किया है और उन्हें यह सुखद नहीं मिला है या आकर्षक है, वे मन या शरीर के अन्य वैकल्पिक अभ्यासों पर स्विच कर सकते है। ताई ची, किगॉन्ग, पिलेट्स, डांस और मार्शल आर्ट्स कुछ प्रथाएं है जो योग के विकल्प प्रदान करती है। शारीरिक व्यायाम के इन सभी तरीको मे संतुलन, एकाग्रता, तनाव और तनाव को कम करने, शरीर की लचीलेपन मे सुधार, ऊर्जा की भावना प्रदान करता है और मन, शरीर और आत्मा को एकीकृत करता है।

 

 

 

BOARD OF NATUROPATHY AND YOGA SYSTEMS OF MEDICINE-BNYSM

Email: bnysmindia@gmail.com

Website:-  http://bnysm.yolasite.com

Name of The subject          PRACTICAL. VIVA VOCE QUESTIONS TO BE ASKED   FROM CNYS  STUDENTS

Subject Code   C101,C102,C103and C-104

 

1.             आप  नेचुरोपैथी के विषय में क्या जानते हैं

2.             आप  योग चिकित्सा के विषय में क्या जानते हैं

3.             आप  भारत और विदेशों में प्रकृति चिकित्सा का इतिहास के विषय में क्या जानते हैं

4.             आप  निसर्ग चिकित्सा के विषय में क्या जानते हैं

5.             आप  निसर्ग चिकित्सा के सिद्धांत, दर्शन और उपचार दृष्टिकोण के विषय में क्या जानते हैं

6.             आप  नेचुरोपैथी और दवा की अन्य व्यवस्था

7.             आप  स्वास्थ्य की अवधारणा के विषय में क्या जानते हैं

8.             आप   भारत में स्वास्थ्य सुविधाएं के विषय में क्या जानते हैं

9.             आप   सामुदायिक स्वच्छता और स्वच्छता,  के विषय में क्या जानते हैं

10.          आप   संचारी रोगों का नियंत्रण, के विषय में क्या जानते हैं

11.          आप   व्यक्तिगत स्वच्छता के विषय में क्या जानते हैं

12.          आप    प्रमुख स्वास्थ्य समस्याएं के विषय में क्या जानते हैं

13.          आप    राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, योजना और भारत में कार्यक्रम के विषय में क्या जानते हैं

आप    सामाजिक कार्य-परिभाषा, दर्शन, सिद्धांत, कौशल और विधियां के विषय में क्या जानते हैं

आप     स्वास्थ्य और रोकथाम के विषय में क्या जानते हैं

आप     रोगों के उपचार के रखरखाव में सामाजिक कार्य के विषय में क्या जानते हैं

What do your kind self  know about : 

1.             History of Nature Cure in India

2.             History of Nature Cure in and abroad

3.             Naturopathy

4.             Definition of Naturopathy

5.             Principles of Naturopathy

6.             Philosophy  of Naturopathy

7.             Treatment Approaches of Naturopathy.

8.             Naturopathy and other system of medicine.

9.             What is/are the Concept of Health

10.          What are Health facilities in India

11.          What is/are  Community sanitation and hygiene,

12.          What is/are  Control of communicable diseases,

13.          What is/are Personal hygiene

14.          What is/are Major Health Problems

15.          What is/are National Health Policy,

16.          What is/are Planning and Programmes in India.

17.          What is the  Social Work-Definition,

18.          What is the philosophy of Naturopathy

19.          What are, principles of Naturopathy

20.          What are skills of Naturopathy

21.          What are Methods of Naturopathy  treatments

22.          What is Application of Social Work in maintenance of health

23.          What is the  Prevention and Treatment of Diseases in Naturopathy.

                Human Anatomy,

 

इन के विषय में क्या जानते हैं

 

मानव शरीर, अंगों, हड्डियों और ऊपरी के जोड़ों का एनाटॉमी क्षेत्रीय उपखंड

अंग; निचले अंग के हिस्से, हड्डियों और जोड़ों; सिर और गर्दन के भाग

बॉडी सिस्टम

श्वसन प्रणाली का परिचय, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सिस्टम का परिचय, परिसंचरण प्रणाली का परिचय, मूत्र प्रणाली का परिचय, जननांग प्रणाली का परिचय

फिजियोलॉजी सेल-स्ट्रक्चर एंड फ़ंक्शन, टिशू-एपीरियल, संयोजी, स्नायु, तंत्रिका इत्यादि, मांसपेशियों-मांसपेशियों के फिजियोलॉजी, मांसपेशियों के प्रकार, स्नायु संकुचन और विश्राम।

शरीर प्रणालियों और उनके कार्य

पाचन तंत्र, श्वसन प्रणाली, हेमटोलॉजी

निकास प्रणाली, तंत्रिका तंत्र, प्रजनन प्रणाली, त्वचा प्रणाली

पैथोलॉजी रोगों के पौष्टिक कारणों, मेटाबोलिक विकार, हेमोलीटिक

विकार, पुरुष प्रजनन प्रणाली, रक्त शर्करा, रक्त यूरिया, और सीरम कोलेस्ट्रॉल के रोग, महिला प्रजनन प्रणाली के रोग शारीरिक रक्षा तंत्र और वृद्धावस्था प्रक्रिया, परजीवी

 

Anatomy               Regional subdivision of human body, Parts, Bones and Joints of upper

limb; Parts, Bones and Joints of lower limb; Parts of Head and Neck

Body systems

Introduction to the Respiratory system, Introduction to Gastro¬Intestinal System, Introduction to Circulatory System, Introduction to Urinary System, Introduction to Genital System

Physiology Cell-Structure and functions, Tissue-Epithelial, connective, Muscular, Nerves, etc., Muscles-Physiology of muscles, types of muscles, Muscle contraction and Relaxation.

Body systems and their functions

Digestive system, Respiratory system, Haematology

Excretory system, Nervous system, Reproductive system, Skin system

Pathology              Nutritional Causes of Diseases, Metabolic Disorders, Haemolytic

Disorders, Diseases of Male Reproductive System, Blood Sugar, blood urea, and serum cholesterol, Diseases of Female Reproductive System Body Defense Mechanism and Ageing Process, Parasites

 

               

स्वीमिंग के जल इतिहास, पानी के भौतिक गुण, में स्वीमिंग, हीट उत्पादन और गर्मी वितरण के शारीरिक आधार

शरीर, शरीर का तापमान, स्थिति है कि बढ़ाने के लिए और गर्मी उत्पादन एक शरीर, हीट तापमान वर्गीकरण कमी, गर्म और ठंडे पानी की मनोवैज्ञानिक प्रभाव, विभिन्न तापमान पर पानी की आवेदन, ठंडे और गर्म आवेदनों की पलटा प्रभाव का विनियमन।

एक्शन और प्रतिक्रियाओं, अधूरा प्रतिक्रिया, स्थिति है कि प्रोत्साहित करते हैं और प्रतिक्रिया को हतोत्साहित, अभिक्रियाओं के प्रकार, स्वीमिंग के सामान्य सिद्धांत, स्वीमिंग के चिकित्सीय उपयोग, पानी की hydriatic प्रभाव रोगनिरोधी उपयोग की वर्गीकरण।

जल चिकित्सा-सादा पानी, स्नान, वाष्प स्नान और एयरबैथ की तकनीक।

फोमेंटेशन एंड डौश, सेक और पैक, पानी का आंतरिक उपयोग, सिंचाई और एनीमा, हाइड्रेटिक नुस्खे मडथेरेपी कीचड़ और रासायनिक संरचना के प्रकार, विभिन्न प्रकार की मिट्टी, प्राकृतिक मड स्नान, मड पैक, ड्राई स्नान, रेड बाथ, क्रोमोरेथेपी और हेलीओथेरेपी

सूर्य की किरणों की संरचना, सुबह, मध्य दिन और शाम के बीच अंतर सूर्य की किरणों पर सूर्य प्रकाश के शारीरिक प्रभाव: चयापचय, रक्त गठन, रक्त परिसंचरण, किण्वन, तंत्रिका तंत्र, त्वचा, आदि। सूक्ष्म जीव पर सूर्य की किरणों का प्रभाव, चिकित्सीय विभिन्न रंगों का उपयोग, सूर्य की किरणों के प्रयोग की तकनीकों आहार-चिकित्सा संकल्पना और सामान्य सिद्धांत, भोजन के विभिन्न घटकों

Hydrotherapy History of hydrotherapy, Physical properties of water, physiological base of hydrotherapy, Heat production and heat distribution in the

body, Regulation of body temperature, conditions that increase and decrease heat production an the body, Heat temperature classification, Physiological effects of hot and cold water, Application of water on different temperature, Reflex effects of cold and hot applications.

Action and reactions, Incomplete reaction, conditions that encourage and discourage reaction, Types of reactions, General principles of hydrotherapy, Therapeutic use of hydrotherapy, classification of hydriatic effects Prophylactic use of water.

The techniques of hydrotherapy-Plain water, bath, vapour bath and airbath.

Fomentation and Douche, compress and packs, Internal use of water, irrigation and enemas, Hydriatic prescriptions Mudtherapy Types of Mud and chemical composition, Various types of Mud, Natural Mud baths, Mud packs, Dry bath, Sand batha Chromotherapy and Heliotherapy

Composition of sun rays, Difference between morning, mid day and evening sun rays Physiological effects of sun light on : metabolism, blood formation, blood circulation, fermentation, nervous system, skin, etc. a, Effects of sun rays on micro organism, Therapeutic uses of various colours, Techniques of application of sun rays Diet-therapy Concept and general principles, Various components of food

 

Philosophy & Practice of Yoga Therapy        योग संकल्पना, उद्देश्य और उद्देश्यों, योग का ऐतिहासिक विकास, योग के दर्शन, विभिन्न विद्यालय: राज योग, कर्म योग, भक्ति योग, ज्ञान योग, हाथ योग, आदि, प्रकृति और शुद्ध, चित्त और इसके पांच राज्य, पांच त्रास क्लेशस) और उनके अलग-अलग राज्यों में से पांच संशोधनों (चित्रा), चित्रा, वृत्ता, निरोध, नादी और चक्र, योगिक शुद्धि प्रणाली, प्राणायाम, मुद्रा, बांध, आठ महान पूर्णता (अस्ता महा सिद्धि) और लिबेशन (काव्य) , पूर्णता प्राप्त करने के विभिन्न तरीके, आसन: योग तकनीकों के प्रकार, निवारक, प्रायोगिक और रोगग्रस्त पहलू।

 

Yoga Concept, aims and objectives, Historical development of Yoga, Philosophy of Yoga, Different Schools : Raj yoga, Karma yoga, Bhakti yoga, Gyan Yoga, Hath yoga, etc., Prakrati and Purus, Chitta and its five states, Five afflictions (Kleshas) and their different States, Five modifications (vrittiss) of Mind, Concept of Chittra, Vritta, Nirodh, Nadi and Chakras, Yogic Purification System, Pranayama, Mudras, Bandhas, Eight Great Perfection (Asta Maha Siddhis) and Liberation (Kaivalya), Different ways to attain perfection, Asanas : Types, Preventive, Promotive and curative aspect of yoga techniques.

 

Nutrition and Herbal Medicine        

पोषण

* आहार, अर्थ, महत्व और पोषण, खाद्य पदार्थों के पोषक मूल्य, पोषण संबंधी निदान, पोषण संबंधी रोग, चिकित्सीय पोषण, पोषण संबंधी प्रिस्क्रिप्शन में सावधानियां, सामान्य आहार के चिकित्सीय अनुकूलन, सामान्य रोगों में आहार, ग्रीन सब्जियों, फलों और कच्चे अवयवों के महत्व और अंकुरित अनाज संकल्पना, महत्व और दर्शन, उपवास और भूख के बीच अंतर,

 

उपवास

* उपवास, संकेत और उपवास, उपवास के प्रभाव, तीव्र और जीर्ण रोगों में उपवास के प्रकार के प्रकार। अवधारणा, महत्व, प्रकार, सावधानी,

कल्प

प्रमुख विकारों के प्रबंधन में कल्प की भूमिका अमला, अश्वगंधा, अजवेन के चिकित्सीय उपयोग,

 

हर्बल दवा

* बिल्वा, गुदुची, हरिद्र, हिंगु, कलमीचर्च, पूननवा, तुलसी, करेला, प्याज, पुदीना, नीम

Nutrition

*Diet, Meaning, Importance and Nutrition, Nutritive Value of Food stuff, Nutritional Diagnosis, Nutritional Diseases, Therapeutic Nutrition, Precautions in Nutritional Prescription, Therapeutic Adaptations of Normal Diet, Diet in Common Diseases, Importance of Green Vegetables, fruits and raw ingrediants and sprouted grains Concept, Significance and Philosophy, Difference between Fasting and Starvation,

 

Fasting

*Types of Fasting, Indications and contraindications of Fasting, Effects of Fasting, Fasting in Acute and Chronic Diseases. Concept, significance, types, precautions,

Kalpa

*Role of Kalpas in the Management of Major Disorders Therapeutic use of Amla, Ashwagandha, Ajwain,

 

Herbal Medicine

*Bilva, Guduchi, Haridra, Hingu, Kalimirch, Punarnava, Tulsi, Karela, Onion, Pudina, Neem

 

विभिन्न प्रकार के आसन का चिकित्सीय उपयोग और शारीरिक प्रभाव: सिधसाना, पद्मासन, वज्रसाना, शशंकनासन, सिंहसाणा, गोमखसाना, विरसाना, धनुरासाना, मत्स्येंद्रसाना, गोरक्षसाना, पश्चिम मुमतात्साना, मयुरसाना, कुकुत्तसाना, कुरमासन, उत्थान कुरसमाना, मंडुकसन, गरुनासन, चक्रस्थान, शवासना, सालभसाना, मकरसाना, भुजंगसाणा, उत्तमपदासाना, पवनमक्तेसन, नौकासन, सर्वंगसाणा, हलासा आदि।

योगिक श्वास और प्राणायाम के विभिन्न प्रकार के चिकित्सीय उपयोग और शारीरिक प्रभाव

योगिक सुक्ष्मा विज्ञान, शक्तकर्मा, सूर्य नमस्कार मुद्राओं, बंधों, चक्रों के चिकित्सीय उपयोग और शारीरिक प्रभाव और विभिन्न विकारों में धर्णा और ध्यान योगिक नुस्खे के भौतिक प्रभाव का प्रयोग

 

Therapeutic use and physiological effects of various types of Asanas : Sidhasana, Padmasana, Vajrasana, Shashankasana, Sinhasana, Gomukhsana, Virasana, Dhanurasana, Matsyendrasana, Gorakshasana, Paschmimottasana, Mayurasana, Kukuttasana, Kurmasana, Uttan Kurmasana, Mandukasana, Garunasana, Chakrasana, Shavasana, Salbhasana, Makarasana, Bhujangasana, Uttanpadasana, pawanmuktasana, Naukasana, Sarvangasana, Halsana, etc.

Therapeutic use and physiological effect of various types of Yogic Breathing and Pranayama

Yogic Sukshma Vigyana, Shatakarma, Surya Namaskar Therapeutic use and physiological effect of Mudras, Bandhas, Chakras Therapeutic use and psysiological effect of Dharna and Dhyan Yogic prescription in different disorders